हाईकोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां और संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 17 का सीधा उल्लंघन: न्यायालय ने कहा कि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को केवल उसकी जाति के कारण मंदिर में प्रवेश करने से रोकना अनुच्छेद 17 (Article 17) का उल्लंघन है, जो अस्पृश्यता का पूरी तरह से उन्मूलन करता है।
- आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी: कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी कि जाति के आधार पर किसी को धार्मिक स्थल से बाहर रखने या प्रवेश रोकने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कानून के तहत आपराधिक मुकदमा (Prosecution) चलाया जाएगा।
- वैधानिक अधिकार (Statutory Safeguards): न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने तमिलनाडु टेम्पल एंट्री ऑथराइजेशन एक्ट, 1947 (Tamil Nadu Temple Entry Authorisation Act, 1947) का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून स्पष्ट रूप से जाति के आधार पर मंदिरों में प्रवेश या त्योहारों में भागीदारी पर प्रतिबंध लगाने को अवैध घोषित करता है।
- प्रशासनिक विवेक नहीं, संवैधानिक अधिकार: अदालत ने रेखांकित किया कि पूजा स्थलों में प्रवेश की समानता केवल प्रशासनिक मेहरबानी या विवेक का विषय नहीं है, बल्कि यह संविधान द्वारा संरक्षित एक मौलिक अधिकार है।
चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने पूजा स्थलों पर समानता और सामाजिक न्याय को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती की एकल पीठ ने सेलम निवासी वी. सुंदरम द्वारा दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी अनुसूचित जाति (SC) के व्यक्ति को जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश करने या किसी धार्मिक उत्सव में भाग लेने से रोकना ‘अस्पृश्यता’ (Untouchability) का आचरण है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. अनुच्छेद 17 का उल्लंघन और आपराधिक दायित्व जातिगत भेदभाव पर कड़ा रुख अपनाते हुए अदालत ने रेखांकित किया: “किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति को केवल उसकी जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश करने या उत्सव में भाग लेने से रोकना अस्पृश्यता का आचरण करने के समान है। यह संविधान के अनुच्छेद 17 का खुला उल्लंघन है, जो अस्पृश्यता का पूर्ण उन्मूलन करता है। ऐसा कृत्य करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत आपराधिक मुकदमा (Prosecution) चलाया जा सकता है।”
2. पूजा स्थलों में समानता महज प्रशासनिक विवेकाधिकार नहीं अदालत ने ‘तमिलनाडु मंदिर प्रवेश अधिकार अधिनियम, 1947’ (Tamil Nadu Temple Entry Authorisation Act, 1947) का हवाला देते हुए कहा:
- कानून किसी भी व्यक्ति को जाति या पंथ के आधार पर मंदिर में प्रवेश या उत्सवों में भाग लेने से रोकने पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाता है।
- धार्मिक स्थलों में समानता का अधिकार कोई प्रशासनिक रियायत नहीं, बल्कि संविधान और वैधानिक कानूनों द्वारा संरक्षित एक मजबूत अधिकार है।
मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता की मांग
- मंदिर रथोत्सव में भागीदारी का विवाद: सेलम के याचिकाकर्ता वी. सुंदरम ने ‘अरुलमिगु मुथु मरियम्मन मंदिर’ के रथ उत्सव में ‘मिलागु कट्टन आदि द्रविड़’ (Milagu Kattan Adi Dravidar) समुदाय के सदस्यों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टर को निर्देश देने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।
- शांति समिति की बैठक और सरकारी आश्वासन: सुनवाई के दौरान विशेष सरकारी वकील ने अदालत को अवगत कराया कि प्रशासन द्वारा एक शांति समिति (Peace Committee) की बैठक पहले ही बुलाई जा चुकी है और सभी समुदायों के सदस्यों को बिना किसी भेदभाव के उत्सव में शामिल होने की अनुमति दे दी गई है।
- भविष्य की सुरक्षा की मांग: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यद्यपि इस वर्ष समुदाय को भाग लेने की अनुमति मिल गई है, लेकिन भविष्य में ऐसे आयोजनों में स्थायी और निर्बाध भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
अंतिम आदेश
मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिका को निस्तारित (Closed) कर दिया और यह सख्त चेतावनी जारी की कि भविष्य में भी जाति के आधार पर मंदिर प्रवेश या धार्मिक भागीदारी से वंचित करने पर अस्पृश्यता उन्मूलन कानूनों के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
Cast Wise Entry: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती |
| याचिकाकर्ता | वी. सुंदरम (सेलम निवासी) |
| संबंधित मंदिर/उत्सव | अरुलमिगु मुथु मरिअम्मन मंदिर रथोत्सव (Arulmigu Muthu Mariamman Temple Chariot Festival) |
| उल्लेखित प्रासंगिक कानून/अनुच्छेद | संविधान का अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) एवं तमिलनाडु टेम्पल एंट्री ऑथराइजेशन एक्ट, 1947 |

