Special Exam Demand: बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने यूनिवर्सिटी के नियमों से बचने के लिए अदालतों में बेबुनियाद और दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी करने वाले कानून के छात्रों (भावी वकीलों) को बेहद कड़ा संदेश दिया है।
75 प्रतिशत अटेंडेंस (हाजिरी) के अनिवार्य नियम को बायपास करने का मामला
हाईकोर्ट के जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस अजीत बी. काडेठाणकर की खंडपीठ ने इस बात पर गहरी चिंता और निराशा जताई कि कानून की पढ़ाई पूरी कर वकालत के नेक पेशे में कदम रखने जा रही एक छात्रा ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए यूनिवर्सिटी, फैकल्टी और अपने ही सहपाठी (Batchmate) के खिलाफ बेहद गंभीर और बेबुनियाद आरोप लगाए। अदालत ने 75 प्रतिशत अटेंडेंस (हाजिरी) के अनिवार्य नियम को बायपास करने के लिए एक 23 वर्षीय एलएलएम (LLM) छात्रा द्वारा दायर “लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना” पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को खारिज कर दिया।
मामला क्या है?: कम अटेंडेंस पर परीक्षा से रोका, तो कोर्ट पहुंची छात्रा
अटेंडेंस का नियम: यह मामला महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (MNLU), औरंगाबाद का है। यूनिवर्सिटी के नियमों के अनुसार, परीक्षा में बैठने के लिए कम से कम 75 प्रतिशत (विशेष परिस्थितियों में 67 प्रतिशत) अटेंडेंस अनिवार्य है। याचिकाकर्ता छात्रा की अटेंडेंस 50 प्रतिशत से भी कम थी। छात्रा का दावा था कि कुछ क्रेडिट-आधारित अतिरिक्त अंकों को जोड़कर उसकी अटेंडेंस 51.12 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
पहला मुकदमा और परीक्षा: अटेंडेंस शॉर्टेज के कारण यूनिवर्सिटी ने उसे दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने से रोक दिया था। इसके खिलाफ छात्रा ने रिट याचिका दायर की थी, जिसे हाई कोर्ट ने अप्रैल 2026 में ही खारिज कर दिया था। मई 2026 में यूनिवर्सिटी ने परीक्षाएं भी आयोजित कर लीं।
समीक्षा याचिका का सहारा: परीक्षा छूट जाने के बाद, छात्रा ने हाई कोर्ट में दोबारा एक ‘रिव्यू पिटीशन’ (पुनर्विचार याचिका) दायर की। इसमें उसने अप्रैल के फैसले पर सवाल उठाए और अपने लिए एक ‘विशेष परीक्षा’ (Special Exam) आयोजित कराने की मांग की। उसने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी ने उसके एक सहपाठी की अटेंडेंस कम होने के बावजूद उसे परीक्षा में बैठने की छूट देकर पक्षपात किया है।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: न्याय का मतलब यह नहीं कि जो मैं चाहूं और जैसे चाहूं, ले लूं
अदालत ने छात्रा की दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए कानूनी पेशे की मर्यादा पर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।
अपील के भेष में पुनर्विचार याचिका: कोर्ट ने पाया कि छात्रा की पुनर्विचार याचिका व्यावहारिक रूप से एक ‘अपील’ की तरह थी। अदालत ने कहा, “आवेदक ने अपने मामले को इस तरह से दोबारा पेश करने की कोशिश की है, जैसे कि यह अदालत अपने ही फैसले के खिलाफ किसी अपील पर सुनवाई कर रही हो।” कोर्ट ने साफ किया कि रिव्यू पिटीशन का दायरा बेहद सीमित होता है।
भावी करियर को लेकर चिंता: खंडपीठ ने छात्रा के इस अड़ियल रुख पर चिंता जताते हुए कहा, हम आवेदक के इस दुस्साहस भरे दृष्टिकोण से न केवल निराश हैं, बल्कि चिंतित भी हैं। आवेदक एक लॉ ग्रेजुएट है और जल्द ही कानून के इस नेक क्षेत्र में प्रवेश करने वाली है। अपने खुद के डिफॉल्ट (गलती) से पार पाने के लिए आवेदक ने ऐसे चरम उपाय अपनाए, जो न केवल अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि हमें डर है कि यह उसके अपने करियर को भी नुकसान पहुंचाएगा।
सच्चे हाथों से आएं कोर्ट: कोर्ट ने कहा कि अगर कानून के नए छात्र इसी तरह बिना साफ हाथों (Without Clean Hands) के और अनुशासनहीन तरीके से अदालतों में पेश होंगे, तो इस पेशे का भविष्य चिंताजनक है। न्याय की अवधारणा यह नहीं है कि “जो मैं चाहता हूं और जैसे भी मैं इसे पेश करूं, मुझे मिल जाए।”
कोर्ट का फैसला: छात्र समझकर भारी जुर्माने से छोड़ा
अदालत ने पाया कि पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत जो कड़े कानूनी मापदंड होने चाहिए, छात्रा का मामला उनमें से किसी को भी पूरा नहीं करता। अधिकतम रियायत के बाद भी उसकी अटेंडेंस केवल 51 प्रतिशत तक ही पहुंच रही थी, जो नियम के मुताबिक बेहद कम थी।
अदालत ने कहा, “ऊपर दर्ज कारणों के चलते हमारा बहुत मन था कि हम याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माना (Heavy Costs) लगाएं। हालांकि, यह विचार करते हुए कि आवेदक अभी एक छात्रा है, हम अपने हाथ पीछे खींच रहे हैं।” कोर्ट ने बिना कोई जुर्माना लगाए याचिका को खारिज कर दिया। मामले में छात्रा स्वयं कोर्ट के सामने पेश हुई थी, जबकि यूनिवर्सिटी की ओर से एडवोकैट एस. के. कदम ने पैरवी की।
केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)
| कानूनी और प्रशासनिक बिंदु | बॉम्बे हाई कोर्ट की विधिक कार्यवाही (जून 2026) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (औरंगाबाद पीठ – खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस अजीत बी. काडेठाणकर |
| याचिकाकर्ता | 23 वर्षीय एलएलएम (LLM) छात्रा (स्वयं पेश हुई) |
| संबंधित संस्थान | महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (MNLU), औरंगाबाद |
| मुख्य विवाद | 75% अनिवार्य अटेंडेंस के नियम को बाईपास करने और दोबारा परीक्षा कराने की मांग। |
| अदालत का रुख | पुनर्विचार याचिका (Review) का दायरा सीमित है; इसे अपील की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। |
| अंतिम आदेश | छात्रा की याचिका पूर्णतः खारिज; छात्र होने के नाते जुर्माना लगाने से कोर्ट का इनकार। |

