Thursday, October 1, 2026
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Seized Property: जब्त संपत्ति के निपटारे के लिए BNSS के तहत 45 दिनों की समय-सीमा का कड़ाई से पालन अनिवार्य

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय न्यायाधीशन्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना (Justice M. Nagaprasanna)
संबंधित कानूनभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 497 और 503
कुल समय-सीमा45 दिन (14 दिन विवरण हेतु + 30 दिन अंतिम आदेश हेतु)
मुख्य सिद्धांतजब्ती की गई संपत्ति को महीनों तक थानों या अदालतों में नहीं रखा जा सकता; BNSS की वैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन अस्वीकार्य है।

Seized Property: कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 497 के तहत पुलिस द्वारा जब्त की गई संपत्ति (Seized Property) के निपटारे के लिए तय की गई समय-सीमा का पालन करना निचली अदालतों के लिए अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना (Justice M. Nagaprasanna) की एकल पीठ ने बेंगलुरु की मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट को चेतावनी देते हुए कहा कि वैधानिक समय-सीमा का पालन न करना कानून के उद्देश्य को विफल बनाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब्ती की तारीख से कुल 45 दिनों के भीतर संबंधित अदालत/मैजिस्ट्रेट को संपत्ति के निपटारे, विनष्टीकरण, जब्ती या सुपुर्दगी (Interim Custody) पर अंतिम आदेश पारित करना होगा।

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BNSS की धारा 497 के तहत 45-दिवसीय समय-सीमा का गणित

अदालत ने BNSS की धारा 497(2) और धारा 497(5) का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित समय-सीमा तय की।

  1. प्रथम चरण (14 दिन – धारा 497(2))
    • अदालत के समक्ष संपत्ति पेश किए जाने की तारीख से 14 दिनों के भीतर संपत्ति का विवरण (Statement containing description) तैयार किया जाना आवश्यक है।
  2. द्वितीय चरण (30 दिन – धारा 497(5))
    • संपत्ति का विवरण, फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी होने के 30 दिनों के भीतर अदालत को उसके निपटारे या अंतरिम सुपुर्दगी का आदेश पारित करना होगा।
  3. कुल समय-सीमा
    • जब्ती की तारीख से अधिकतम 45 दिनों के भीतर मामले का निपटारा होना चाहिए।

CrPC की धारा 451 और BNSS की धारा 497 में मुख्य अंतर

  • जांच के दौरान आदेश का अधिकार: पुरानी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 451 केवल विचारण (Trial) के दौरान आदेश की अनुमति देती थी। लेकिन BNSS की धारा 497(1) का दायरा व्यापक है, जो मैजिस्ट्रेट को जांच (Investigation) के चरण में भी संपत्ति की कस्टडी पर आदेश पारित करने का अधिकार देती है।
  • सख्त वैधानिक समय-सीमा: CrPC में कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं थी, जबकि BNSS की धारा 497 (उप-धारा 2 से 5) में 45 दिनों का स्पष्ट समय तय किया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • साइबर फ्रॉड मामला: मामला लगभग ₹4.83 करोड़ के शेयर बाजार फ्रॉड से जुड़ा है। टेलीग्राम ग्रुप “Unlisted Shares” के जरिए पीड़ित से ठगी की गई थी।
  • संपत्ति की जब्ती: 25 अगस्त 2025 को याचिकाकर्ता (मुकेश जैन) के परिसर की तलाशी लेकर नकद, सोने-चांदी के गहने और मोबाइल जब्त किए गए थे।
  • अदालती देरी: याचिकाकर्ता ने 3 सितंबर 2025 को अंतरिम कस्टडी (Interim Custody) की याचिका लगाई थी। कानून के अनुसार इसका फैसला 9 अक्टूबर 2025 तक आ जाना चाहिए था, लेकिन फरवरी 2026 तक निचली अदालत ने कोई फैसला नहीं दिया।
  • हाई कोर्ट का आदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट (Kanak Cattle Feeds), मद्रास हाई कोर्ट (R. Saiju) और सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले (Sunderbhai Ambalal Desai) का हवाला देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार की। अदालत ने बेंगलुरु मैजिस्ट्रेट कोर्ट को एक सप्ताह के भीतर याचिका का निपटारा करने का निर्देश दिया।

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