केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति दिनेश मेहता एवं न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता (दिल्ली हाई कोर्ट) |
| याचिकाकर्ता | दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन (Senior Adv. सचित जॉली) |
| प्रतिवादी | आयकर विभाग / CBDT (Senior Standing Counsel श्लोक चंद्र) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या Supreme Court Judges Act (Sec 23D) और High Court Judges Act (Sec 22D) के तहत मिलने वाले भत्ते New Tax Regime (Section 115BAC) के तहत कर योग्य हैं? |
| अगली सुनवाई | 3 सितंबर 2026 |
ITR Of Judges: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts) के न्यायाधीशों से अपने स्थायी खाता संख्या (PAN) और टैक्स रिटर्न से संबंधित अन्य विवरण आयकर विभाग (Income Tax Department) के साथ साझा करने को कहा है। यह निर्देश इसलिए दिया गया है ताकि नए आयकर ढांचे (New Tax Regime) के तहत न्यायिक भत्तों पर टैक्स लगाने से जुड़े विवाद के लंबित रहने तक जजों के आईटीआर (ITR) को प्रोसेस न किया जाए।
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने आयकर विभाग द्वारा 22 जुलाई के अंतरिम आदेश में संशोधन की मांग को लेकर दायर एक आवेदन पर 10 अगस्त 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी न्यायाधीश का टैक्स रिटर्न पहले ही प्रोसेस हो चुका है और कोई टैक्स की मांग (Tax Demand) उठाई गई है, तो याचिका पर अंतिम निर्णय आने तक उस मांग को सस्पेंड/मुल्तवी (Keep in Abeyance) रखा जाएगा।
विवाद की मुख्य वजह: CBDT का मेमोरेंडम और जजों के भत्ते
- CBDT का ऑफिस मेमोरेंडम (12 सितंबर 2025)
- केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर कहा था कि जो न्यायाधीश ‘न्यू टैक्स रिजीम’ (Section 115BAC) चुनते हैं, उन्हें किराया-मुक्त सरकारी आवास (Rent-free Official Accommodation), वाहन सुविधाएं (Conveyance Facilities), आतिथ्य भत्ता (Sumptuary Allowance) और एलटीसी (Leave Travel Concession) पर टैक्स छूट का लाभ नहीं मिलेगा। सीबीडीटी का तर्क था कि नया टैक्स ढांचा बिना किसी छूट या कटौती के रियायती दरें प्रदान करता है।
- दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन की चुनौती
- ‘दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन’ ने इस मेमोरेंडम को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। एसोसिएशन का तर्क था कि ये भत्ते पारंपरिक अर्थों में कोई ‘कटौती’ (Deduction) या ‘छूट’ (Exemption) नहीं हैं।
- हाई कोर्ट जजेस एक्ट, 1954 की धारा 22D और सुप्रीम कोर्ट जजेस एक्ट, 1958 की धारा 23D स्पष्ट रूप से इन भत्तों को वेतन आय (Salary Income) की गणना से बाहर रखते हैं। ये विशेष प्रावधान आयकर अधिनियम की धारा 115BAC पर तरजीह (Non-obstante Clause) रखते हैं।
- 22 जुलाई का शुरुआती आदेश
- हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के तर्कों से सहमति व्यक्त की थी और न्यू टैक्स रिजीम चुनने वाले जजों को इन भत्तों को “ऐसी प्राप्तियां जो आय की प्रकृति में नहीं हैं” (Receipts not in the nature of income) के रूप में घोषित करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इस प्रकार दाखिल किए गए रिटर्न को अगले आदेश तक प्रोसेस न किया जाए।
आयकर विभाग की तकनीकी समस्या और 10 अगस्त का नया निर्देश
जब 10 अगस्त को मामले की दोबारा सुनवाई हुई, तो आयकर विभाग की ओर से उपस्थित वकील ने बताया कि
- सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर (CPC) में आईटीआर इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रोसेस किए जाते हैं।
- सॉफ्टवेयर यह पहचान नहीं कर सकता कि कौन सा रिटर्न किसी सेवारत/कार्यरत जज का है।
- यदि पुराने आदेश का शत-प्रतिशत पालन करना पड़ा, तो विभाग को देश के सभी करदाताओं (Taxpayers) के रिटर्न की प्रोसेसिंग रोकनी पड़ेगी।
इसके बाद, हाई कोर्ट ने प्रक्रिया को व्यावहारिक बनाने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए।
- 18 अगस्त तक PAN साझा करने का आदेश: कोर्ट से आच्छादित जजों के निजी सचिवों (Private Secretaries) को निर्देश दिया गया है कि वे 18 अगस्त 2026 तक जज का नाम, एसेसमेंट ईयर, PAN नंबर, फाइलिंग तिथि और पावती संख्या (Acknowledgement Number) एक निर्दिष्ट अधिकारी को ईमेल करें।
- प्रोसेसिंग पर रोक: इन विवरणों के आधार पर चिन्हित किए गए जजों के रिटर्न प्रोसेस नहीं किए जाएंगे। इसके बाद दायर होने वाले किसी भी नए या संशोधित रिटर्न की जानकारी 12 घंटे के भीतर भेजनी होगी।
- टैक्स रिफंड और डिमांड: यदि किसी जज के खिलाफ टैक्स की मांग उठाई जा चुकी है तो उसे स्थगित रखा जाएगा। वहीं, रिफंड जारी नहीं किए जाएंगे और जो रिफंड पहले जारी हो चुके हैं, वे इस मामले के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।

