Final Report Delay: केरल हाईकोर्ट ने तकनीकी और डिजिटल दौर में अदालती समय (Court Hours) और इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग (E-Filing) की विधिक व्याख्या को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला विधिक निर्णय सुनाया है।
Default Bail की समय-सीमा
हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. कौसर एडप्पागथ की एकल पीठ ने अपने विधिक आदेश में इस तकनीकी सुस्ती का लाभ देते हुए एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के दो आरोपियों को Default Bail (वैधानिक जमानत) का विधिक हकदार माना। इसके साथ ही कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 187 के तहत 60 दिन और 90 दिन की समयसीमा को लेकर चल रहे एक बड़े कानूनी भ्रम को हमेशा के लिए दूर कर दिया।
यह किया अदालत ने स्पष्ट
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस किसी मामले में आरोप पत्र (Charge-Sheet/Final Report) ई-फाइलिंग के जरिए दाखिल करती है, तो उसे अदालती समय यानी शाम 5:00 बजे तक ही स्वीकार किया जाएगा। शाम 5 बजे के बाद की गई ई-फाइलिंग को अगले कार्य दिवस (Next Working Day) में दाखिल माना जाएगा।
मामला और चार्जशीट की विधिक टाइमलाइन (The Timeline)
गिरफ्तारी और बरामदगी: आरोपी अबूबाकर सिद्दीक और अब्दुल रऊफ एम. को 30 दिसंबर 2025 को कासरगोड जिले के अधूर थाना क्षेत्र में 4.22 ग्राम एमडीएमए (MDMA – मध्यम मात्रा) के साथ गिरफ्तार कर उसी दिन न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। उन पर एनडीपीएस एक्ट की धारा 22(b) और 29 के तहत मुकदमा दर्ज था।
60वें दिन की शाम को फाइलिंग: आरोपियों की हिरासत का 60वां दिन 28 फरवरी 2026 को पूरा हो रहा था। पुलिस ने इसी दिन शाम 6:02 बजे ऑनलाइन माध्यम (E-Filing) से कोर्ट के सिस्टम में चार्जशीट सबमिट की, जबकि इसकी फिजिकल कॉपी 2 मार्च 2026 को कोर्ट पहुंची।
आरोपियों की विधिक दलील: आरोपियों के वकील ने केवल एक विधिक बिंदु पर जोर दिया कि पुलिस कानूनन तय 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही है, इसलिए उन्हें डिफ़ॉल्ट बेल (वैधानिक अधिकार) मिलनी चाहिए।
विधिक बहस 1: 60 दिन या 90 दिन? BNSS की नई भाषा पर कोर्ट का फैसला
अभियोजन (Prosecution) की ओर से सरकारी वकील ने दलील दी कि एनडीपीएस की धारा 22(b) में अधिकतम सजा 10 साल है। पुरानी सीआरपीसी (CrPC) में लिखा था कि 90 दिन की अवधि “कम से कम 10 वर्ष” (not less than ten years) की सजा वाले अपराधों पर लागू होगी, लेकिन नई BNSS की धारा 187(3) में भाषा बदलकर “10 वर्ष या अधिक” (ten years or more) कर दी गई है। अभियोजन का तर्क था कि चूंकि यहां अधिकतम सजा 10 साल है, इसलिए पुलिस के पास चार्जशीट के लिए 90 दिन का समय था, 60 दिन का नहीं।
अदालत ने अभियोजन के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले राकेश कुमार पॉल बनाम असम राज्य (2017) का हवाला दिया और विधिक सिद्धांत तय किए।
’10 वर्ष या अधिक’ का विधिक मतलब: कोर्ट ने कहा कि चाहे ‘कम से कम 10 वर्ष’ लिखा हो या ’10 वर्ष या अधिक’, दोनों का मूल विधिक अर्थ एक ही है। 90 दिन की बढ़ी हुई अवधि केवल उन अपराधों पर लागू होती है जहाँ न्यूनतम सजा (Minimum Sentence) 10 वर्ष, आजीवन कारावास या मृत्युदंड हो।
अधिकतम सजा का पैमाना नहीं: जिन अपराधों में न्यूनतम सजा तय नहीं है और सजा “अधिकतम 10 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है”, वे सभी अपराध 60 दिन की श्रेणी में ही आएंगे। चूंकि एनडीपीएस की धारा 22(b) में कोई न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है (केवल अधिकतम 10 साल है), इसलिए पुलिस को हर हाल में 60 दिन के भीतर ही चार्जशीट दाखिल करनी थी।
विधिक बहस 2: शाम 6:02 बजे की ई-फाइलिंग की कानूनी मान्यता क्या है?
जब यह तय हो गया कि समयसीमा 60 दिन ही थी, तो कोर्ट ने ई-फाइलिंग के समय की जांच की। केरल कोर्ट ई-फाइलिंग रूल्स, 2021 के नियम 13(2) के अनुसार, लिमिटेशन (समयसीमा) की गणना के लिए ई-फाइलिंग की तारीख ही मान्य होती है, लेकिन इसके साथ एक शर्त जुड़ी है “निर्धारित समय के भीतर” (Within the prescribed time)।
जस्टिस कौसर एडप्पागथ ने इस नियम को ‘क्रिमिनल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस, केरल, 1982’ के नियम 4 और 5 के साथ मिलाकर पढ़ा, जो अदालतों के दफ्तर का समय सुबह 10:30 से शाम 5:00 बजे तक तय करते हैं। इस विधिक व्याख्या के आधार पर कोर्ट ने ऐतिहासिक नियम प्रतिपादित किया:
“डिजिटल फाइलिंग का मतलब यह नहीं है कि अदालतें 24 घंटे खुली हैं। कार्य दिवस पर शाम 5:00 बजे तक प्राप्त ई-फाइलिंग को ही उस दिन का माना जाएगा। शाम 5:00 बजे के बाद प्राप्त होने वाली किसी भी फाइलिंग को विधिक रूप से अगले कार्य दिवस को प्रस्तुत माना जाएगा। चूंकि पुलिस ने 28 फरवरी को शाम 6:02 बजे चार्जशीट दाखिल की, इसलिए इसे कानूनी तौर पर 1 मार्च 2026 को दाखिल माना जाएगा, जो कि 60 दिनों की अनिवार्य विधिक अवधि के पार जा चुका था।”
अदालत का अंतिम विधिक आदेश
चूंकि 60वें दिन की तय समयसीमा समाप्त होने तक (शाम 5 बजे तक) कानूनी रूप से चार्जशीट रिकॉर्ड पर नहीं आई थी, इसलिए आरोपियों के पक्ष में डिफॉल्ट बेल का अविच्छेद्य संवैधानिक और विधिक अधिकार (Indefeasible Right) उत्पन्न हो गया। अदालत ने दोनों आरोपियों को निम्नलिखित विधिक शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। इसमें दोनों आरोपी ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) का मुचलका और इतनी ही राशि के दो स्थानीय विधिक जमानती (Sureties) अदालत के समक्ष पेश करेंगे। वे जमानत अवधि के दौरान इस प्रकृति का कोई अन्य अपराध नहीं करेंगे। वे गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रयास नहीं करेंगे। वे निचली अदालत की पूर्व विधिक अनुमति के बिना केरल राज्य से बाहर नहीं जाएंगे।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | केरल उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक निर्णय (जून 2026) |
| केस और साइटेशन | बेल एप्लीकेशन नंबर 1503/2026; निर्णय तिथि: 1 जून 2026 |
| माननीय न्यायाधीश | डॉ. जस्टिस कौसर एडप्पागथ (एकल पीठ)। |
| संबंधित विधिक धाराएं | धारा 187(3) BNSS (पूर्व में धारा 167(2) CrPC) और एनडीपीएस एक्ट की धारा 22(b)। |
| ई-फाइलिंग की समयसीमा | शाम 5:00 बजे के बाद की गई ई-फाइलिंग विधिक रूप से ‘अगले दिन’ की मानी जाएगी। |
| 60 बनाम 90 दिन का विधिक नियम | 90 दिन केवल तभी लागू होंगे जब अपराध में न्यूनतम सजा 10 वर्ष या अधिक हो। अधिकतम 10 वर्ष वाले मामलों में 60 दिन की ही सीमा होगी। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | पुलिस की 62 मिनट की देरी (शाम 6:02 बजे फाइलिंग) के कारण दोनों ड्रग तस्करों की रिमांड अवैध; डिफॉल्ट बेल मंजूर। |

