मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- निर्धारित समय सीमा में भुगतान का आदेश: कोर्ट ने आयकर विभाग को 330 करोड़ से अधिक का रिफंड तुरंत जारी करने का निर्देश दिया। यदि 30 सितंबर तक यह राशि वोडाफोन-आइडिया के खाते में जमा नहीं होती है, तो वैधानिक ब्याज के ऊपर 1% प्रति माह की दर से अतिरिक्त ब्याज देना होगा।
- निर्णय के बाद रिफंड अधिकार है: हाईकोर्ट ने कहा कि जब इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) के आदेशों के बाद असेसिंग ऑफिसर (AO) रिफंड की गणना कर लेता है, तो यह करदाता (Assessee) का एक कानूनी और निहित अधिकार (Vested and Crystallised Right) बन जाता है।
- फॉर्म 26B (Form 26B) की बेतुकी मांग खारिज: आयकर विभाग रिफंड जारी करने के लिए कंपनी पर फॉर्म 26B जमा करने का दबाव बना रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 201 के तहत असेसमेंट पूरा होने के बाद विभाग या सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेल (CPC) करदाता को फॉर्म 26B भरने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
- पुराने टैक्स बकाए का दावा अमान्य: विभाग ने कंपनी पर ₹924.57 करोड़ की पुरानी बकाया मांग का हवाला दिया था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि इनमें से ₹913.66 करोड़ पर अदालतों द्वारा स्टे (Stay) दिया जा चुका था, और कानूनी रूप से धारा 245 का आदेश जारी किए बिना इस आधार पर रिफंड रोकना असंवैधानिक है।
- संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन: कोर्ट ने रिफंड रोकने की कार्रवाई को मनमाना, कानूनी रूप से अमान्य और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 300A का उल्लंघन माना।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वोडाफोन आइडिया लिमिटेड (Vodafone Idea Limited) को ₹53 करोड़ का टैक्स रिफंड जारी करने में अनावश्यक देरी पर आयकर विभाग (Income Tax Department) को कड़ी फटकार लगाई है।
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने 18 अगस्त को फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग को 30 सितंबर 2026 तक ब्याज सहित ₹53 करोड़ की पूरी राशि रिफंड करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि तय समय-सीमा तक रिफंड जारी नहीं किया गया, तो वैधानिक ब्याज के अलावा विभाग को 1% प्रति माह की दर से अतिरिक्त ब्याज भी चुकाना होगा। अदालत ने कहा कि रिफंड के मामलों में विभाग का यह रवैया एक “गंभीर और निराशाजनक तस्वीर” (Grim Picture) प्रस्तुत करता है [वोडाफोन आइडिया बनाम एसीआईटी]।
उच्च न्यायालय की मुख्य कानूनी टिप्पणियां
पीठ ने करदाता के रिफंड के अधिकार पर जोर देते हुए कहा: “एक बार जब किसी सक्षम निर्धारण अधिकारी (AO) द्वारा धारा 201 के तहत कर निर्धारण कर दिया जाता है या किसी अपीलीय प्राधिकारी द्वारा आदेश पारित कर दिया जाता है और उससे रिफंड बनता है, तो लागू ब्याज के साथ रिफंड प्राप्त करना करदाता का एक निहित और स्पष्ट (Vested and Crystallised) अधिकार बन जाता है।”
विभाग की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी: “यह मामला रिफंड से जुड़े मुद्दों पर आयकर विभाग में प्रचलित स्थिति की एक अत्यंत गंभीर और निराशाजनक तस्वीर पेश करता है। रिफंड को मनमाने ढंग से रोकना पूरी तरह से गैर-कानूनी है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।”
Tax Tribunal:मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- आईटीएटी (ITAT) के पक्ष में आदेश: विवाद निर्धारण वर्ष 2003-04 और 2008-09 से 2013-14 से संबंधित था। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने अप्रैल 2024 से फरवरी 2025 के बीच वोडाफोन आइडिया के पक्ष में आदेश दिए थे।
- रिफंड का निर्धारण: निर्धारण अधिकारी (AO) ने ट्रिब्यूनल के आदेशों को प्रभावी करते हुए कंपनी के लिए ₹53 करोड़ से अधिक का कुल रिफंड तय किया, लेकिन राशि जारी नहीं की।
- विभाग की आपत्तियां:
- विभाग ने रिफंड जारी करने के लिए कंपनी पर फॉर्म 26B (Form 26B) जमा करने का दबाव डाला।
- विभाग ने तर्क दिया कि कंपनी के पैन (PAN) और टैन (TAN) पर ₹924.57 करोड़ की बकाया मांगें लंबित हैं। हालांकि, इनमें से ₹913.66 करोड़ की मांग पर विभिन्न अदालतों द्वारा रोक (Stay) लगाई जा चुकी थी।
हाईकोर्ट द्वारा विभाग के तर्कों को खारिज करने के मुख्य आधार
- फॉर्म 26B की अनिवार्यता अनुचित: अदालत ने स्पष्ट किया कि आयकर अधिनियम की धारा 200A के तहत सीपीसी (CPC) द्वारा प्रारंभिक समायोजन के मामलों में फॉर्म 26B लागू होता है। धारा 201 के तहत अंतिम निर्धारण या अपीलीय आदेश के बाद अधिकारी करदाता को फॉर्म 26B जमा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
- धारा 245 के तहत वैधानिक आदेश का अभाव: अदालत ने रेखांकित किया कि धारा 245 के तहत औपचारिक कानूनी आदेश पारित किए बिना विभाग किसी भी रिफंड को रोक या समायोजित (Adjust) नहीं कर सकता। वोडाफोन के मामले में ऐसा कोई आदेश पारित नहीं किया गया था।
- मनमाना आचरण: बिना किसी सक्षम वैधानिक आदेश के रिफंड रोकना कानूनन पूरी तरह अस्वीकार्य है।
Tax Tribunal: परिणाम
अदालत ने टिप्पणी की कि हालांकि यह आयकर विभाग पर अनुकरणीय लागत (Exemplary Cost) लगाने का उपयुक्त मामला था, लेकिन अदालत ने इस बार नरमी बरतते हुए जुर्माना नहीं लगाया। विभाग को 30 सितंबर तक पूरा भुगतान करने का अंतिम अल्टीमेटम दिया गया है।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की: “यह मामला रिफंड से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में आयकर विभाग में व्याप्त कार्यप्रणाली की एक बेहद निराशाजनक तस्वीर (Grim Picture) पेश करता है। एक बार जब अपीलीय प्राधिकरण के आदेश के बाद रिफंड तय हो जाता है, तो ब्याज सहित रिफंड पाना करदाता का निहित अधिकार बन जाता है।”
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| केस शीर्षक | वोडाफोन-आइडिया बनाम एसीआईटी (Vodafone Idea v. ACIT) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता |
| संबंधित राशि | ₹53 करोड़ (टैक्स रिफंड और ब्याज) |
| अदालत का निर्देश | 30 सितंबर 2026 तक भुगतान करें; देरी होने पर 1% प्रति माह का अतिरिक्त ब्याज लगेगा। |

