Monday, September 14, 2026
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Biological Father: डीएनए रिपोर्ट ने पिता के जैविक पितृत्व को किया सिद्ध; नाबालिग बेटी से दुष्कर्म और गर्भवती करने वाले पिता की सजा बरकरार, यह पढ़ें

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • डीएनए रिपोर्ट से अकाट्य पुष्टि: अभियुक्त के वकील ने यह तर्क देने की कोशिश की कि किसी अन्य व्यक्ति ने भी पीड़िता का शोषण किया था, इसलिए केवल पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, राज्य के सरकारी वकील जी. करुपसामी पांडियन ने डीएनए साक्ष्यों को निर्णायक बताया। अदालत ने माना:“बाल पीड़िता ने स्पष्ट शब्दों में साक्ष्य दिए हैं कि अभियुक्त लगातार उसके साथ यौन उत्पीड़न कर रहा था। स्कैन रिपोर्ट से साबित हुआ कि पीड़िता 21 सप्ताह से अधिक की गर्भवती थी और डीएनए रिपोर्ट ने साबित कर दिया कि अभियुक्त ही उस भ्रूण का जैविक पिता (Biological Father) है।”मद्रास हाईकोर्ट
  • संरक्षक ही बना भक्षक: अदालत ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि जिस मां-विहीन बच्ची को अपने पिता के साये में सुरक्षित रहना चाहिए था, उसे उसके अपने पिता के हाथों ही अत्यंत क्रूर स्थिति का सामना करना पड़ा।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने रिश्ते को कलंकित करने वाले और नाबालिग बच्ची के साथ यौन शोषण के एक अत्यंत गंभीर मामले में कठोर रुख अपनाते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति ए.डी. जगदीश चंदीरा और न्यायमूर्ति बी. मुरुगेसन की खंडपीठ ने तंजावुर की विशेष पोक्सो (POCSO) अदालत के फैसले के खिलाफ दोषी पिता द्वारा दायर आपराधिक अपील का निस्तारण करते हुए व्यवस्था दी कि अभियुक्त को अपने ‘स्वाभाविक जीवन के अंत तक’ (Remainder of Natural Life) आजीवन कारावास की सजा काटनी होगी। अदालत ने अपनी ही 15 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ लगातार दुष्कर्म कर उसे गर्भवती करने वाले कलयुगी पिता की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता के बयानों और भ्रूण के डीएनए (DNA) साक्ष्य ने अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है कि गर्भस्थ शिशु का जैविक पिता स्वयं अभियुक्त ही था।

दक्षिण अफ्रीकी कवयित्री की पंक्तियों का उद्धरण

फैसले में बच्ची की सुरक्षा और उस पर टूटे अत्याचार को रेखांकित करते हुए खंडपीठ ने दक्षिण अफ्रीकी कवयित्री डॉ. गिफ्ट गुगु मोना (Dr Gift Gugu Mona) की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों को उद्धृत किया:

“Save her from the claws of the enemy / Shield her against any brutality.”

(उसे दुश्मन के चंगुल से बचाओ / किसी भी क्रूरता और बर्बरता से उसकी रक्षा करो।)

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उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. डीएनए साक्ष्य ने जैविक पितृत्व को अकाट्य रूप से किया सिद्ध खंडपीठ ने 2 सितंबर 2026 के अपने आदेश में वैज्ञानिक साक्ष्यों और पीड़िता की गवाही का विश्लेषण करते हुए कहा: “बाल पीड़िता ने स्पष्ट और असंदिग्ध शब्दों में गवाही दी है कि जनवरी 2019 में उसके यौवनारंभ (Puberty) के बाद से अभियुक्त लगातार उसके साथ ऐसा गंभीर प्रवेशन यौन हमला (Penetrative Sexual Assault) कर रहा था। 30 जून 2020 की स्कैन रिपोर्ट दर्शाती है कि पीड़िता के गर्भ में 21 सप्ताह और 3 दिन का भ्रूण था। डीएनए रिपोर्ट ने यह भी पूरी तरह सिद्ध कर दिया है कि पीड़िता से निकाले गए भ्रूण का जैविक पिता स्वयं अभियुक्त (पिता) ही है।”

2. प्राकृतिक जीवन के अंत तक आजीवन कारावास (Sentence Modification)

  • ट्रायल कोर्ट ने आदेश दिया था कि अभियुक्त किसी भी छूट (Commutation/Remission) का पात्र नहीं होगा और पूरी जिंदगी जेल में रहेगा।
  • हाईकोर्ट ने तकनीकी रूप से “बिना छूट” (Without Commutation) वाले वाक्यांश को संशोधित करते हुए भारतीय दंड संहिता/पोक्सो एक्ट के वैधानिक ढांचे के अनुरूप इसे स्पष्ट किया:“अभियुक्त को आजीवन कारावास की सजा भुगतनी होगी, जिसका अर्थ एकमात्र अभियुक्त के ‘स्वाभाविक जीवन के शेष काल तक कारावास’ (Imprisonment for the remainder of natural life) होगा।”

3. दूसरे व्यक्ति द्वारा कथित शोषण की दलील खारिज

  • बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि एक पड़ोसी ने भी बच्ची का शोषण किया था, इसलिए केवल पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
  • अदालत और सरकारी वकील ने स्पष्ट किया कि डीएनए रिपोर्ट ने निर्विवाद रूप से यह तय कर दिया कि गर्भ के लिए केवल पिता ही जिम्मेदार था, जो दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए पूरी तरह निर्णायक और पर्याप्त है।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (तंजावुर का मामला)

  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: पीड़िता का जन्म 2004 में हुआ था। मां के निधन के बाद बच्ची और उसका छोटा भाई मौसी की देखरेख में रह रहे थे।
  • पिता की अभिरक्षा और शोषण: मई 2016 में पिता ने बच्चों की अभिरक्षा अपने हाथ में ली। रिकॉर्ड के अनुसार, अगस्त 2017 से ही पिता ने बच्ची का यौन शोषण करना शुरू कर दिया था।
  • गर्भधारण और चिकित्सीय समापन: 2019 में पेट दर्द की शिकायत के बाद बच्ची को अस्पताल ले जाया गया, जहां वह लगभग 5 महीने की गर्भवती पाई गई। जुलाई 2020 में अदालत के आदेश से गर्भ का चिकित्सीय समापन (MTP) कराया गया।
  • फोरेंसिक जांच: भ्रूण को संरक्षित कर फोरेंसिक जांच (FSL) के लिए भेजा गया, जहां डीएनए मिलान में पिता का डीएनए भ्रूण से 100% मैच हुआ।
  • ट्रायल कोर्ट का फैसला: तंजावुर की ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को पोक्सो अधिनियम और आईपीसी की संबंधित धाराओं में दोषी ठहराते हुए अंतिम सांस तक आजीवन कारावास और ₹50,000 के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. दोषसिद्धि बरकरार: उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन ने डीएनए और प्रत्यक्ष साक्ष्यों के आधार पर बिना किसी संदेह के अपराध साबित किया है।
  2. सजा की पुष्टि: अभियुक्त को अपने शेष प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में कठोर कारावास की सजा काटनी होगी और ₹50,000 का जुर्माना भी प्रभावी रहेगा।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आपराधिक अपील (पोक्सो अधिनियम एवं आजीवन कारावास दोषसिद्धि के खिलाफ अपील)
  • प्रासंगिक कानून: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 5/6 (Aggravated Penetrative Sexual Assault); भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(f)/(n); भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 / डीएनए साक्ष्य की स्वीकार्यता
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलकर्ता (दोषी पिता) की ओर से: अधिवक्ता पी. गणपति सुब्रमण्यम
    • राज्य (अभियोजन) की ओर से: सरकारी अधिवक्ता जी. करुप्पासामी पांडियन
  • पीठ: न्यायमूर्ति ए.डी. जगदीश चंदीरा और न्यायमूर्ति बी. मुरुगेसन (मद्रास उच्च न्यायालय)

Biological Father:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति ए. डी. जगदीश चंद्रा व न्यायमूर्ति बी. मुरुगेशन
संबंधित कानूनपॉक्सो अधिनियम, 2012 (POCSO Act) एवं आईपीसी की धाराएं
मुख्य साक्ष्यडीएनए रिपोर्ट (DNA Report), जिसने भ्रूण के जैविक पिता के रूप में अभियुक्त की पुष्टि की।
अदालत का फैसलाअपील खारिज; अभियुक्त के स्वाभाविक जीवन के अंत तक उम्रकैद की सजा बरकरार।
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