सुप्रीम कोर्ट की मुख्य मौखिक टिप्पणी
पीठ ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए आरोपी को आत्मसमर्पण (Surrender) करने और नियमित जमानत (Regular Bail) याचिका दाखिल करने की सलाह दी: “अग्रिम जमानत के बजाय आप नियमित जमानत के लिए आइए, हम आपको जमानत दे देंगे। देखिए, जब गांजे (Ganja) की बात आती है, तो हम बहुत उदार हैं। जब भी मामला हमारे पास आता है, हम जमानत दे देते हैं। पहले निचली अदालत से नियमित जमानत याचिका खारिज करवाकर यहां आइए; हम आपको जमानत देंगे, कोई समस्या नहीं है।” — सुप्रीम कोर्ट (पीठ)
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के तहत गांजा (Cannabis/Marijuana) से जुड़े मामलों में जमानत देने के अपने न्यायिक दृष्टिकोण और धारा 37 के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर कड़े प्रतिबंधों को लेकर महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की और अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने भारी मात्रा में गांजे की बरामदगी से जुड़े एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एनडीपीएस मामलों में गिरफ्तारी-पूर्व जमानत देने के पक्ष में अदालत नहीं है, लेकिन आरोपी यदि आत्मसमर्पण (Surrender) कर नियमित जमानत (Regular Bail) दाखिल करता है, तो गांजे के मामलों में शीर्ष अदालत आमतौर पर बेहद “उदार” रुख अपनाती है [विश्वनाथ मंडल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य]।
शीर्ष अदालत की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां
1. ‘गांजे के मामलों में हम जमानत पर बहुत उदार हैं’ गिरफ्तारी-पूर्व जमानत के बजाय नियमित जमानत का रास्ता अपनाने का सुझाव देते हुए पीठ ने टिप्पणी की: “जमानत के लिए आइए, हम आपको देंगे। देखिए, जब गांजे (Ganja) की बात आती है, तो हम बहुत उदार (Liberal) हैं। जब भी यह हमारे पास आता है, हम जमानत देते हैं। आप ट्रायल कोर्ट से [नियमित जमानत याचिका की] खारिज होने का आदेश लाइए और यहां आइए; हम आपको जमानत दे देंगे, कोई समस्या नहीं है।”
2. धारा 37 एनडीपीएस और अग्रिम जमानत पर रोक
- पीठ ने स्पष्ट किया कि वाणिज्यिक या भारी मात्रा (Commercial/Huge Quantity) की बरामदगी के मामलों में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत अग्रिम जमानत याचिका पर विचार करना उचित नहीं है।
- आरोपी के वकील ने जब तर्क दिया कि मकान आरोपी का नहीं था, तो पीठ ने कहा कि यह जांच का विषय (Matter of Investigation) है और इसके आधार पर गिरफ्तारी-पूर्व राहत नहीं दी जा सकती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (कलकत्ता हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक)
- छापेमारी और जब्ती: जांच एजेंसी ने पश्चिम बंगाल स्थित एक आवासीय परिसर में छापेमारी कर आरोपी विश्वनाथ मंडल की पत्नी के कब्जे से ‘भारी मात्रा’ (Huge Quantity) में गांजा बरामद किया था।
- छापेमारी के समय अनुपस्थिति का दावा: आरोपी घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं था। हालांकि, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने यह मानते हुए कि वह परिसर का स्वामी/संबंधित व्यक्ति है, उसे जिम्मेदारी से मुक्त मानने से इनकार कर दिया था और धारा 37 की सांविधिक बाधा (Statutory Bar) के कारण अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
- सुप्रीम कोर्ट में दलीलें:
- आरोपी के वकील ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि संबंधित मकान याचिकाकर्ता के नाम पर नहीं है और उसे झूठा फंसाया जा रहा है।
- बचाव पक्ष ने धारा 37 के तहत ‘उचित आधार’ (Reasonable Grounds) के अपवाद और पूर्ववर्ती फैसलों का हवाला देकर अग्रिम जमानत की गुहार लगाई।
- पीठ ने पूर्ववर्ती फैसलों को उस विशेष मामले के तथ्यों तक सीमित मानते हुए कहा कि भारी जब्ती में अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- अग्रिम जमानत याचिका खारिज: शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के रुख को सही ठहराते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज (Dismissed) कर दिया।
- आत्मसमर्पण और नियमित जमानत की छूट: अदालत ने याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने और नियमित जमानत (Regular Bail) दाखिल करने की छूट दी। पीठ ने मौखिक रूप से आश्वस्त किया कि यदि निचली अदालतों से नियमित जमानत खारिज होती है, तो शीर्ष अदालत गांजे के मामलों में अपनाए जाने वाले उदार दृष्टिकोण के तहत उसकी अर्जी पर विचार करेगी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: विश्वनाथ मंडल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य [Biswanath Mandal v. The State of West Bengal – एसएलपी (आपराधिक)]
- प्रासंगिक कानून: स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) की धारा 20 (गांजे से संबंधित अपराध), धारा 37 (जमानत की दोहरी शर्तें); दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 438 (अग्रिम जमानत) एवं धारा 439 (नियमित जमानत) / BNSS की संबंधित धाराएं
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- स्टेट ऑफ केरल बनाम राजेश (सुप्रीम कोर्ट) — ‘वाणिज्यिक मात्रा के मामलों में धारा 37 NDPS Act की दोहरी शर्तें अग्रिम जमानत में भी समान रूप से लागू होती हैं।’
- मोहम्मद मुस्लिम उर्फ हुसैन बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) — ‘लंबे समय तक विचाराधीन कैदी रहने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार पर जमानत के सिद्धांत।’
- पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले (सर्वोच्च न्यायालय)
Cannabis Case:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति पी.बी. वराले |
| याचिकाकर्ता | विश्वनाथ मंडल (Biswanath Mandal) |
| मामला/कानून | NDPS अधिनियम, 1985 (धारा 37 – अग्रिम जमानत पर रोक) |
| अदालत की मौखिक टिप्पणी | “गांजे के मामलों में जब भी नियमित जमानत हमारे पास आती है, हम उदारता से राहत देते हैं।” |
| अदालत का अंतिम आदेश | अग्रिम जमानत याचिका खारिज; आरोपी को सरेंडर कर नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का निर्देश। |

