मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय न्यायाधीश | न्यायमूर्ति जसमीत सिंह (Justice Jasmeet Singh) |
| याचिकाकर्ता/प्रतिवादी | डॉ. संचारी घोष / नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) |
| मुख्य विवाद | FET-2024 फेलोशिप में गलत कट-ऑफ तारीख दर्शाकर अयोग्य उम्मीदवार द्वारा 9 महीने की ट्रेनिंग पूरी करना। |
| अंतिम निर्णय | उम्मीदवार का दाखिला रद्दीकरण बहाल; उम्मीदवार पर ₹1,000 और NBEMS पर ₹10,000 का जुर्माना। |
High-Stakes Exams: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में रेखांकित किया है कि प्रतियोगी एवं पेशेवर परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और शुचिता (Integrity) को बनाए रखने का दायित्व उम्मीदवारों और परीक्षा आयोजित करने वाले प्राधिकरणों—दोनों पर समान रूप से निर्भर करता है।
न्यायालय ने व्यवस्था दी कि न तो उम्मीदवार परीक्षा प्रणाली को हल्के में ले सकते हैं और न ही व्यवस्था उम्मीदवारों के साथ लापरवाही बरत सकती है।
High-Stakes Exams:पीठ और मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकल पीठ ने डॉ. संचारी घोष बनाम नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) एवं अन्य मामले में 18 अगस्त के अपने फैसले में यह टिप्पणी की।
डॉ. संचारी घोष ने एनबीईएमएस (NBEMS) द्वारा 22 मई 2026 को लिए गए उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत 2024 सत्र के लिए ‘एफएनबी कार्डिएक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी फेलोशिप’ (FNB Cardiac Electrophysiology Fellowship) की उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी।
डॉ. घोष ने फेलोशिप प्रवेश परीक्षा (FET)-2024 में 14वीं रैंक हासिल की थी और उन्हें बेंगलुरु स्थित नारायणा हृदयालय में सीट आवंटित हुई थी, जहां उन्होंने 18 अगस्त 2025 को फेलोशिप जॉइन कर ली थी।
पात्रता की शर्तों का उल्लंघन और तथ्य छिपाना
एफईटी-2024 (FET-2024) के नियमों के अनुसार, अभ्यर्थियों के पास 31 दिसंबर 2024 की कट-ऑफ तारीख तक आवश्यक स्नातकोत्तर योग्यता (DrNB कार्डियोलॉजी) होना अनिवार्य था।
अदालत ने पाया कि-
- याचिकाकर्ता डॉ. घोष की DrNB कार्डियोलॉजी की अंतिम परीक्षा जनवरी 2025 में आयोजित हुई थी और उनका प्रोविजनल पास सर्टिफिकेट 29 मई 2025 को जारी किया गया था।
- इसके बावजूद, डॉ. घोष ने अपने ऑनलाइन आवेदन पत्र में उत्तीर्ण होने की तारीख के रूप में ’31 दिसंबर 2024′ दर्ज किया और बाद में भी यह पुष्टि की कि वे पात्रता मानदंडों को पूरा करती हैं।
- न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने तीन मौकों पर अपनी पात्रता के संबंध में गलत तथ्य प्रस्तुत किए (Misrepresentation), इसलिए वे किसी भी प्रकार की साम्यिक राहत (Equitable Relief) की हकदार नहीं हैं। अदालत ने कोविड-19 के कारण हुई देरी के आधार पर फेलोशिप जारी रखने के उनके तर्क को भी खारिज कर दिया।
- अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 9 महीने का प्रशिक्षण पूरा कर लेने मात्र से उम्मीदवार का कोई निहित अधिकार (Vested Right) नहीं बन जाता, क्योंकि नियमों में अपात्रता पाए जाने पर बाद में भी दाखिला रद्द करने का स्पष्ट प्रावधान है।
NBEMS की लापरवाही पर सख्त रुख
अदालत ने जहां उम्मीदवार की उम्मीदवारी रद्द करने के फैसले को सही ठहराया, वहीं एनबीईएमएस (NBEMS) की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी फटकार लगाई।
अदालत ने कहा कि डॉ. घोष ने अपने फॉर्म में यह स्पष्ट लिखा था कि उन्होंने 16 अप्रैल 2022 को 3 वर्षीय DrNB कोर्स में दाखिला लिया था। इससे यह पूरी तरह स्पष्ट था कि वे 31 दिसंबर 2024 तक अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकती थीं। इसके बावजूद बोर्ड ने उन्हें परीक्षा में बैठने दिया, काउंसलिंग में भाग लेने दिया, फेलोशिप जॉइन करने दी और 9 महीने तक प्रशिक्षण लेने दिया। बोर्ड की यह लापरवाही 9 महीने बाद सामने आई।
संस्थागत जवाबदेही और हर्जाना
प्रतियोगी परीक्षाओं की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने कहा: भारत में प्रतियोगी और पेशेवर परीक्षाएं केवल अकादमिक अभ्यास नहीं हैं। लाखों छात्रों के लिए वे वर्षों की कड़ी तैयारी, त्याग और अनिश्चितता का प्रतिनिधित्व करती हैं और अक्सर उनके पेशेवर जीवन की दिशा तय करती हैं। यह चिकित्सा क्षेत्र में और भी अधिक लागू होता है, जहां सुपरस्पेशलिटी की सीमित सीटों के लिए बड़ी संख्या में योग्य डॉक्टर प्रयास करते हैं। यदि वह प्रक्रिया ही प्रभावित हो जाए जिसके माध्यम से योग्यता निर्धारित की जाती है, तो प्रतिभा का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
अदालत का अंतिम आदेश
- याचिकाकर्ता डॉ. संचारी घोष की याचिका खारिज करते हुए गलत जानकारी देने के लिए उन पर ₹1,000 का जुर्माना लगाया गया।
- परीक्षा व सत्यापन प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरतने और ‘संस्थागत जवाबदेही’ (Institutional Accountability) सुनिश्चित करने के लिए NBEMS पर ₹10,000 का जुर्माना (Cost) लगाया गया।
कानूनी प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (डॉ. संचारी घोष) की ओर से: अधिवक्ता शिवेंद्र सिंह, अंकुर सूद, कौशिक मिश्रा, शैलेश के. राजोरा, आर्यमा सिंह राजपूत, विश्वजीत सिंह राणा और दीपशिखा कुमार पेश हुए।
- प्रतिवादी (NBEMS) की ओर से: अधिवक्ता वाइज अली नूर, मृणाल कुमार शर्मा, वरुण राजावत और ज़िल्लुर रहमान ने पक्ष रखा।

