Tuesday, August 4, 2026
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Consensual Relations: जन्म के 17 साल बाद बना बर्थ सर्टिफिकेट क्यों नहीं है स्वतः नाबालिग होने का सबूत…POCSO केस में आया जवाब

Consensual Relations: सिक्किम हाई कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत जन्म प्रमाण पत्र को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस मीनाक्षी मदन राय और जस्टिस भास्कर राज प्रधान की डिवीजन बेंच ने इस टिप्पणी के साथ निचली अदालत द्वारा पॉक्सो और दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया, क्योंकि अभियोजन पक्ष (prosecution) पीड़िता का नाबालिग होना साबित करने में नाकाम रहा। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) जन्म के कई वर्षों बाद रजिस्टर्ड कराया गया हो, तो उसे आंख मूंदकर सही नहीं माना जा सकता। विशेषकर तब, जब ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969’ (Registration of Births and Deaths Act) के तहत तय की गई अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न किया गया हो।

कानून की किस धारा का हुआ उल्लंघन? ‘देर से पंजीकरण’ का नियम

हाई कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता का जन्म प्रमाण पत्र 5 अप्रैल 2022 को जारी किया गया था, जिसमें उसकी जन्म तिथि 1 जनवरी 2005 दर्ज की गई थी। यानी यह सर्टिफिकेट जन्म के 17 साल बाद बना था।

अदालत ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) का हवाला देते हुए कहा, कानून के मुताबिक, यदि कोई जन्म घटना के एक वर्ष के भीतर रजिस्टर्ड नहीं कराया जाता है, तो उसे केवल प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट (Magistrate of a First Class) के आदेश के बाद ही दर्ज किया जा सकता है। मजिस्ट्रेट को पहले जन्म की तारीख की सत्यता की जांच करनी होती है और तय फीस लेनी होती है। इस मामले में अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि इस नियम का पालन किया गया था। इसलिए, इस सरकारी दस्तावेज की सत्यता को स्वतः सही (presumption of correctness) नहीं माना जा सकता।

खुद पीड़िता के बयान ने खड़े किए सवाल

यह मामला अगस्त 2022 में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था, जब एक युवती को पेट दर्द और ब्लीडिंग के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके गर्भवती होने का पता चला। पुलिस जांच में सामने आया कि युवती और आरोपी (जो पहले से शादीशुदा था) के बीच आपसी सहमति से संबंध (consensual relations) थे।

निचली अदालत ने बर्थ सर्टिफिकेट के आधार पर युवती को घटना की तारीख (जून 2022) पर नाबालिग माना और आरोपी को पॉक्सो और आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत सजा सुना दी। लेकिन हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मामला पूरी तरह पलट गया।

सर्टिफिकेट बनाम खुद का बयान: जहां सर्टिफिकेट में जन्म तिथि 1 जनवरी 2005 थी, वहीं पीड़िता ने खुद गवाही में दावा किया कि उसकी असली जन्म तिथि 5 अप्रैल 2004 है।

उम्र घटाने का दावा: पीड़िता ने बताया कि उसके माता-पिता ने जानबूझकर उसकी उम्र कम लिखवाई थी। यदि पीड़िता की बात को सही माना जाए, तो घटना के वक्त वह बालिग (18 वर्ष से अधिक) थी।

अदालती फैसले का विस्तृत विश्लेषण

यह फैसला पॉक्सो एक्ट के मुकदमों में ‘उम्र के निर्धारण’ (Determination of Age) को लेकर एक बेहद जरूरी कानूनी नजीर स्थापित करता है।

‘पॉक्सो’ मामलों में उम्र का अकाट्य सबूत जरूरी

पॉक्सो एक्ट के तहत किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए सबसे बुनियादी शर्त यह है कि पीड़िता घटना के वक्त ‘बच्ची’ (child – 18 वर्ष से कम) होनी चाहिए। अगर उम्र को लेकर जरा सा भी संदेह पैदा होता है और अभियोजन पक्ष पुख्ता वैज्ञानिक या कानूनी सबूत (जैसे तय नियमों के तहत बना सर्टिफिकेट) नहीं दे पाता, तो इसका सीधा फायदा (benefit of doubt) आरोपी को मिलता है।

सरकारी दस्तावेज की साख पर कानूनी कसौटी

आमतौर पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) के तहत किसी भी सरकारी दस्तावेज (Public Document) को अदालतें सही मानकर चलती हैं। लेकिन सिक्किम हाई कोर्ट ने साफ किया कि यह नियम असीमित नहीं है। अगर कोई दस्तावेज वैधानिक प्रक्रियाओं (Statutory Requirements) को ताक पर रखकर या उनका पालन किए बिना बनाया गया है, तो कोर्ट उसकी प्रामाणिकता को खारिज कर सकती है।

आपसी सहमति और बरी होने का आधार

चूंकि हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष पीड़िता को ‘पॉक्सो एक्ट की धारा 2(d)’ के तहत बच्ची साबित करने में विफल रहा, इसलिए पॉक्सो की धारा 3(a) के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया गया। इसके साथ ही, चूंकि रिकॉर्ड से यह साफ था कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने थे, इसलिए बालिग होने की स्थिति में आईपीसी की धारा 376(1) के तहत दुष्कर्म का अपराध भी नहीं बनता। इसके चलते कोर्ट ने आरोपी को पूरी तरह बरी करने का आदेश दिया।

फैसले का निष्कर्ष

सिक्किम हाई कोर्ट का यह फैसला यह रेखांकित करता है कि अदालतों को गंभीर आपराधिक मामलों में केवल कागजी दस्तावेजों पर निर्भर रहने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि वे दस्तावेज कानूनी रूप से कितने वैध हैं। देर से बने प्रमाण पत्रों के मामलों में मजिस्ट्रेट के सत्यापन की अनुपस्थिति पूरे केस की बुनियाद को कमजोर कर सकती है।

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