मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- कोई कानूनी दायित्व नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंधों को निभाने और सम्मान देने का कानूनी कर्तव्य केवल पति का था। दूसरी महिला (कथित प्रेमिका) पर पति की तरफ से की गई किसी भी पहल (Advances) को रोकने या ठुकराने की कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
- केवल सहमति से संबंध होना काफी नहीं: अदालत ने टिप्पणी की कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बना विवाहेतर संबंध (Extramarital Relationship) या उससे किसी बच्चे का जन्म होना, स्वतः ही ‘स्नेह के अलगाव’ (Alienation of Affection) का टॉर्ट (Tort) साबित नहीं करता।
- पूर्व से वैवाहिक संबंधों में कड़वाहट: जिरह के दौरान पत्नी ने स्वीकार किया कि शादी के शुरुआती दो-तीन सालों के बाद से ही उनके बीच शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक कड़वाहट थी तथा पति ने उससे दूरी बना ली थी। कोर्ट ने माना कि जब शादी में पहले से ही प्रेम नहीं था, तो किसी तीसरे व्यक्ति पर स्नेह चुराने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
- साक्ष्य की कमी: याचिकाकर्ता का दावा एक ड्राइवर से मिली जानकारी पर आधारित था, जिसकी गवाही से पहले ही मृत्यु हो गई थी। कोर्ट ने कहा कि केवल आशंकाएं या पुरानी बातें सबूत का स्थान नहीं ले सकतीं।
- परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) पर रुख: कोर्ट ने प्रतिवादियों की यह दलील खारिज कर दी कि मुकदमा समय सीमा से बाहर (Time-barred) था। कोर्ट ने कहा कि स्नेह का अलगाव एक ‘सतत कृत्य’ (Continuing Wrong) है, इसलिए परिसीमा का मुद्दा बाधा नहीं है।
नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने एक विवाहित महिला द्वारा अपने पति की कथित प्रेमिका से ₹50 लाख का हर्जाना मांगने वाले दीवानी मुकदमे को खारिज कर दिया है। महिला ने आरोप लगाया था कि उक्त महिला ने उसके पति का प्यार व स्नेह चुराकर (Alienation of Affection) उसकी शादीशुदा जिंदगी बर्बाद कर दी।
साकेत कोर्ट के जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत ने 20 अगस्त को फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही कि दूसरी महिला ने सक्रिय रूप से पति को वैवाहिक बंधन तोड़ने या पत्नी को छोड़ने के लिए उकसाया था।
अदालत की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने ‘एलिनेशन ऑफ अफेक्शन’ (Alienation of Affection – AoA) के अपकृत्य (Tort) के तत्वों पर स्पष्ट किया: “केवल इसलिए कि दो वयस्कों ने विवाह से इतर आपसी सहमति से यौन संबंध बनाए और उससे एक बच्चे का जन्म हुआ, स्वतः ‘एलिनेशन ऑफ अफेक्शन’ के अपकृत्य की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता।”
वैवाहिक दायित्वों की सीमा पर अदालत ने कहा: “वैवाहिक संबंधों का सम्मान करने का कानूनी व नैतिक कर्तव्य केवल पति पर था। प्रतिवादी महिला पर ऐसा कोई कानूनी दायित्व नहीं था कि वह पति द्वारा की गई पहलों या प्रस्तावों को दूर धकेलती। कानून के तहत तीसरी पार्टी पर इस तरह का दायित्व नहीं थोपा जा सकता।”
‘Alienation of Affection’ के लिए क्या साबित करना जरूरी है?
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पिनाकिन महीपतराव रावल बनाम गुजरात राज्य का संदर्भ देते हुए बताया कि इस तरह के मामले में राहत पाने के लिए तीन आवश्यक शर्तें साबित होनी चाहिए:
- तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से पहले पति-पत्नी के बीच वास्तविक वैवाहिक स्नेह और प्रेम मौजूद था।
- वह स्नेह पूरी तरह नष्ट हो गया।
- स्नेह का यह विनाश सीधे तौर पर तीसरे पक्ष के दुर्भावनापूर्ण और जानबूझकर किए गए आचरण के कारण हुआ।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी के आकर्षण का निष्क्रिय माध्यम (Passive Object) बनने से कोई व्यक्ति उत्तरदायी नहीं हो जाता।
अदालत द्वारा दावा खारिज किए जाने के मुख्य आधार
अदालत ने पाया कि पत्नी अपने दावों को पुख्ता साक्ष्यों के जरिए साबित नहीं कर सकी:
- पहले से वैवाहिक तनाव और दुर्व्यवहार: जिरह (Cross-examination) के दौरान पत्नी ने खुद स्वीकार किया कि शादी के पहले दो-तीन सालों के बाद से ही उनके बीच शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक शोषण की घटनाएं होती थीं और संबंध सामान्य नहीं थे। अतः यह साबित नहीं हुआ कि दूसरी महिला के आने से पहले उनका वैवाहिक जीवन सुखद था।
- प्रत्यक्ष साक्ष्य का अभाव: पत्नी के आरोप केवल संदेह और अपने पूर्व ड्राइवर से मिली कथित बातों पर आधारित थे। ड्राइवर की गवाही से पहले ही मृत्यु हो जाने के कारण इसे कानूनी रूप से प्रमाणित साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
- उकसावे का कोई सबूत नहीं: रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला जिससे साबित हो कि दूसरी महिला ने पति को घर छोड़ने के लिए प्रेरित किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
- विवाह और अलगाव: दंपत्ति का विवाह नवंबर 2001 में हुआ था। पत्नी के अनुसार, 2009 में अमेरिका यात्रा के बाद पति का दूसरी महिला के साथ संबंध शुरू हुआ और उसने जनवरी 2013 में वैवाहिक घर छोड़ दिया।
- मुकदमा: पत्नी ने आरोप लगाया कि दूसरी महिला ने जानते हुए भी कि वह शादीशुदा है, उसके पति का स्नेह छीना और 2015 में विवाह कर 2016 में एक बच्ची को जन्म दिया।
- हर्जाने की मांग: पत्नी ने मानसिक प्रताड़ना और साहचर्य के नुकसान के लिए शुरू में ₹1 करोड़ का दावा किया था, जिसे बाद में घटाकर ₹50 लाख कर दिया गया। पति को केवल एक औपचारिक प्रतिवादी (Pro-forma Defendant) बनाया गया था।
मियाद (Limitation) पर कानूनी व्यवस्था
प्रतिवादियों ने तर्क दिया था कि यह मुकदमा समय-सीमा (Time-barred) से बाहर है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ‘स्नेह का अलगाव’ (Alienation of Affection) परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) की धारा 22 के तहत एक निरंतर चलने वाला गलत कृत्य (Continuing Wrong) है, और कथित हस्तक्षेप के हर क्षण एक नई मियाद अवधि शुरू होती है। हालांकि, मूल दावों में योग्यता और ठोस साक्ष्य न होने के कारण अदालत ने पत्नी का वाद पूरी तरह खारिज कर दिया।
साकेत कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत ने अपने आदेश में कहा: “वैवाहिक संबंधों को बनाए रखने का कर्तव्य केवल पति (प्रतिवादी संख्या 2) पर था। प्रतिवादी संख्या 1 (कथित प्रेमिका) पर ऐसा कोई दायित्व कानून के तहत नहीं डाला जा सकता कि वह पति द्वारा की गई किसी भी पहल को रोके। किसी व्यक्ति को केवल इसलिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता कि वह किसी अन्य व्यक्ति के आकर्षण या स्नेह का निष्क्रिय केंद्र (Passive Object) बन गया था।”
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | साकेत जिला न्यायालय, नई दिल्ली (Saket District Court, New Delhi) |
| पीठासीन न्यायाधीश | जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत (District Judge Atul Ahlawat) |
| मुख्य मुद्दा | पति के स्नेह का अलगाव (Alienation of Affection) और ₹50 लाख का मुआवजा |
| पति-पत्नी का विवाह | नवंबर 2001 |
| अदालत का निर्णय | याचिका पूरी तरह खारिज; कोई मुआवजा नहीं। |

