सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- अदालतों के कार्यभार का सम्मान: न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सख्त समयसीमा तय करने से इनकार करते हुए कहा:“हम जिला न्यायाधीशों को भी निपटारे की तारीखें बताना पसंद नहीं करते। हम हाईकोर्ट के लिए भी ऐसा नहीं करेंगे। हर जज के पास रोजाना निपटाने के लिए अपनी कॉज-लिस्ट (Docket) होती है। आप हाईकोर्ट से ही अनुरोध कर सकते हैं।”
- हाईकोर्ट जज के रूप में अपना अनुभव: सुप्रीम कोर्ट में बैठने के बाद अपने पुराने दृष्टिकोण को याद करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा:“जब हम हाईकोर्ट में थे, हमें याद है कि जब सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के निर्देश आते थे तो हम उन्हें कैसे देखते थे। आइए ईमानदार रहें। हम उस अहसास को केवल इसलिए दोहराना नहीं चाहते क्योंकि अब हम यहां बैठे हैं।”
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालयों और उच्च न्यायालयों पर मामलों के अत्यधिक बोझ (Docket Pressure), अपीलीय अदालतों के न्यायिक संयम और मुकदमों के त्वरित निस्तारण हेतु समय-सीमाएं थोपने के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट को चार सप्ताह के भीतर याचिका निपटाने का निर्देश देने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अपीलीय अदालतों को निचली अदालतों के दैनिक केस-लोड का सम्मान करना चाहिए और उन्हें मामलों के निस्तारण के लिए कठोर समय-सीमा (Strict Timelines) तय करने से बचना चाहिए।
शीर्ष अदालत की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां
1. ‘हर जज की अपनी कॉज लिस्ट और दैनिक दबाव होता है’ याचिकाकर्ता द्वारा 4 सप्ताह की समय-सीमा तय करने के अनुरोध पर न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा: “हम जिला न्यायाधीशों को भी मुकदमों के निस्तारण की तारीखें या समय-सीमा निर्देशित करना पसंद नहीं करते। हम उच्च न्यायालय के लिए भी ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं करेंगे। हर न्यायाधीश के पास अपनी दैनिक कॉज लिस्ट (Docket) होती है जिसका पालन उन्हें हर दिन करना होता है। आप त्वरित सुनवाई के लिए सीधे उच्च न्यायालय से ही अनुरोध कर सकते हैं।”
2. हाईकोर्ट जज के रूप में अपने अनुभव को किया साझा
- समय-सीमा तय करने वाले अदालती आदेशों के जमीनी प्रभाव का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्ट रूप से कहा:“जब हम उच्च न्यायालय में थे, तब हमें अच्छी तरह याद है कि जब सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के समय-सीमा तय करने वाले निर्देश आते थे, तो हम उन्हें किस तरह देखते थे। आइए पूरी तरह स्पष्ट रहें। उस समय हमारी जो भावनाएं थीं, सिर्फ इसलिए कि आज हम यहां (सुप्रीम कोर्ट में) बैठे हैं, हम उस अनुभव को एक अलग रूप में दोहराना नहीं चाहते।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (वैवाहिक विवाद व पासपोर्ट जब्ती)
- विवाद की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता पति अपने वैवाहिक विवाद से उपजे कई आपराधिक मुकदमों और एक लुक आउट सर्कुलर (LOC) का सामना कर रहा था।
- याचिकाकर्ता की दलील: * वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट से स्पष्ट अंतरिम संरक्षण (Protection Order) मिलने के बावजूद, पिता के निधन के बाद याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, जिससे उसकी आजीविका गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
- याचिकाकर्ता ने एफआईआर रद्द (Quashing Petition) कराने और पासपोर्ट वापस पाने के लिए हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी, जिसे लगातार टालते हुए अब फरवरी 2027 के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया है।
- सुप्रीम कोर्ट से राहत की मांग: अत्यधिक लंबी तारीख मिलने के कारण याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर आग्रह किया था कि हाईकोर्ट को 4 सप्ताह के भीतर मामले का निस्तारण करने का सख्त निर्देश दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- समय-सीमा तय करने से इनकार: सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट को किसी भी निश्चित तारीख या तय समय-सीमा के भीतर सुनवाई पूरी करने का बाध्यकारी निर्देश देने से मना कर दिया।
- हाईकोर्ट में अर्ली हियरिंग की छूट: अदालत ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वह फरवरी 2027 की तारीख को पहले (Advancement of hearing) कराने के लिए हाईकोर्ट के समक्ष औपचारिक अर्जी दाखिल कर सकता है।
- हाईकोर्ट से अपेक्षा: शीर्ष अदालत ने आदेश में दर्ज किया कि यदि ऐसी कोई अग्रिम सुनवाई की अर्जी दी जाती है, तो हाईकोर्ट मामले के तथ्यों और अंतरिम राहत की तात्कालिकता को ध्यान में रखते हुए उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा तथा मुख्य मामले को यथाशीघ्र निपटाने का प्रयास करेगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पति (याचिकाकर्ता) बनाम राज्य एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) – सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 (पूर्ववर्ती 482 CrPC – अंतर्निहित शक्तियां); भारत का संविधान – अनुच्छेद 136 एवं अनुच्छेद 226/227 (अधीक्षण की शक्ति); पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (पासपोर्ट जब्ती विवाद)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत: * हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024, 5-जजों की संविधान पीठ) — ‘संवैधानिक अदालतों को निचली अदालतों पर मुकदमों के निस्तारण के लिए कठोर और अवास्तविक समय-सीमाएं तय करने से बचना चाहिए।’
- पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह (सर्वोच्च न्यायालय)
Strict Timelines: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ए.जी. मसीह |
| मामला | पासपोर्ट वापसी और हाईकोर्ट में लंबित याचिका की जल्द सुनवाई की मांग |
| मुख्य कानूनी संदेश | सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट या जिला अदालतों पर सख्त डेडलाइन थोपना अनुचित है। |
| कोर्ट का आदेश | याचिकाकर्ता को सुनवाई की तारीख पहले करने (Advancement of Date) के लिए हाईकोर्ट जाने की छूट। |

