Wednesday, May 20, 2026
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Sakkarbaugh Zoo: चिड़ियाघर के भीतर भैंसों को काटना…कहें तो पशु क्रूरता का हवाला देकर वहां ताला लगा दें, देखिए अदालत की यह टिप्पणी

Sakkarbaugh Zoo: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने गुजरात के दो चिड़ियाघरों (Zoos) के भीतर जंगली जानवरों को खिलाने के लिए भैंसों को काटने (स्लॉटर) की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

मांस काटने से जुड़े नियम को लेकर जनहित याचिका

न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसने इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका (PIL) को पहले ही खारिज कर दिया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मांस काटने से जुड़े नियम और कानून मुख्य रूप से उन कसाईखानों (Slaughterhouses) के लिए हैं जहां मानव उपभोग (Human Consumption) के लिए मीट तैयार किया जाता है, न कि चिड़ियाघर के जानवरों के भोजन के लिए। यह याचिका दो धर्मार्थ ट्रस्टों (Charitable Trusts) द्वारा दायर की गई थी, जिसमें जूनागढ़ के प्रसिद्ध शक्करबाग चिड़ियाघर (Sakkarbaugh Zoo) और गुजरात के एक अन्य चिड़ियाघर के भीतर लाइव मवेशियों (भैंसों) को लाकर उन्हें काटने की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई गई थी।

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सुप्रीम कोर्ट की तल्ख और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने नियमों का हवाला दिया, तो पीठ ने कड़ा रुख अपनाया।
  • जस्टिस संदीप मेहता की टिप्पणी: नियमों का यह पूरा संग्रह (Compendium of Rules) उन कसाईखानों के लिए है जहां मानव उपभोग के लिए वध किया जाता है… उन्हें (प्रशासन को) चिड़ियाघर को वैसे ही प्रबंधित करने दें जैसे वे चाहते हैं। वास्तव में, आपको एक जनहित याचिका दायर करके यह कहना चाहिए था कि इन चिड़ियाघरों को ही हटा दिया जाए, क्योंकि चिड़ियाघर में बंद रखना भी जानवरों के प्रति क्रूरता है।”
  • अदालत का रुख: जब न्यायाधीश विक्रम नाथ ने कहा कि अदालत इन दलीलों से आश्वस्त नहीं है, तो पीठ ने बिना किसी हस्तक्षेप के याचिका को खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क (The Petitioner’s Argument)

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल ने निम्नलिखित तर्क दिए थे।
  • विनियमन की मांग: उनका तर्क था कि भले ही चिड़ियाघर के भीतर व्यावसायिक (Commercial) उद्देश्यों के लिए वध नहीं किया जा रहा हो, फिर भी परिसर के भीतर किसी जानवर को काटने की प्रक्रिया विनियमित (Regulated) होनी चाहिए।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: उन्होंने दलील दी कि भारत के अन्य चिड़ियाघरों में प्रसंस्कृत मांस (Processed Meat) की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किए जाते हैं। लेकिन गुजरात के इन दो चिड़ियाघरों में जीवित भैंसों को अंदर लाने और काटने की अनुमति है, जिससे पर्यावरण, प्रदूषण और पानी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • क्रूरता निवारण अधिनियम का हवाला: उन्होंने तर्क दिया कि चिड़ियाघर के भीतर ऐसा करना एक तरह से बूचड़खाना चलाने जैसा है, इसलिए इसके लिए ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ (Prevention of Cruelty to Animals Act) और आवश्यक लाइसेंसिंग शर्तों का पालन होना चाहिए।

गुजरात हाई कोर्ट का पिछला फैसला (Background)

  • इससे पहले गुजरात उच्च न्यायालय ने इस जनहित याचिका को खारिज करते हुए जो आधार दिए थे, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सही माना।
  • कानूनी दायरा: चिड़ियाघर अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि यह स्थापना वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act) और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) के नियमों के तहत काम करती है।
  • खाद्य सुरक्षा नियम लागू नहीं: हाई कोर्ट ने माना था कि ‘खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011’ (FSSAI Regulations) का हवाला देना पूरी तरह से गलत (Misconceived) है, क्योंकि वह कानून इंसानों के खाने वाले भोजन के लिए है, न कि चिड़ियाघर के हिंसक जानवरों के भोजन के लिए।
  • जनहित को नुकसान नहीं: हाई कोर्ट ने यह भी नोट किया था कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि इस आंतरिक गतिविधि से आम जनता या चिड़ियाघर में आने वाले आगंतुकों (Visitors) को कोई परेशानी या नुकसान हो रहा है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य विवरणसुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
प्रभावित संस्थानशक्करबाग चिड़ियाघर (जूनागढ़, गुजरात) और एक अन्य चिड़ियाघर
अदालत का निर्णयचिड़ियाघर प्रबंधन के आंतरिक कार्यों और जानवरों के खान-पान के तौर-तरीकों में कानूनी दखल देने से साफ इनकार।
लागू कानूनवन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) के दिशानिर्देश।

चिड़ियाघर प्रशासन की स्वायत्तता बरकरार

इस फैसले से यह साफ हो गया है कि चिड़ियाघरों के भीतर बंद मांसाहारी और जंगली जानवरों के पोषण और खान-पान की व्यवस्था को संभालने का अधिकार पूरी तरह से चिड़ियाघर प्रशासन और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) के पास है। अदालतें उन तकनीकी और सामान्य खाद्य नियमों को चिड़ियाघर के भीतर लागू नहीं करेंगी जो केवल इंसानी मीट मार्केट्स के लिए बनाए गए हैं।

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