Thursday, October 8, 2026
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Predicate Offence: मूल अपराध में मिली सुरक्षा PMLA मामले पर लागू नहीं होती; क्योंकि यहां समाज के आर्थिक हितों व देश के वित्तीय स्वास्थ्य अहम

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति मधु जैन (Justice Madhu Jain)
याचिकाकर्ताराम सिंह (बाबाजी फाइनेंस ग्रुप)
जांच एजेंसीप्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate – ED)
कथित अपराध आयलगभग ₹26.18 करोड़ (Proceeds of Crime)
मुख्य कानूनी निष्कर्षPredicate Offence में मिली जमानत/संरक्षण PMLA मामले पर लागू नहीं होता।

Predicate Offence: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि मूल अनुसूचित अपराध (Predicate Offence/FIR) में मिली गिरफ्तारी से सुरक्षा स्वतः धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत शुरू की गई अलग और स्वतंत्र कार्यवाही पर लागू नहीं होती।

न्यायालय ने गंभीर आर्थिक अपराधों में गहरी साजिश और देश के वित्तीय ढांचे पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को रेखांकित करते हुए करीब ₹26.18 करोड़ की अपराध से हुई आय (Proceeds of Crime) से जुड़े एक कारोबारी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

मुख्य कानूनी बिंदु

  • स्वतंत्र और अलग कार्यवाही: मूल अपराध की प्राथमिकी में मिली अदालती सुरक्षा केवल उसी प्राथमिकी के संदर्भ में प्रभावी होती है। उसके आधार पर PMLA के तहत दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूर्व-गिरफ्तारी सुरक्षा (Pre-arrest Protection) का दावा नहीं किया जा सकता।
  • आर्थिक अपराधों पर सख्त पैमाना: अदालत ने दोहराया कि आर्थिक अपराध एक विशिष्ट श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। इनमें जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय सामान्य अपराधों की तुलना में अधिक गंभीर और सख्त दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
  • जांच में असहयोग: बार-बार समन जारी किए जाने के बावजूद व्यक्तिगत रूप से जांच में शामिल न होना जांच प्रक्रिया से बचने का प्रयास माना गया, जिससे धारा 45 PMLA की दोहरी शर्तें पूरी नहीं हुईं।

पीठ और मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति मधु जैन की एकल पीठ ने ‘बाबाजी फाइनेंस ग्रुप’ से जुड़े कारोबारी राम सिंह की अग्रिम जमानत याचिका पर 18 अगस्त को यह आदेश पारित किया।

  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) का आरोप: दिल्ली में आरोपी के आवास पर तलाशी लेने के बाद ईडी ने पर्याप्त आधार दर्ज करते हुए उसे मनी लॉन्ड्रिंग मामले का मुख्य षड्यंत्रकारी बताया। जांच में लगभग ₹26.18 करोड़ की अपराध की कमाई सीधे तौर पर याचिकाकर्ता से जुड़ी पाई गई।
  • याचिकाकर्ता की दलीलें:
    • याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मूल प्राथमिकी में मुख्य आरोप धोखाधड़ी, जाली दस्तावेजों और SARFAESI संपत्तियों के सौदों से जुड़े हैं, जो मुख्य रूप से अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ हैं।
    • याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसे मूल अपराध की प्राथमिकी में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की गई है, इसलिए वर्तमान मामले में भी उसे अग्रिम जमानत दी जानी चाहिए।

उच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष एवं कानूनी व्याख्या

न्यायमूर्ति मधु जैन ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व सुरक्षा के आधार पर जमानत देने की दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया: मूल अपराध में दी गई सुरक्षा केवल उस प्राथमिकी के संदर्भ में काम करती है और इसे स्वतः PMLA के तहत स्वतंत्र और अलग कार्यवाहियों तक विस्तारित नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता केवल इस आधार पर वर्तमान कार्यवाही में पूर्व-गिरफ्तारी सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता कि उसे मूल अपराध में ऐसी सुरक्षा मिली हुई है।

आर्थिक अपराधों की गंभीरता पर अदालत ने टिप्पणी की: ऐसे अपराध, विशेष रूप से जहां गहरी साजिशें और बड़े वित्तीय निहितार्थ शामिल होते हैं, समाज के आर्थिक हितों और देश के वित्तीय स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक अपराधों में जमानत पर विचार करते समय लगातार गंभीर दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है।

अग्रिम जमानत खारिज करने के आधार

  1. ₹26.18 करोड़ का वित्तीय साक्ष्य: रिकॉर्ड पर मौजूद वित्तीय लेन-देन का विश्लेषण, बैंक खातों का ब्योरा और PMLA की धारा 50 के तहत दर्ज बयान प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता को अपराध की कमाई से जोड़ते हैं।
  2. जांच एजेंसी के समन की अनदेखी: कई अलग-अलग तारीखों पर समन जारी होने के बाद भी याचिकाकर्ता या उसका कोई अधिकृत प्रतिनिधि ईडी के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। केवल वकील के जरिए एक लिखित जवाब भेजना जांच प्रक्रिया से बचने का प्रयास दर्शाता है।
  3. व्यक्तिगत उपस्थिति की आवश्यकता: डिजिटल व दस्तावेजी सबूतों के साथ आमना-सामना कराने और जांच को निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य है।
  4. PMLA की धारा 45: याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि वह इस अपराध का दोषी नहीं है।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने राम सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

मामले के मुख्य बिंदु और हाईकोर्ट का फैसला

  1. आरोपी का तर्क बनाम हाईकोर्ट की व्यवस्था:
    • आरोपी का तर्क: व्यवसायी के वकील ने तर्क दिया कि मुख्य धोखाधड़ी वाले अपराध (Predicate Offence) में सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम राहत मिली हुई है। मुख्य FIR में उन पर सीधे तौर पर धोखाधड़ी या फर्जी दस्तावेज बनाने के आरोप नहीं हैं।
    • हाईकोर्ट की व्यवस्था: जस्टिस मधु जैन ने कहा कि “मूल अपराध की FIR में मिला संरक्षण केवल उसी FIR तक सीमित है। PMLA के तहत चलने वाली कार्यवाही एक स्वतंत्र और पृथक (Distinct & Independent) कानूनी प्रक्रिया है, इसलिए आरोपी केवल मुख्य मामले में राहत के आधार पर PMLA में pre-arrest राहत का दावा नहीं कर सकता।”
  2. आर्थिक अपराध समाज के लिए गंभीर (Economic Offences):
    • हाईकोर्ट ने माना कि वित्तीय अपराधों को सामान्य अपराधों से अलग श्रेणी में देखा जाना चाहिए क्योंकि इनमें गहरी साजिशें शामिल होती हैं जो देश की आर्थिक सेहत को नुकसान पहुंचाती हैं। ऐसे मामलों में जमानत देते समय सख्त दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
  3. जांच में असहयोग और ₹26.18 करोड़ का मनी ट्रेल:
    • ED के अनुसार, मामले में लगभग ₹26.18 करोड़ की अपराध आय (Proceeds of Crime) का लिंक आरोपी से जुड़ता है।
    • बार-बार समन जारी होने के बावजूद आरोपी व्यक्तिगत रूप से ED के समक्ष पेश नहीं हुआ और केवल वकील के जरिए लिखित जवाब भेजता रहा, जिसे कोर्ट ने जांच प्रक्रिया से बचने का प्रयास माना।
  4. PMLA की धारा 45 (Twin Conditions) का पालन नहीं:
    • कोर्ट ने कहा कि आरोपी यह साबित करने में विफल रहा कि वह निर्दोष है और जमानत पर रहने के दौरान कोई अपराध नहीं करेगा। PMLA की धारा 50 के तहत दर्ज बयानों और बैंक ट्रेल को देखते हुए अग्रिम जमानत खारिज कर दी गई।

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