Thursday, October 15, 2026
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Wearing Hizab: स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली मुस्लिम छात्रा की याचिका पर जवाब; हिजाब पहनना आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कर्नाटक हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का हिजाब पर दिया गया फैसला एक बेहद प्रभावी नजीर (Persuasive Authority) है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट में स्प्लिट वर्डिक्ट (Split Verdict) के बाद अंतिम फैसला आना बाकी है, इसलिए कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश ही प्रभावी माना जाएगा।
  • अनिवार्य धार्मिक अभ्यास का अभाव: कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई धार्मिक ग्रंथ या तथ्यात्मक सामग्री पेश नहीं कर सकी, जो यह साबित करे कि कक्षा के भीतर हिजाब न पहनने से उसके धर्म का मौलिक चरित्र बदल जाएगा या यह एक अनिवार्य धार्मिक दायित्व है।
  • पुराने बर्ताव से अधिकार नहीं बनता: छात्रा का तर्क था कि वह कक्षा 6 से हिजाब पहनकर आ रही थी और अब कक्षा 11 में उसे मना किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि अतीत में स्कूल की ढिलाई या हिचकिचाहट के कारण छूट मिलने से छात्रा को भविष्य में यूनिफॉर्म नीति में बदलाव या छूट मांगने का कोई विधिक अधिकार (Estoppel) नहीं मिल जाता।
  • यूनिफॉर्म का उद्देश्य: कोर्ट ने रेखांकित किया कि स्कूल ड्रेस कोड बच्चों में समानता लाती है, भेदभाव खत्म करती है और एक धर्म-निरपेक्ष माहौल (Religion-neutral atmosphere) तैयार करती है।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब (हेडस्कार्फ) पहनने की अनुमति मांगने वाली एक मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज कर दी है।

न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने 21 अगस्त को फैसला सुनाते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्ण पीठ के फैसले को अत्यधिक प्रभावशाली और मान्य माना। अदालत ने फैसला सुनाया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब पहनना इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक आचरण (Essential Religious Practice) नहीं है और स्कूल प्रबंधन को अनुशासन व समानता बनाए रखने के लिए गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस कोड लागू करने का पूर्ण अधिकार है [सुकैना रिज़वी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां

पीठ ने अनुच्छेद 25 के तहत अधिकारों के दावे पर कहा: “केवल दावा करने मात्र से संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि इसके लिए आवश्यक तथ्यात्मक और कानूनी आधार न रखा जाए। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई धार्मिक ग्रंथ या सामग्री पेश नहीं की गई जिससे यह साबित हो सके कि कक्षा के भीतर हिजाब पहनना अनिवार्य है और इसका पालन न करने से याचिकाकर्ता के धर्म का मूल चरित्र बदल जाएगा।”

स्कूल यूनिफॉर्म के महत्व पर अदालत ने कहा: “निर्धारित यूनिफॉर्म बच्चों में अनुशासन, समानता और संस्थागत पहचान स्थापित करती है तथा कक्षा के भीतर किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करती है। यूनिफॉर्म का नियम एक ‘धर्म-तटस्थ वातावरण’ (Religion-Neutral Atmosphere) को बढ़ावा देता है क्योंकि यह किसी भी छात्र को उसके धर्म के आधार पर अलग किए बिना सभी पर समान रूप से लागू होता है।”

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कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का प्रभाव

  • सुप्रीम कोर्ट में स्प्लिट वर्डिक्ट: अदालत ने रेखांकित किया कि कर्नाटक हाईकोर्ट के हिजाब बैन के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जजों की खंडित राय (Split Verdict) के बाद मामला बड़ी पीठ के समक्ष लंबित है और शीर्ष अदालत का कोई अंतिम निर्णय अभी तक नहीं आया है।
  • कर्नाटक फैसले की प्रासंगिकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि जब तक सुप्रीम कोर्ट अंतिम फैसला नहीं देता, तब तक कर्नाटक हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का निर्णय एक अत्यधिक मूल्यवान और प्रेरक मिसाल (Persuasive Authority) बना हुआ है, और उससे अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई ठोस कारण नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद

  • 11वीं में प्रवेश से इनकार का मामला: प्रयागराज के अतरसुइया स्थित ‘टैगोर पब्लिक स्कूल’ की छात्रा सुकैना रिज़वी ने आरोप लगाया था कि स्कूल प्रशासन ने उसे 11वीं कक्षा में प्रवेश देने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया क्योंकि वह हिजाब पहनना चाहती थी।
  • याचिकाकर्ता का तर्क: छात्रा ने दलील दी कि वह कक्षा 6 से ही स्कूल में हिजाब पहनकर आ रही थी और यह उसका धार्मिक अधिकार है।
  • स्कूल का रुख: स्कूल प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि निर्धारित ड्रेस कोड के अलावा अतिरिक्त हेडस्कार्फ की अनुमति देना स्कूल की यूनिफॉर्म नीति का उल्लंघन होगा।

पूर्व में हिजाब पहनने पर ‘एस्ट्रोपेल’ (Estoppel) लागू नहीं

अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि पहले आपत्ति न होने के कारण अब स्कूल उसे रोक नहीं सकता: “अतीत में निचली कक्षाओं में पढ़ते समय स्कूल ने सुस्ती, अनिच्छा, यूनिफॉर्म नीति को लागू न करने या केवल संकोच के कारण आपत्ति नहीं जताई होगी, लेकिन यह स्कूल के खिलाफ कोई विबंध (Estoppel) नहीं बनता जब वह अपनी ड्रेस कोड नीति को सख्ती से लागू करने का फैसला करता है।”

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: “ऐसा कोई रिकॉर्ड या धार्मिक पाठ्य सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई है जो यह स्थापित करे कि मुस्लिम महिला के लिए सिर पर स्कार्फ पहनना धर्म का अनिवार्य हिस्सा है। निर्धारित यूनिफॉर्म अनुशासन और बच्चों में समानता की भावना लाती है। जब तक ड्रेस कोड भेदभाव रहित और संस्थागत पहचान बनाए रखने के लिए है, तब तक यूनिफॉर्म का चयन मुख्य रूप से स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है

अंतिम आदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रही कि हिजाब पहनना अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। स्कूल का ड्रेस कोड धर्मनिरपेक्ष, निष्पक्ष और संस्थागत अनुशासन के हित में है। तदनुसार, खंडपीठ ने छात्रा की रिट याचिका को खारिज कर दिया।

Wearing Hizab: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणविवरण जानकारी
केस शीर्षकसुकैना रिजवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Sukaina Rizvi v. State of UP and Others)
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठ (Bench)न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला
संबंधित संस्थानटैगोर पब्लिक स्कूल, अतरसुइया, प्रयागराज
अदालत का निर्णययाचिका खारिज; हिजाब को अनिवार्य धार्मिक अभ्यास मानने से इनकार।
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