केरल हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- BNS की धारा 69 के तहत अपराध सिद्ध न होना: अदालत ने BNS की धारा 69 का हवाला देते हुए कहा कि यह धारा तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति बिना किसी इरादे के शादी का झूठा वादा करके या धोखे से महिला की सहमति प्राप्त करता है।
- विवाह कायम होने पर ‘शादी के वादे’ का दावा अमान्य: पीठ ने कहा कि जब महिला का पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त ही नहीं हुआ है, तो शादी के वादे का कोई कानूनी अर्थ नहीं रह जाता:“जब शिकायतकर्ता का विवाह कायम है और उसका पति जीवित है, तो एक विवाहित महिला जो स्वेच्छा से किसी अन्य पुरुष के साथ होटल के कमरे में जाती है और यौन संबंध बनाती है, वह केवल शादी के वादे के आरोप के आधार पर यह तर्क नहीं दे सकती कि संबंध केवल इसी वादे से प्रेरित थे।” — केरल हाईकोर्ट
- समझौता और सामाजिक हित: यद्यपि दोनों पक्षों के बीच विवाद का निपटारा (Settlement) हो गया था, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 69 जैसे गंभीर मामलों को केवल आपसी समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। हालांकि, चूंकि इस मामले में अपराध के कानूनी तत्व (Essential Ingredients) ही मौजूद नहीं थे, इसलिए कार्यवाही जारी रखना न्याय का दुरुपयोग होगा।
कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69 (शादी के झूठे वादे या धोखे से संबंध बनाना) के दायरे और कानूनी प्रयोज्यता पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया है।
न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 (पूर्ववर्ती 482 CrPC) के तहत आरोपी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए BNS की धारा 69 और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66E के तहत दर्ज एफआईआर और सभी परिणामी कार्यवाहियों को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई विवाहित महिला स्वेच्छा से किसी अन्य पुरुष के साथ होटल के कमरे में जाती है और शारीरिक संबंध बनाती है, तो वह केवल शादी के वादे का आरोप लगाकर यह दावा नहीं कर सकती कि यह संबंध मात्र उस वादे के आधार पर बना था—विशेष रूप से तब जब उसका वैवाहिक जीवन अस्तित्व में हो और पति जीवित हो [आपराधिक याचिका संख्या (BNSS धारा 528 के तहत)]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. मौजूदा विवाह के रहते शादी के झूठे वादे का दावा टिकाऊ नहीं पीठ ने शिकायतकर्ता की वैवाहिक स्थिति और सहमति के तत्वों का विश्लेषण करते हुए कहा: “वर्तमान मामले में यह निर्विवाद है कि मूल शिकायतकर्ता एक विवाहित महिला है और उसके दो बच्चे हैं। प्रथम सूचना विवरण (FIS) से यह भी स्पष्ट है कि उसका पति जीवित है और उनका वैवाहिक संबंध अस्तित्व में है। ऐसी परिस्थितियों में, एक विवाहित महिला जो स्वेच्छा से किसी अन्य पुरुष के साथ होटल के कमरे में जाती है और शारीरिक संबंध बनाती है, वह केवल शादी के वादे के आरोप के आधार पर यह तर्क नहीं दे सकती कि यह यौन संबंध केवल उसी वादे से प्रेरित होकर बना था।”
2. धारा 69 BNS के आवश्यक तत्वों का अभाव
- अदालत ने रेखांकित किया कि BNS की धारा 69 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी ने पीड़िता को ‘धोखे से’ या ‘बिना किसी पूरा करने के इरादे से शादी का वादा कर’ संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया।
- जब महिला स्वयं कानूनी रूप से विवाहित थी और दूसरा विवाह करना कानूनन संभव नहीं था, तो यह नहीं कहा जा सकता कि शारीरिक संबंध के लिए सहमति किसी झूठे वादे या कपटपूर्ण साधन (Deceitful Means) से प्राप्त की गई थी।
3. केवल आपसी समझौते के आधार पर यौन अपराध रद्द करने पर रोक
- अदालत को बताया गया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है और महिला मुकदमा जारी नहीं रखना चाहती।
- इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों में व्यापक ‘सामाजिक हित’ (Societal Interest) जुड़ा होता है, इसलिए केवल समझौते के आधार पर ऐसे मुकदमों को रद्द नहीं किया जा सकता। हालांकि, जब मामले के बुनियादी तथ्यों से ही अपराध के तत्व सिद्ध न होते हों, तो कार्यवाही रद्द करना अनिवार्य हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि (कोवलम के होटल का मामला)
- अभियोजन का आरोप: अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने शादी का झूठा झांसा देकर शिकायतकर्ता को 3 नवंबर 2025 को कोवलम स्थित एक होटल में बुलाया, जहां खाने में कथित तौर पर कोई नशीला पदार्थ मिलाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। यह भी आरोप था कि उसने आपत्तिजनक तस्वीरें खींचकर व्हाट्सएप पर भेजीं।
- एफआईआर: महिला की शिकायत पर पुलिस ने BNS की धारा 69 और आईटी एक्ट की धारा 66E के तहत मामला दर्ज किया था।
- याचिकाकर्ता की दलील: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि महिला स्वयं बालिग व विवाहित है और पूरा घटनाक्रम सहमति आधारित था, जिसमें धारा 69 के तहत कोई विधिक अपराध नहीं बनता।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- कार्यवाही जारी रखना निष्फल: अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री BNS की धारा 69 के तहत किसी भी संज्ञेय अपराध के गठन का खुलासा नहीं करती और आपराधिक मुकदमे को जारी रखने से कोई न्यायोचित उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
- एफआईआर रद्द (FIR Quashed): एकल पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और सभी आगामी कानूनी कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया।
विधिक विवरण
- प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69; सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2008 की धारा 66E; एवं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (आरोपी) की ओर से: अधिवक्ता मिथुन पी.
- प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: वरिष्ठ लोक अभियोजक (Senior Public Prosecutor) मेघा के. जेवियर
- पीठ: न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन (केरल उच्च न्यायालय)
Women Sex Relation: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन |
| मुख्य विषय | विवाहित महिला द्वारा BNS धारा 69 के तहत ‘शादी के झूठे वादे’ पर यौन संबंध का दावा |
| संबंधित कानून | भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 69 और IT एक्ट की धारा 66E |
| अदालत का निर्णय | याचिका स्वीकार; FIR और आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह रद्द। |

