Wages of priests: सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें राज्य-नियंत्रित मंदिरों (State-controlled temples) के पुजारियों, सेवादारों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और कल्याण की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है।
याचिका के मुख्य बिंदु (Quick Highlights)
| विवरण | मांग/तर्क |
| प्रस्तावित तंत्र | न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति का गठन। |
| कानूनी दर्जा | पुजारियों को ‘कर्मचारी’ (Employee) माना जाए। |
| वेतन का आधार | 2026 के महंगाई सूचकांक के अनुसार समायोजन। |
| संवैधानिक उल्लंघन | अनुच्छेद 21 (आजीविका) और अनुच्छेद 43 (DPSP)। |
| संदर्भ | काशी विश्वनाथ, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के मंदिरों की स्थिति। |
अनुच्छेद 21 व अनुच्छेद 43 का सीधा उल्लंघन
अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि जब राज्य किसी मंदिर का प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथ में लेता है, तो वहां के पुजारियों और कर्मचारियों के साथ उसका ‘नियोक्ता-कर्मचारी’ (Employer-Employee) संबंध बन जाता है। याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि पुजारियों को गरिमापूर्ण वेतन न देना अनुच्छेद 21 (आजीविका का अधिकार) और अनुच्छेद 43 (निर्वाह मजदूरी) का सीधा उल्लंघन है।
मुख्य मांगें: कर्मचारी का दर्जा और न्यूनतम वेतन
- वेतन संहिता (Code on Wages, 2019): याचिका में मांग की गई है कि पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को संहिता की धारा 2(k) के तहत ‘कर्मचारी’ घोषित किया जाए।
- महंगाई और वेतन: 2026 के मुद्रास्फीति-समायोजित जीवन लागत सूचकांक (Inflation-adjusted cost of living index) का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्तमान में पुजारियों को अकुशल श्रमिकों के बराबर भी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही है।
- दक्षिणा पर विवाद: फरवरी 2025 में तमिलनाडु के एक मंदिर में पुजारियों को ‘आरती की थाली’ में दक्षिणा लेने से रोकने वाले सर्कुलर का जिक्र करते हुए इसे ‘मनमाना’ और ‘भुखमरी की ओर धकेलने वाला’ बताया गया।
“राज्य एक आदर्श नियोक्ता नहीं”
- याचिका में राज्य सरकारों के ‘एंडोमेंट डिपार्टमेंट’ (Endowments Department) की भूमिका पर कड़े सवाल उठाए गए हैं।
- प्रणालीगत शोषण: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों द्वारा हाल ही में किए गए बड़े विरोध प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए इसे “प्रणालीगत शोषण” करार दिया गया है।
- विभेदकारी नियंत्रण: PIL में यह विवादित मुद्दा भी उठाया गया है कि “राज्य लाखों मंदिरों को नियंत्रित कर रहे हैं, लेकिन एक भी मस्जिद या चर्च सरकारी नियंत्रण में नहीं है।”
काशी विश्वनाथ का अनुभव
याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप की आवश्यकता तब महसूस हुई जब अप्रैल 2026 में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा के दौरान उन्हें पता चला कि वहां के पुजारियों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है।
धार्मिक प्रबंधन बनाम श्रम अधिकार
यह याचिका भारत में एक बड़ी बहस को जन्म दे सकती है: क्या धार्मिक संस्थानों का प्रबंधन करने वाला राज्य एक व्यावसायिक नियोक्ता की तरह व्यवहार करने के लिए बाध्य है? यदि सुप्रीम कोर्ट इस पर सकारात्मक रुख अपनाता है, तो देशभर के हजारों सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के वित्तीय ढांचे और पुजारियों की सेवा शर्तों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।

