Thursday, November 5, 2026
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Service Jurisprudence: दबाव व बाध्यकारी परिस्थितियों में इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता; महिला न्यायिक अधिकारी का इस्तीफा रद्द

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं था:अदालत ने माना कि बच्चे के इलाज की गंभीर स्थिति और ट्रांसफर आवेदन पर कोई विचार न होने के कारण अधिकारी को यह कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा:“परिस्थितियों में आए इस तरह के महत्वपूर्ण बदलावों ने ही याचिकाकर्ता को मूल रूप से अपना त्यागपत्र सौंपने के लिए मजबूर किया था। इसे स्वैच्छिक निर्णय नहीं माना जा सकता।” — उड़ीसा हाईकोर्ट
  • इस्तीफा कब प्रभावी होता है?न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा ने अपने सहमतिपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी का इस्तीफा नियुक्ति प्राधिकारी (Competent Appointing Authority – Governor) द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार किए जाने पर ही प्रभावी होता है। हाईकोर्ट की सिफारिश मात्र से स्वीकृति पूरी नहीं मानी जाती।
  • स्वीकृति से पहले वापसी का अधिकार:स्थापित कानूनी सिद्धांत के अनुसार, यदि इस्तीफा प्रभावी (नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत) होने से पहले वापस ले लिया जाता है, तो उसे बाद में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कटक: उड़ीसा हाईकोर्ट की खंडपीठ ने न्यायिक सेवा में मानवीय दृष्टिकोण, प्रशासनिक संवेदनशीलता और सेवा कानून (Service Jurisprudence) के तहत त्यागपत्र की स्वैच्छिकता व उसकी वापसी (Withdrawal of Resignation) के अधिकार पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति मानष रंजन पाठक और न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा की खंडपीठ ने ओडिशा सरकार द्वारा जारी 2 जनवरी 2023 की इस्तीफा स्वीकृति अधिसूचना को निरस्त (Quash) करते हुए याचिकाकर्ता महिला न्यायिक अधिकारी को अतिरिक्त सिविल जज (जूनियर डिवीजन)-सह-एसडीजेएम के पद पर तत्काल बहाल (Reinstate) करने का निर्देश दिया। अदालत ने माना कि अपने गंभीर रूप से ऑटिस्टिक (Autistic) बेटे के निरंतर चिकित्सीय उपचार की अनुपलब्धता के कारण मजबूर होकर दिया गया इस्तीफा “स्वैच्छिक” (Voluntary) नहीं था। इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी (राज्यपाल/राज्य सरकार) द्वारा त्यागपत्र को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं कर लिया जाता, तब तक कर्मचारी को अपना इस्तीफा वापस लेने का पूर्ण विधिक अधिकार होता है [इप्सिता मोहंती बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. परिस्थितियों की बाध्यता के कारण दिया गया इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं परिस्थितियों के संचयी प्रभाव का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने कहा:“हमारा यह सुविचारित मत है कि परिस्थितियों में आए महत्वपूर्ण बदलावों ने ही याचिकाकर्ता को अपना त्यागपत्र सौंपने के लिए विवश (Compelled) किया था। जिन परिस्थितियों में यह इस्तीफा प्रस्तुत किया गया था, उसे देखते हुए याचिकाकर्ता के इस्तीफे को किसी भी स्थिति में ‘स्वैच्छिक निर्णय’ (Voluntary Decision) नहीं माना जा सकता।”

2. औपचारिक स्वीकृति से पूर्व इस्तीफा वापसी का विधिक अधिकार

  • न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा ने अपने पृथक सहमति निर्णय में स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी का त्यागपत्र तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक कि सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी (Appointing Authority) द्वारा इसे औपचारिक रूप से स्वीकार न कर लिया जाए।
  • अदालत ने विधिक समय-रेखा रेखांकित की:
    • 21 दिसंबर 2022: याचिकाकर्ता ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया, जो उसी दिन हाईकोर्ट पहुंच गया।
    • 31 दिसंबर 2022: सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी (राज्यपाल) ने पूर्व सिफारिश पर हस्ताक्षर किए।
  • अदालत ने व्यवस्था दी कि हाईकोर्ट की प्रशासनिक सिफारिश स्वतः सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी की स्वीकृति नहीं बन जाती। चूंकि वापसी का आवेदन औपचारिक स्वीकृति से पहले प्राप्त हो चुका था, इसलिए बाद में जारी स्वीकृति अधिसूचना कानूनी रूप से अमान्य (Void) है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (ऑटिस्टिक बच्चे के इलाज का संघर्ष)

  • न्यायिक सेवा में चयन: इप्सिता मोहंती वर्ष 2015 में ओडिशा न्यायिक सेवा में शामिल हुईं और भुवनेश्वर में पदस्थापित थीं, जहां उनके बेटे का ऑटिज्म का नियमित थेरेपी व विशेष इलाज चल रहा था।
  • ढेंकनाल स्थानांतरण व संकट: जुलाई 2022 में उनका स्थानांतरण ढेंकनाल जिले के हिंडोल में कर दिया गया, जहां बच्चे के लिए आवश्यक मेडिकल सुविधाएं और प्रशिक्षित थेरेपिस्ट उपलब्ध नहीं थे।
  • अनसुना प्रतिवेदन (5 सितंबर 2022): उन्होंने बच्चे के इलाज को जारी रखने के लिए ढाई साल तक भुवनेश्वर में पदस्थापना का अनुरोध किया। स्टैंडिंग कमेटी ने इस पर विचार स्थगित (Deferred) कर दिया और कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया।
  • मजबूरी में इस्तीफा (29 नवंबर 2022): बेटे की बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 20 दिसंबर को फुल कोर्ट ने इसे स्वीकार करने का संकल्प लेकर राज्य सरकार को भेजा।
  • वापसी की अर्जी (21 दिसंबर 2022): अगले ही दिन उन्होंने इस्तीफा वापस लेने की अर्जी दी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने इसे फुल कोर्ट के समक्ष रखने का निर्देश दिया, लेकिन यह सूचना सरकार या राज्यपाल तक नहीं पहुंचाई गई।
  • सरकार की अधिसूचना: राज्यपाल ने 31 दिसंबर 2022 को पुराने प्रस्ताव को मंजूरी दी और 2 जनवरी 2023 को राज्य सरकार ने इस्तीफा स्वीकार करने की अधिसूचना जारी कर दी, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और सेवा शर्तें

  1. अधिसूचना निरस्त व तत्काल बहाली: उड़ीसा हाईकोर्ट ने 2 जनवरी 2023 की अधिसूचना को असंवैधानिक व अमान्य ठहराते हुए रद्द कर दिया और प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि उन्हें अतिरिक्त सिविल जज (जूनियर डिवीजन)-सह-एसडीजेएम के पद पर तत्काल बहाल किया जाए।
  2. सेवा की निरंतरता (Continuity of Service): अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि ‘नो वर्क नो पे’ सिद्धांत के तहत उन्हें अनुपस्थिति अवधि का पिछला वेतन (Back Wages) नहीं मिलेगा, लेकिन उन्हें 3 जनवरी 2023 से सेवा की पूर्ण निरंतरता और परिणामी सेवा लाभ प्रदान किए जाएंगे।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: इप्सिता मोहंती बनाम ओडिशा राज्य एवं अन्य [Ipsita Mohanty v. State of Orissa & Anr – रिट याचिका (सिविल)]
  • प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 226, 233, 234 एवं 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर हाईकोर्ट का नियंत्रण); ओडिशा न्यायिक सेवा नियमावली; प्रशासनिक सेवा कानून (त्यागपत्र की वापसी के सिद्धांत)
  • संबद्ध नजीर: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम गोपाल चंद्र मिश्रा (1978, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) एवं बलराम गुप्ता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1987)
  • पीठ: न्यायमूर्ति मानष रंजन पाठक और न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा (उड़ीसा उच्च न्यायालय)

Service Jurisprudence: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतउड़ीसा उच्च न्यायालय (Orissa High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति मानश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति सिबो शंकर मिश्रा
याचिकाकर्ताइप्सिता मोहंती (Ipsita Mohanty) – ओडिशा न्यायिक सेवा (2015 बैच)
मूल मुद्दाऑटिस्टिक बेटे के इलाज के लिए ट्रांसफर न मिलने पर दिया गया इस्तीफा और उसकी वापसी।
कानूनी सिद्धांतऔपचारिक स्वीकृति से पहले इस्तीफा वापस लिया जा सकता है; दबाव में दिया गया त्यागपत्र अमान्य है।
अदालत का फैसलाइस्तीफा रद्द, सेवा में बहाली और निरंतरता (Continuity of Service) का आदेश (बकाया वेतन नहीं)।
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