Valid Consent: मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा (Gauhati High Court) |
| संबंधित कानून | IPC Section 376(2)(l), CrPC Section 164(5A), Evidence Act Section 114A |
| मुख्य निर्णय | 1. केवल मानसिक विकलांगता से यह साबित नहीं होता कि महिला सहमति देने में असमर्थ थी। 2. सहमति की कमी को साबित करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर की स्पष्ट गवाही अनिवार्य है। |
Valid Consent: गुवाहाटी हाईकोर्ट (Gauhati High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि किसी वयस्क महिला की यौन स्वायत्तता (Sexual Autonomy) को केवल मनोवैज्ञानिक परीक्षण के स्कोर या आंकलित ‘मानसिक आयु’ (Mental Age) के आधार पर नहीं छीना जा सकता।
न्यायमूर्ति संजीव कुमार शर्मा (Justice Sanjeev Kumar Sharma) की एकल पीठ ने मिजोरम के लुंगलेई सत्र न्यायालय द्वारा आईपीसी की धारा 376(2)(l) के तहत आरोपी को दी गई 10 साल के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करने के लिए विशिष्ट विशेषज्ञ साक्ष्य (Expert Evidence) पेश करने होंगे कि महिला यौन कृत्य की प्रकृति को समझने और अपनी वैध सहमति देने में असमर्थ थी।
Valid Consent: अदालत के मुख्य कानूनी सिद्धांत और टिप्पणियां
- मानसिक आयु बनाम वास्तविक उम्र का सामाजिक अनुभव:“8/9 वर्ष की मानसिक आयु के रूप में आंकी गई 24 वर्षीय महिला की तुलना सीधे तौर पर 8/9 वर्ष की बच्ची से नहीं की जा सकती। उसके पास 24 वर्षों का जीवन अनुभव, शारीरिक और सामाजिक विकास, तथा वयस्कों के सामाजिक परिवेश का अनुभव होता है, जो उसे एक वास्तविक बच्चे से काफी आगे रखता है।”
- यौन स्वायत्तता (Sexual Autonomy) एक व्यक्तिगत अधिकार
- पीठ ने कहा कि यौन स्वायत्तता का अधिकार एक मूल्यवान व्यक्तिगत अधिकार है। इसे मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से उत्पन्न केवल कुछ अमूर्त अंकों या धारणाओं के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए डॉक्टर या विशेषज्ञ की स्पष्ट राय जरूरी है।
- धारा 164(5A) CrPC का कड़ाई से पालन अनिवार्य
- पीड़िता का बयान दर्ज करते समय मजिस्ट्रेट ने धारा 164(5A) के नियमों का पालन नहीं किया—न तो किसी दुभाषिये/विशेष शिक्षक की मदद ली गई, न ही बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई, और न ही यह दर्ज किया गया कि पीड़िता गवाही देने के योग्य थी या नहीं।
- कोर्ट ने माना कि जब किसी बयान को मुख्य परीक्षा (Examination-in-chief) की जगह इस्तेमाल किया जाता है, तो इन वैधानिक नियमों का पालन अनिवार्य (Mandatory) है।
Valid Consent: मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- अभियोजन का पक्ष: आरोपी पर मानसिक रूप से दिव्यांग महिला के साथ बलात्कार का आरोप था। आरोपी ने यौन संबंध की बात स्वीकार की, लेकिन दावा किया कि यह दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति (Consensual) से हुआ संबंध था। अभियोजन ने तर्क दिया कि पीड़िता की मानसिक स्थिति को देखते हुए वह सहमति देने में असमर्थ थी, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114A के तहत ‘सहमति न होने’ का अनुमान (Presumption) लगाया जाना चाहिए।
- अदालत की जांच में पाई गई खामियां:
- जिन डॉक्टरों ने विकलांगता प्रमाण पत्र (Disability Certificate) जारी किया था, उनसे अदालत में पूछताछ ही नहीं की गई।
- जिस मनोवैज्ञानिक (Clinical Psychologist) की गवाही हुई, उसने भी यह नहीं बताया कि पीड़िता कृत्य को समझने या सहमति देने की स्थिति में थी या नहीं।
- मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन घटना के लगभग 2 साल बाद किया गया था।
- अदालत के समक्ष पीड़िता का ऐसा कोई वैध बयान नहीं था जिसमें उसने कहा हो कि उसने सहमति नहीं दी थी, इसलिए धारा 114A का अनुमान लागू नहीं होता।
Valid Consent: उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के जरिए यह साबित करने में विफल रहा कि महिला सहमति देने में असमर्थ थी। कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि (Conviction) और 10 साल की सजा को रद्द करते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

