Tuesday, August 4, 2026
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SC News: प्रयागराज स्थित “मंसरोवर पैलेस” सिनेमा हॉल का असली मालिक कौन…सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगी, पढ़ें

SC News: सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज स्थित “मंसरोवर पैलेस” सिनेमा हॉल को लेकर पिछले 63 वर्षों से चल रहे किरायेदारी विवाद का अंत कर दिया।

किरायेदार के कानूनी उत्तराधिकारी को निर्देश दिए

न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, हम अंततः इस सिनेमा हॉल से संबंधित लंबे समय से चले आ रहे मुकदमेबाज़ी पर पर्दा डालते हैं। उपरोक्त कारणों से, अपील स्वीकार की जाती है और उच्च न्यायालय का 9 जनवरी, 2013 का आदेश रद्द किया जाता है। अदालत ने किरायेदार के कानूनी उत्तराधिकारी को निर्देश दिया कि वह इस सिनेमा हॉल का कब्जा असली मालिक के परिजनों को सौंप दे।

शांतिपूर्वक कब्जा सौंपने का समय दिया

अदालत ने प्रतिवादियों को 31 दिसंबर, 2025 तक परिसर खाली करने और शांतिपूर्वक कब्जा सौंपने का समय दिया है। यह आदेश इस शर्त पर आधारित है कि प्रतिवादी निर्णय की तारीख से चार सप्ताह के भीतर एक सामान्य शपथपत्र प्रस्तुत करेंगे और किराया/प्रयोग शुल्क आदि की सारी बकाया राशि चुका देंगे। इस कानूनी लड़ाई के दो दौर चले और अंततः मृतक मुरलीधर अग्रवाल के कानूनी उत्तराधिकारी अतुल कुमार अग्रवाल ने केस जीत लिया। अब मृतक महेन्द्र प्रताप कक्कन के कानूनी उत्तराधिकारियों को सिनेमा हॉल का कब्जा सौंपना होगा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2013 के फैसले को रद्द कर दिया

शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2013 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मकान मालिक के परिवार की बेदखली याचिका खारिज कर दी गई थी और किरायेदार को कब्जा बनाए रखने की अनुमति दी गई थी। यह विवाद 1952 के एक लीज़ समझौते से शुरू हुआ था, जिसके तहत किरायेदार (स्व. राम अग्या सिंह) ने सिनेमा हॉल का कब्जा लिया था। 1962 में मुरलीधर ने यह संपत्ति खरीदी और वर्षों में कई बेदखली याचिकाएँ दायर कीं, यह कहते हुए कि उन्हें संपत्ति की व्यक्तिगत आवश्यकता है।

पहले चरण का मुकदमा किरायेदार के पक्ष में गया था

पुराने उत्तर प्रदेश किराया नियंत्रण अधिनियम, 1947 के तहत पहले चरण का मुकदमा किरायेदार के पक्ष में गया, लेकिन 1972 के नए किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत 1975 में एक नई याचिका दायर की गई। प्रारंभिक स्तर पर अधिकृत अधिकारी ने बेदखली की अनुमति दी, लेकिन अपीलीय प्राधिकरण ने इसे पलट दिया, जिसके बाद यह मामला उच्च न्यायालय और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। दूसरे चरण में मालिकों की याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने 24 पृष्ठों का निर्णय लिखते हुए कहा कि “मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।”

मकान मालिक का परिवार अन्य व्यवसायों में लगे होने की दलील खारिज

फैसले में इस बात को रेखांकित किया गया कि सिनेमा हॉल की आवश्यकता मुरलीधर के विकलांग पुत्र अतुल कुमार के लिए थी, जिनकी अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं थी। शीर्ष अदालत ने किरायेदारों की इस दलील को खारिज कर दिया कि मकान मालिक का परिवार अन्य व्यवसायों में लगा हुआ है या उनके पास पर्याप्त आय है। फैसले में कहा गया कि यह दावे असिद्ध और कानूनी आवश्यकताओं के लिए अप्रासंगिक हैं।

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