Wednesday, October 28, 2026
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Process Fee: अंतरिम आदेश हासिल कर इंटरनेट कॉपी से निचली अदालतों में कार्यवाही रोकना और वर्षों तक प्रोसेस फीस न भरना सरासर शरारत है; यह है केस

सख्त टिप्पणियां और चिंताएं

  1. “हाइकोर्ट के एक हफ्ते का मतलब क्या 6 साल है?” न्यायाधीश ने वर्ष 2021 से लंबित ऐसे लगभग 100 मामलों का जिक्र किया जहां प्रोसेस फीस तक जमा नहीं की गई थी। उन्होंने वकीलों की लापरवाही पर चुटकी लेते हुए कहा:“गलत मत समझिए, अगर मुझे सख्त होना पड़े तो मैं सख्त होऊंगा। हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। अंतरिम आदेश लिया, इंटरनेट कॉपी ली और काम रोक दिया… 2026 का मामला अब सीधे 2036 में दिखेगा क्या?”
  2. ‘चालाकी’ (Mischief) करार दिया: कोर्ट ने कहा कि पक्षकार अंतरिम आदेश प्राप्त कर लेते हैं, उसकी इंटरनेट कॉपी संबंधित निचली अदालत/प्राधिकारी के सामने पेश करके कार्यवाही रुकवा देते हैं और फिर प्रोसेस फीस जमा न करके मामला अटका देते हैं। इससे निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों जगह कार्यवाही ठप हो जाती है।
  3. रजिस्ट्री (Registry) की भूमिका पर सवाल: न्यायाधीश श्रीशानंद (जो स्वयं पहले रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल रह चुके हैं) ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री से पूछा कि पुराने मामलों की लिस्टिंग में इतनी अनियमितता क्यों है। उन्होंने सवाल उठाया कि समन्वय पीठ (Coordinate Bench) द्वारा “अगले सप्ताह सूचीबद्ध करें” का आदेश दिए जाने के बावजूद मामले सालों तक क्यों नहीं लगे।
  4. लिस्टिंग की खबर मिलते ही फीस भरना शुरू: जज ने टिप्पणी की कि जब उन्होंने सभी पुराने मामलों को एक साथ लिस्ट करने का निर्देश दिया, तो रहस्यमयी तरीके से 20-30 वकीलों को इसकी भनक लग गई और उन्होंने आनन-फानन में प्रोसेस फीस का भुगतान कर दिया।

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश (Interim Order) प्राप्त करने के बाद महीनों और वर्षों तक ‘प्रोसेस फीस’ (Process Fee / समन जारी करने का शुल्क) जमा न कर मामलों को जानबूझकर लंबित रखने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है।

न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद की एकल पीठ ने 9 मार्च 2026 के अंतरिम आदेश के बावजूद प्रोसेस फीस जमा न करने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों और हाईकोर्ट रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने चेतावनी दी कि अंतरिम आदेश लेकर केस को आगे न बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और जिन मामलों में प्रोसेस फीस जमा करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए हैं, उनमें दिए गए अंतरिम आदेशों को सीधे रद्द (Vacate) कर दिया जाएगा।

उच्च न्यायालय की प्रमुख मौखिक व विधिक टिप्पणियां

1. ‘अंतरिम आदेश लेकर शांत बैठ जाना शरारत है’ सुनवाई के दौरान जब वकील ने ‘अनजाने में चूक’ (Oversight) का हवाला दिया, तो न्यायमूर्ति श्रीशानंद ने सख्त टिप्पणी की: “अन्यथा मत लीजिए। मैं कठोर हूं और मुझे कठोर होना पड़ेगा। हम इसे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते। अंतरिम आदेश लेना और उसकी इंटरनेट कॉपी से काम चलाना—यह कैसा तरीका है? अंतरिम आदेश ले लो और शांत बैठ जाओ, प्रोसेस फीस मत भरो। इंटरनेट कॉपी ले जाकर संबंधित निचली अदालत में लगा दो; वहां भी कार्यवाही रुक जाती है और यहां भी। फिर यह मामला चार या छह साल बाद सामने आएगा। यह सरासर शरारत (Mischief) के अलावा कुछ नहीं है।”

2. पुराने मामलों और 5 साल से रुकी फीस पर फटकार अदालत ने कहा कि 2021 से जुड़े लगभग 100 ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें 5 साल बीत जाने के बाद भी प्रोसेस फीस जमा नहीं की गई: “आप अपना मनमर्जी का समय लीजिए, 2026 का मामला अब सीधे 2036 में दिखाई देगा। पांच साल से प्रोसेस फीस नहीं भरी गई, यह क्या दर्शाता है? क्या हाईकोर्ट के लिए ‘एक सप्ताह’ का मतलब छह साल होता है?”

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रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली और पुराने केसों की लिस्टिंग पर सवाल

  • केसों की संख्या में अचानक उछाल: न्यायमूर्ति श्रीशानंद (जो पूर्व में हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल भी रह चुके हैं) ने बताया कि जब उन्होंने पुराने मामलों को क्रमवार सूचीबद्ध (List) करने का निर्देश दिया, तो सूची में मामले 39 से बढ़कर 44 और फिर सीधे 113 तक पहुंच गए।
  • निष्प्रभावी (Infructuous) मामलों का लटके रहना: अदालत ने दर्ज किया कि इनमें से कई मामले 2022 में ही निष्प्रभावी हो चुके थे, फिर भी फाइलों में लंबित बने रहे।
  • लिस्टिंग के बाद वकीलों की हड़बड़ाहट: जज ने टिप्पणी की कि जब रजिस्ट्री को सभी पुराने मामलों को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया, तो अचानक 20-30 वकीलों ने आनन-फानन में प्रोसेस फीस जमा कर दी।
  • जवाबदेही तय करने का निर्देश: अदालत ने कहा कि रजिस्ट्री के अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर इतनी आसानी से बच नहीं सकते।

मुख्य निष्कर्ष और चेतावनी

  1. अंतरिम आदेशों को रद्द करने की चेतावनी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन वादियों/वकीलों ने अंतरिम रोक हासिल कर ली है लेकिन विरोधी पक्ष को समन भेजने के लिए प्रोसेस फीस नहीं भरी है, उनके अंतरिम आदेश बिना देरी के वापस ले लिए जाएंगे।
  2. केस खारिज करने की चेतावनी: प्रक्रियात्मक कदमों की जानबूझकर उपेक्षा करने पर मुकदमों को सीधे खारिज किया जाएगा।

विधिक विवरण

  • विषय: अंतरिम आदेश के बाद प्रोसेस फीस (Process Fee) की अदायगी और केस अभियोजन की समयबद्धता
  • पीठ: न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद, कर्नाटक उच्च न्यायालय

Process Fee: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद
मुख्य विषयअंतरिम आदेश के बाद प्रोसेस फीस न जमा करना और मुकदमों को अटकाए रखना
अदालत की मुख्य टिप्पणी“अंतरिम आदेश लेकर इंटरनेट कॉपी संभालना और चुप बैठ जाना गंभीर चालाकी है; इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
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