Saturday, September 26, 2026
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Visitation Rights: पिता को पहले बच्चे में विश्वास पैदा करना होगा…सुप्रीम कोर्ट ने पिता को झटका देकर नाना-नानी को सौंपी बच्चे की कस्टडी, पढ़ें केस

केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
कानूनी सिद्धांतParens Patriae Jurisdiction: बच्चे की कस्टडी के मामलों में बच्चे का मानसिक और भावनात्मक कल्याण (Welfare of Child) सर्वोपरि है।
कस्टडी किसे मिली?नाना-नानी (Maternal Grandparents)
पिता के अधिकारहर 3 महीने में 1 बार मिलने की सशर्त अनुमति (केवल यदि बच्चा चाहे और नाना-नानी की निगरानी में)।

Visitation Rights: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में ‘पेरेंस पैट्रिया’ (Parens Patriae – बच्चे का अभिभावक/संरक्षक के रूप में कोर्ट का अधिकार) क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए नाबालिग बच्चे की कस्टडी उसके नाना-नानी को सौंप दी है।

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने अवमानना याचिका (Contempt Petition) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का कल्याण और उसकी इच्छा सर्वोपरि है; पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार तभी मिलेगा जब वह पहले बच्चे में विश्वास पैदा करे।

अदालत ने टिप्पणी की: समग्र परिस्थितियों को देखते हुए, हमारी राय है कि बच्चे को नाना-नानी को सौंप दिया जाना चाहिए… जहां तक मुलाकात के अधिकारों (Visitation Rights) का सवाल है, पिता को पहले बच्चे में विश्वास पैदा करना होगा। यदि बच्चा भी इच्छा व्यक्त करता है, तो पिता को हर तीन महीने में एक बार बच्चे से मिलने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन यह मुलाकात नाना-नानी या मामाओं की सख्त निगरानी में होगी।

मामले का पृष्ठभूमि और घटनाक्रम (Factual Background)

  1. मां के निधन के बाद विवाद
    • बच्चे की मां (याचिकाकर्ता नाना-नानी की बेटी) का निधन हो चुका था, जिसके बाद से बच्चा अपने नाना-नानी के पास रह रहा था। 2021 से बच्चा अपने पिता से अलग था।
    • पूर्व आदेश के तहत कोर्ट ने अप्रैल 2025 तक बच्चे की कस्टडी नाना-नानी के पास रखी थी और बाद में पिता को कस्टडी सौंपी गई थी, जिसमें नाना-नानी को हर महीने के दूसरे शनिवार को बच्चे से मिलने का अधिकार दिया गया था।
  2. पिता की स्थिति
    • पिता राज्य प्रशासनिक सेवा (State Administrative Services) में एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत हैं और उन्होंने दूसरी शादी कर ली है। पिता के तबादले (Transfer) के कारण उनका नया निवास स्थान नाना-नानी के घर से काफी दूर हो गया था।
    • बच्चे के दादा ने बच्चे के नाम पर ₹10 लाख की एफडी और ₹25 लाख की जीवन बीमा पॉलिसी भी कराई थी।
  3. अदालत की अवमानना (Contempt Petition) का आरोप
    • नाना-नानी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए आरोप लगाया कि कस्टडी सौंपे जाने के बाद उन्हें बच्चे से एक बार भी मिलने नहीं दिया गया।
    • दूसरी ओर, पिता का तर्क था कि नाना-नानी खुद बच्चे से मिलने या उसे ले जाने नहीं आए।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट का रुख और निर्णय का आधार

  • बच्चे से सीधी बातचीत (Interaction with the Child)
    • सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने खुद बच्चे से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। बातचीत के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण (Welfare of the Child) नाना-नानी और मामाओं के साथ रहने में ही है।
  • प्रतिष्ठित स्कूल में प्रवेश:
    • कोर्ट को सूचित किया गया कि बच्चा अपने मामाओं के साथ रहता है और उसका दाखिला एक प्रतिष्ठित स्कूल में कराया गया है, जिसकी फीस भी भरी जा चुकी है।
  • पेरेंस पैट्रिया (Parens Patriae) अधिकार का प्रयोग
    • हालांकि यह मूल रूप से अवमानना (Contempt) का मामला था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बच्चे के भविष्य और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कोर्ट का कर्तव्य है कि वह एक ‘अभिभावक’ (Parens Patriae) के रूप में कार्य करे और तकनीकी कानूनी सीमाओं से ऊपर उठकर बच्चे के हित में फैसला ले।

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