मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- नियोक्ता का अधिकार क्षेत्र शून्य: हाईकोर्ट ने कहा कि POSH एक्ट की धारा 18 (नियम 11 के साथ) के तहत नियोक्ता को अपना खुद का अपीलीय प्राधिकारी चुनने या बनाने की अनुमति नहीं है। अपील केवल सेवा नियमों में तय ‘अदालत या न्यायाधिकरण’ (Court/Tribunal) या औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के तहत अधिसूचित प्राधिकारी के समक्ष ही हो सकती है।
- बैंक द्वारा प्रक्रियात्मक अवैधता: मामले में याचिकाकर्ता को आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने पहले दोषमुक्त (Exonerated) कर दिया था। शिकायतकर्ता द्वारा बैंक के अपने ‘अपीलीय निकाय’ में अपील करने पर, याचिकाकर्ता को बिना कोई नोटिस या सुनवाई का अवसर दिए पुनः जांच के आदेश दिए गए।
- दूसरी जांच और दंड अवैध: दूसरी समिति के आधार पर बैंक ने याचिकाकर्ता पर जो पेनल्टी लगाई, कोर्ट ने उसे पूरी तरह अवैध और निष्प्रभावी (Non-est) घोषित कर दिया, क्योंकि पूरी प्रक्रिया एक अवैध अपीलीय प्राधिकरण के आदेश पर टिकी हुई थी।
- सार्वजनिक संस्थानों को चेतावनी: हाईकोर्ट ने बैंक के इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि गलत व्याख्या के कारण न केवल याचिकाकर्ता बल्कि शिकायतकर्ता महिला को भी गंभीर नुकसान पहुंचा है।
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत अपीलीय प्रक्रिया को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) द्वारा अपने एक वरिष्ठ अधिकारी पर लगाए गए बड़े दंड (Major Penalty) को रद्द करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पोश अधिनियम की धारा 18 और पोश नियमावली के नियम 11 के तहत किसी भी नियोक्ता (Employer) को अपनी मर्जी से कोई आंतरिक अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) बनाने या गठित करने का कोई कानूनी अधिकार या अधिकार-क्षेत्र प्राप्त नहीं है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी बिंदु
- अपील के लिए सक्षम वैधानिक मंच: अदालत ने स्पष्ट किया कि पोश अधिनियम की धारा 18 के अनुसार अपील लागू सेवा नियमों (Service Rules) के तहत सक्षम “अदालत या न्यायाधिकरण” (Court or Tribunal) में की जानी चाहिए। जहां ऐसे सेवा नियम नहीं हैं, वहां नियम 11 के अनुसार ‘औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946’ के तहत सरकार द्वारा अधिसूचित अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष ही अपील दायर हो सकती है।
- कानून को फिर से लिखने जैसी गलती: धारा 18 और नियम 11 की संयुक्त व्याख्या करते हुए खंडपीठ ने कहा कि इन प्रावधानों को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि नियोक्ता को अपनी पसंद का अपीलीय मंच बनाने की शक्ति मिल जाए; ऐसा करना कानून के मूल उद्देश्य को विफल करना होगा।
- अवैध प्राधिकरण द्वारा दिया गया आदेश अमान्य (Non-est): नियोक्ता द्वारा अपने स्तर पर बनाई गई अपीलीय संस्था क्षेत्राधिकार विहीन (Without Jurisdiction) है, इसलिए उसके द्वारा दिए गए आदेश कानून की नजर में पूरी तरह शून्य और अमान्य (Non-est) हैं।
पीठ की सख्त टिप्पणी
पीठ ने सार्वजनिक संस्थानों की कानूनी व्याख्या पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा: धारा 18 और नियम 11 को मिलाकर पढ़ने पर नियोक्ता को अपनी खुद की अपीलीय अथॉरिटी बनाने का कोई अधिकार या क्षेत्राधिकार नहीं मिलता। बैंक और अन्य ऐसे सार्वजनिक संस्थानों को कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय अत्यधिक सतर्क और सावधान रहना चाहिए, ताकि ऐसी भ्रामक व्याख्या से अव्यवस्था और अराजक स्थिति पैदा न हो।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- मूल कार्यवाही और दोषमुक्ति: याचिकाकर्ता अशोक उपाध्याय के खिलाफ अप्रैल 2023 में एक महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। बैंक की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने मामले की जांच के बाद 20 अप्रैल 2023 को उन्हें आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त (Exonerate) कर दिया था।
- बैंक के आंतरिक अपीलीय मंच में अपील: शिकायतकर्ता ने इस दोषमुक्ति के खिलाफ बैंक द्वारा बनाई गई ‘आंतरिक अपीलीय अथॉरिटी’ के समक्ष अपील दायर की।
- प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: उक्त आंतरिक प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता को कोई नोटिस दिए बिना और बिना उसका पक्ष सुने मामले की दोबारा जांच (Re-investigation) का आदेश दे दिया।
- दूसरी समिति और दंड: इसके बाद गठित दूसरी समिति ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहरा दिया, जिसके आधार पर बैंक ने उनका डिमोशन (SMGS-V से SMGS-III) करते हुए बड़ा दंड लगा दिया। इस दंड और अवैध अपीलीय प्रक्रिया के खिलाफ अधिकारी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अंतिम फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि सेवा नियमों या कानून के तहत उसे ऐसी आंतरिक अपीलीय समिति गठित करने की शक्ति कहां से मिली थी।अदालत ने पूरी प्रक्रिया को अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया और बैंक द्वारा लगाए गए दंड के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले की पीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा: धारा 18 और नियम 11 का संयुक्त अध्ययन नियोक्ता को कोई ऐसा अधिकार क्षेत्र प्रदान नहीं करता कि वह अपनी पसंद का अपीलीय प्राधिकरण गठित कर ले। यदि ऐसी व्याख्या की जाती है, तो यह कानून के मूल प्रावधानों को विफल करने जैसा होगा। यूनियन बैंक द्वारा बनाया गया आंतरिक अपीलीय निकाय पूरी तरह से बिना अधिकार क्षेत्र का था। बैंक और ऐसे अन्य सार्वजनिक संस्थानों को कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए, ताकि गलत व्याख्या से अराजकता की स्थिति न पैदा हो। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बैंक द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ पारित पेनल्टी आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | अशोक उपाध्याय बनाम यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Ashok Upadhyay v. Union Bank of India) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले |
| संबंधित कानून | POSH अधिनियम, 2013 की धारा 18 और POSH नियमावली का नियम 11 |
| अदालत का निर्णय | बैंक का पेनल्टी आदेश रद्द; नियोक्ता द्वारा गठित आंतरिक अपीलीय निकाय को अवैध और बिना अधिकार क्षेत्र (Without Jurisdiction) का माना। |

