Wednesday, August 5, 2026
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Right to Identity: IVF से पैदा हुए बच्चे का पहचान का अधिकार…जन्म प्रमाण पत्र में क्यों पिता का नाम जोड़ने के लिए कहा, यहां जानिए वजह

Right to Identity: केरल हाईकोर्ट ने इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक और विवाह से इतर पैदा होने वाले बच्चों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी है।

बड़ी बेटी के जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम दर्ज करने की विधिक प्रक्रिया

जस्टिस पी.वी. कुन्हीकृष्णन की एकल पीठ ने एक विवाहित जोड़े द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए पल्लीकल ग्राम पंचायत को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं की बड़ी बेटी के जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम दर्ज करने की विधिक प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी बच्चे की ‘पहचान का अधिकार’ (Right to Identity) संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) के तहत एक मूल्यवान मौलिक अधिकार है। पंजीकरण कानूनों की प्रक्रियात्मक कमियां या तकनीकी खामियां किसी बच्चे को उसके इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकतीं।

विवाद की पृष्ठभूमि: शादी से पहले आईवीएफ (IVF) और अलगाव का मामला

2012 में आईवीएफ से जन्म: यह विधिक मामला समाज और तकनीक के बदलते दौर में बच्चों की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है। याचिकाकर्ता जोड़े की बड़ी बेटी (मीरा कृष्णा) का जन्म वर्ष 2012 में आईवीएफ तकनीक के माध्यम से हुआ था। जिस समय बच्ची का जन्म हुआ, उसके माता-पिता अविवाहित थे और कुछ व्यक्तिगत कारणों से एक-दूसरे से अलग (Estranged) रह रहे थे।

पिता का कॉलम खाली छूटा: इस कारण जन्म के समय स्थानीय पंचायत के रिकॉर्ड में बच्ची के पिता का नाम दर्ज नहीं कराया गया और जन्म प्रमाण पत्र में पिता का कॉलम पूरी तरह से खाली छोड़ दिया गया।

विवाह और विधिक अड़चन: बाद में दोनों माता-पिता ने आपस में विवाह कर लिया और एक साथ रहने लगे। अपनी बेटी के भविष्य और विधिक दस्तावेजों को दुरुस्त करने के लिए जब वे पल्लीकल ग्राम पंचायत के पास गए, तो पंचायत ने यह कहते हुए नाम जोड़ने से इनकार कर दिया कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान (Enabling Provision) नहीं है जो उन्हें एक बार खाली छूटे कॉलम को इस तरह भरने की अनुमति देता हो। इसके बाद जोड़े ने हाई कोर्ट की शरण ली।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: प्रक्रियात्मक कानून बनाम संवैधानिक अधिकार

जस्टिस पी.वी. कुन्हीकृष्णन ने पंचायत के तकनीकी और रूढ़िवादी रुख को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांतों को प्रतिपादित किया।

पहचान का अधिकार एक मौलिक अधिकार है

अदालत ने कहा कि प्रत्येक बच्चे को समाज में गरिमा के साथ जीने और अपनी पूरी जैविक व विधिक पहचान (Identity) पाने का अधिकार है। कहा, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘राइट टू लाइफ’ में किसी भी नागरिक की पहचान का अधिकार अंतर्निहित है। कोई भी बच्चा इस दुनिया में माता-पिता की मर्जी से आता है, इसमें उसकी खुद की कोई गलती नहीं होती। इसलिए प्रक्रियात्मक कानूनों (Procedural Laws) की कमियों के आधार पर किसी बच्चे को उसके पिता के नाम से स्थायी रूप से वंचित नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 226 के तहत अदालत की असाधारण शक्तियां

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां वैधानिक कानून (जैसे जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969) किसी असाधारण या आधुनिक परिस्थिति (जैसे आईवीएफ या लिव-इन से उत्पन्न स्थिति) से निपटने में मौन या असमर्थ दिखाई देते हैं, वहां उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों (Extraordinary Jurisdiction) का इस्तेमाल कर न्याय सुनिश्चित कर सकता है। अदालतों का काम कानून के अभाव में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को दम तोड़ने देना नहीं है।

अदालत का अंतिम विधिक आदेश

केरल उच्च न्यायालय ने याचिका को पूरी तरह मंजूर करते हुए पल्लीकल ग्राम पंचायत के सचिव/रजिस्ट्रार को कड़ा विधिक निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता द्वारा प्रस्तुत विवाह और आईवीएफ से संबंधित दस्तावेजों के आधार पर बच्ची मीरा कृष्णा के जन्म प्रमाण पत्र में 30 दिनों के भीतर पिता का नाम अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए, ताकि उसकी विधिक पहचान को पूरा किया जा सके।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक निर्णय (जून 2026)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस पी.वी. कुन्हीकृष्णन (एकल पीठ)।
याचिकाकर्ता पक्षआईवीएफ बच्ची के माता-पिता।
विपक्षी पक्षपल्लीकल ग्रामा पंचायत (Pallickal Grama Panchayat)।
संबंधित संवैधानिक धाराभारत के संविधान का अनुच्छेद 21 (जीने और पहचान का अधिकार) और अनुच्छेद 226।
मुख्य कानूनी अड़चनजन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 में पूर्व में खाली छूटे पिता के नाम को बाद में भरने के स्पष्ट नियम का अभाव।
अदालत का विधिक निष्कर्षप्रक्रियात्मक गैप (Procedural Gaps) कभी भी संवैधानिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकते; पंचायत को 30 दिन में सुधार करने का आदेश।
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