DISABILITY CADETS: दिव्यांग कैडेट्स के लाभ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त…अगर फैसला नहीं लिया, तो रक्षा और वित्त सचिवों को तलब करेंगे

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DISABILITY CADETS: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हुए सैन्य कैडेटों को वित्तीय लाभ देने पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो वह रक्षा सचिव और वित्त सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब करेगा।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ उन कैडेटों की दुर्दशा पर एक स्वतः संज्ञान (Suo motu) मामले की सुनवाई कर रही थी, जिन्हें चोट या दिव्यांगता के कारण ट्रेनिंग के बीच से ही बाहर (Boarded out) कर दिया गया था।

अदालत की नाराजगी के मुख्य कारण

  • समय सीमा की अनदेखी: कोर्ट ने कहा कि मंत्रालयों को इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए छह सप्ताह का समय दिया गया था, लेकिन रक्षा या वित्त मंत्रालय की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया।
  • सेना प्रमुखों की सिफारिशें: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि थल सेना, नौसेना और वायुसेना के तीनों प्रमुखों ने कैडेटों की स्थिति सुधारने के लिए अपनी सिफारिशें दे दी हैं, लेकिन मंत्रालय स्तर पर फाइलें अटकी हुई हैं।
  • बजट का सही समय: जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि चूंकि वित्त अधिनियम, 2026 अभी विचाराधीन है, इसलिए यह इन कैडेटों के लिए आवश्यक फंड आवंटित करने का सबसे उपयुक्त समय है।

क्या हैं प्रमुख मांगें और मुद्दे?

  • अपर्याप्त अनुग्रह राशि (Ex-gratia): वर्तमान में प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग होने वाले कैडेटों को केवल 40,000 रुपये की एकमुश्त राशि और मामूली मासिक भुगतान मिलता है, जो उनके इलाज के लिए नाकाफी है।
  • बीमा कवर: कोर्ट ने सुझाव दिया है कि ट्रेनिंग संस्थानों (जैसे NDA, IMA) में कैडेटों के लिए ‘ग्रुप इंश्योरेंस’ जैसा बीमा कवर होना चाहिए।
  • स्वास्थ्य सेवा (ECHS): कैडेटों को पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ECHS) के दायरे में लाने की मांग की गई है।
  • पुनर्वास (Rehabilitation): कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि उपचार के बाद इन दिव्यांग कैडेटों को रक्षा सेवाओं में ‘डेस्क जॉब’ या अन्य कार्यों में समायोजित करने की संभावना तलाशी जाए।

500 कैडेटों का भविष्य दांव पर

एक रिपोर्ट के अनुसार, 1985 से अब तक लगभग 500 अधिकारी कैडेट गंभीर चोटों के कारण मेडिकल आधार पर डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। ये कैडेट अब भारी मेडिकल बिलों और नाममात्र की आर्थिक सहायता के बीच संघर्ष कर रहे हैं। “हम चाहते हैं कि रक्षा बलों के पास ‘बहादुर कैडेट’ हों, जो चोट या दिव्यांगता के डर से पीछे न हटें। सरकार को उनके भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।”

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