Friday, September 18, 2026
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Condition In Bribery: वैध शुल्क से इतर सरकारी काम के लिए मांगा गया कोई भी पैसा रिश्वत ही माना जाएगा; ‘अतिरिक्त शुल्क’ शब्द का उपयोग यहां समझें

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • ‘एक्स्ट्रा चार्ज’ भी रिश्वत माना जाएगा: अदालत ने आरोपी की उस सफाई को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यह केवल अतिरिक्त शुल्क था:“किसी भी लोक सेवक (Public Servant) द्वारा अपने कानूनी कर्तव्य को निभाने के लिए कानूनी शुल्क के अलावा मांगी गई कोई भी राशि रिश्वत या अवैध पारिश्रमिक मानी जाएगी। अपीलकर्ता केवल इसलिए अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसने सीधे ‘रिश्वत’ शब्द के बजाय ‘एक्स्ट्रा’ शब्द का इस्तेमाल किया था।”
  • मांग, स्वीकृति और बरामदगी (Demand, Acceptance & Recovery): पीठ ने दोहराया कि केवल पैसे की बरामदगी काफी नहीं होती, बल्कि रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति को साबित करना जरूरी है। CBI ने इस मामले में तीनों पहलुओं को सफलतापूर्वक साबित किया है।

सजा में राहत (Reduction of Sentence)

हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत सजा को 1 वर्ष से घटाकर 6 महीने और धारा 13(2) के तहत सजा को 1.5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष कर दिया (दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी)। जमानत पर बाहर चल रहे 75 वर्षीय अभियुक्त को 2 महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया गया है।

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) के तहत रिश्वत की मांग और स्वीकृति (Demand and Acceptance), ‘वैध पारिश्रमिक’ (Legal Remuneration) के दायरे और फेनॉल्फथैलिन पाउडर ट्रैप साक्ष्य पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने अभियुक्त के इस बचाव को सिरे से खारिज कर दिया कि ₹100 की रकम रिश्वत नहीं बल्कि केवल “अतिरिक्त शुल्क” (Extra Charge) थी। हालांकि, अभियुक्त की 75 वर्ष की वृद्धावस्था, मामले के 31 वर्षों तक लंबित रहने (31-year pendency) और रेलवे सेवा से पहले ही बर्खास्त किए जाने के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कारावास की अवधि को कम कर दिया। अदालत ने 1995 में हटिया से समस्तीपुर मोटरसाइकिल बुक करने के नाम पर ₹100 की रिश्वत लेने के मामले में 75 वर्षीय पूर्व रेलवे पार्सल क्लर्क की दोषसिद्धि को विधि-सम्मत मानते हुए बरकरार रखा है [काली शंकर धोबी बनाम झारखंड राज्य]।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां

1. ‘एक्स्ट्रा’ शब्द की आड़ लेकर रिश्वतखोरी से नहीं बचा जा सकता न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने सरकारी शुल्कों से इतर धन की मांग पर कड़ा रुख अपनाते हुए 10 सितंबर के अपने फैसले में व्यवस्था दी: “किसी भी लोक सेवक द्वारा अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन के लिए विधिक शुल्क (Legal charges) से इतर मांगा गया कोई भी धन रिश्वत या अवैध परितोषण (Illegal Gratification) ही माना जाएगा, जो उस आधिकारिक कार्य को करने के लिए प्रेरक या प्रतिफल (Motive or reward) का काम करता है। अपीलार्थी केवल इस आधार पर अपनी आपराधिक जवाबदेही से नहीं बच सकता कि उसने सीधे ‘रिश्वत’ शब्द का प्रयोग न करके ‘अतिरिक्त’ (Extra) शब्द का इस्तेमाल किया था।”

2. मांग, स्वीकृति और बरामदगी का पूर्ण परीक्षण

  • अदालत ने दोहराया कि केवल पैसे की बरामदगी (Recovery) ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होती; अभियोजन को अवैध परितोषण की ‘मांग’ (Demand) और ‘स्वीकृति’ (Acceptance) को स्वतंत्र व विश्वसनीय साक्ष्य से स्थापित करना अनिवार्य होता है।
  • वर्तमान मामले में अभियोजन ने साबित किया कि आधिकारिक बुकिंग शुल्क केवल ₹203 था, और अभियुक्त यह स्पष्ट करने में विफल रहा कि उसने ₹100 अतिरिक्त क्यों मांगे।
  • फेनॉल्फथैलिन पाउडर से नोटों के मिलान और अभियुक्त का दायां हाथ सोडियम कार्बोनेट के घोल में धोने पर गुलाबी होने (फॉरेनसिक जांच में पुष्टि) ने स्वीकृति और बरामदगी की शृंखला को संदेह से परे सिद्ध किया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (1995 हटिया रेलवे स्टेशन ट्रैप)

  • शिकायत: 27 अप्रैल 1995 को निर्मल कुमार बेंगानी ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कराई। बेंगानी ट्रेन द्वारा अपनी मोटरसाइकिल हटिया (रांची) से समस्तीपुर भेजने के लिए हटिया रेलवे स्टेशन के पार्सल कार्यालय पहुंचे थे, जहां क्लर्क काली शंकर धोबी तैनात थे।
  • रिश्वत की मांग: मोटरसाइकिल का आधिकारिक बुकिंग चार्ज ₹203 था, लेकिन क्लर्क ने बुकिंग पर्ची बनाने के बाद ₹100 की अतिरिक्त रिश्वत मांगी।
  • सीबीआई ट्रैप और गिरफ्तारी: * सीबीआई ने फेनॉल्फथैलिन पाउडर लगे ₹100 के नोट के साथ ट्रैप बिछाया और दो स्वतंत्र गवाहों को साथ भेजा।
    • जैसे ही बेंगानी ने केमिकल लगा नोट क्लर्क को सौंपा, क्लर्क ने उसे टेबल की दराज (Drawer) में रख लिया।
    • पूर्व-निर्धारित संकेत मिलते ही सीबीआई टीम ने छापा मारकर दराज से नोट बरामद किया (जिसका नंबर पूर्व-दर्ज नंबर से मिला) और हाथ धुलवाने पर रासायनिक प्रतिक्रिया में घोल गुलाबी हो गया।
  • ट्रायल कोर्ट का निर्णय: निचली अदालत ने काली शंकर धोबी को पीसी एक्ट की धारा 7 और धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(d) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और सजा में राहत

  1. दोषसिद्धि बरकरार: उच्च न्यायालय ने पीसी एक्ट की धारा 7 (रिश्वत स्वीकार करना) और धारा 13(2) सहपठित 13(1)(d) (आपराधिक कदाचार/अनुचित वित्तीय लाभ) के तहत ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि के फैसले को पूरी तरह सही माना।
  2. सजा में कमी (Condonation of Sentence): * अभियुक्त की आयु अब 75 वर्ष हो चुकी है, मुकदमा पिछले 31 वर्षों से खिंच रहा है और वह अपनी नौकरी भी गंवा चुका है।
  • इन मानवीय परिस्थितियों को देखते हुए धारा 7 के तहत सजा को 1 वर्ष से घटाकर 6 माह और धारा 13 के तहत सजा को 1.5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष कर दिया गया।
  • दोनों सजाएं एक साथ (Concurrently) चलेंगी।
  1. आत्मसमर्पण का निर्देश: जमानत पर बाहर चल रहे 75 वर्षीय पूर्व क्लर्क को शेष सजा काटने के लिए 2 महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने का आदेश दिया गया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: काली शंकर धोबी बनाम झारखंड राज्य (सीबीआई) [आपराधिक अपील – झारखंड उच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) की धारा 7 (लोक सेवक द्वारा रिश्वत की मांग एवं स्वीकृति) और धारा 13(1)(d) सहपठित 13(2) (आपराधिक कदाचार); भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 3 (साक्ष्य का मूल्यांकन)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत: * बी. जयराज बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘केवल बरामदगी ही पर्याप्त नहीं, मांग और स्वीकृति अनिवार्य है।’
    • नीरज दत्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (संविधान पीठ) — ‘रिश्वत की मांग को प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलार्थी (अभियुक्त) की ओर से: अधिवक्ता समीर सौरभ एवं दिव्या
    • राज्य/सीबीआई की ओर से: भारत के अपर सॉलिसिटर जनरल (ASGI) प्रशांत पल्लव एवं एसी एएसजीआई आर्यन अनुराग
  • पीठ: न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव (झारखंड उच्च न्यायालय)

Condition In Bribery: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
अपीलकर्ताकाली शंकर धोबी (पूर्व पार्सल क्लर्क, हटिया रेलवे स्टेशन)
मुख्य मुद्दा₹100 अवैध पारिश्रमिक/रिश्वत स्वीकार करना
कोर्ट का आदेशदोषसिद्धि बरकरार; सजा 1.5 साल से घटाकर 1 साल की गई; 2 महीने में सरेंडर का आदेश।
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