Prison Reforms: सुप्रीम कोर्ट जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उत्तर प्रदेश के एक मामले की सुनवाई के दौरान यह “वन नेशन, वन सॉफ्टवेयर” का विजन पेश किया।
सुप्रीम कोर्ट ने भारत की जेल प्रणाली में एक क्रांतिकारी डिजिटल सुधार का आदेश दिया है। अदालत ने उम्रकैद के कैदियों की समयपूर्व रिहाई (Premature Release) में होने वाली “भारी प्रशासनिक देरी” को खत्म करने के लिए ‘ई-प्रिजन्स’ (E-Prisons) सॉफ्टवेयर के एक विशेष मॉड्यूल को देश भर में लागू करने का निर्देश दिया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट एक हत्या के दोषी की अपील सुन रहा था, जिसे केवल ढाई साल की सजा के बाद गलत तरीके से जमानत पर रिहा कर दिया गया था। इस मामले ने उत्तर प्रदेश में रिहाई की प्रक्रिया में मौजूद भारी विसंगतियों को उजागर किया।
ई-प्रिजन्स अर्ली रिलीज मॉड्यूल क्या है?
- राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित यह डिजिटल मॉड्यूल जेल प्रशासन को पूरी तरह से पेपरलेस बनाएगा।
- स्वचालित पहचान: यह सॉफ्टवेयर उन कैदियों की पहचान उनकी पात्रता से 4 महीने पहले ही कर लेगा जो रिहाई के हकदार होने वाले हैं।
- रीयल-टाइम अपडेट: कैदियों और उनके परिवारों को एसएमएस या व्हाट्सएप के जरिए आवेदन की स्थिति की जानकारी मिलेगी।
- जवाबदेही: हर स्तर पर (जेल, पुलिस, जिलाधिकारी) समय सीमा तय होगी, जिससे फाइलें महीनों तक धूल नहीं फांकेंगी।
- सेंट्रलाइज्ड डैशबोर्ड: उच्च अधिकारी एक क्लिक पर देख सकेंगे कि किस कैदी की फाइल कहाँ अटकी हुई है।
पायलट प्रोजेक्ट से राष्ट्रव्यापी विस्तार
- अदालत ने इस सॉफ्टवेयर को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का रोडमैप तैयार किया है।
- पायलट चरण: इसे उत्तर प्रदेश की सेंट्रल जेल, आगरा और जिला जेल, लखनऊ में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जा रहा है।
- राज्यव्यापी विस्तार: आगरा और लखनऊ में सफलता के बाद इसे पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किया जाएगा।
- देशव्यापी रोलआउट: NIC को सॉफ्टवेयर को इस तरह कोड करने का निर्देश दिया गया है कि इसे अन्य राज्यों की अलग-अलग रिहाई नीतियों (Remission Policies) के अनुसार बदला (Tweak) जा सके।
प्रशासनिक ‘ग्रिडलॉक’ और मानवाधिकार
- सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उत्तर प्रदेश में 1,678 ऐसे कैदी हैं जो 14 साल की अनिवार्य सजा पूरी कर चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण अभी भी जेलों में बंद हैं।
- 915 मामले: सक्षम अधिकारियों को भेजे ही नहीं गए।
- 431 मामले: जिलाधिकारियों के पास लंबित हैं।
- कारण: दस्तावेजों का गायब होना या अधिकारियों की लापरवाही।
- अदालत ने कहा कि यह देरी कैदियों के समयपूर्व रिहाई के कानूनी अधिकार का उल्लंघन है।
बिना कानूनी आधार के रिहाई पर चिंता
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि याचिकाकर्ता (दोषी) को केवल 2 साल 5 महीने की सजा के बाद रिहा कर दिया गया था, जबकि उम्रकैद के मामले में रिहाई के लिए कम से कम 14 साल की सजा का प्रावधान है। अदालत ने इसे “खतरनाक” बताया कि बिना किसी न्यायिक आदेश या कानूनी आधार के कैदियों को रिहा किया जा रहा था। राज्य ने बताया कि 158 ऐसे कैदी रिहा हुए थे, जिनमें से कई अपात्र थे। अब तक 25 को फिर से गिरफ्तार किया गया है, जबकि 31 अभी भी लापता हैं।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| अदालत | सुप्रीम कोर्ट (बेंच: जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस चांदुरकर)। |
| तकनीकी भागीदार | नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC)। |
| मुख्य उद्देश्य | रिहाई प्रक्रिया को पेपरलेस और पारदर्शी बनाना। |
| पायलट जेल | आगरा सेंट्रल जेल और लखनऊ जिला जेल। |
| अगली सुनवाई | 18 मई, 2026 (अनुपालन रिपोर्ट के लिए)। |
न्यायपालिका, पुलिस और जेल का एकीकरण
सुप्रीम कोर्ट का विजन केवल एक सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है। अदालत चाहती है कि भविष्य में यह मॉड्यूल पुलिस, जेल और न्यायपालिका के डेटा को आपस में जोड़ दे। इससे न केवल पात्र कैदियों को समय पर न्याय मिलेगा, बल्कि अपात्र कैदियों की गलत तरीके से होने वाली रिहाई पर भी लगाम लगेगी।

