शिकायतकर्ता का जवाब:
महिला वकील ने अपने हलफनामे में व्हाट्सएप चैट को फेक ऐप द्वारा तैयार किया गया फर्जी/मनगढ़ंत बताया। FIR में देरी का कारण बताते हुए उसने कहा कि वह आरोपी के शादी के आश्वासनों पर भरोसा करती रही और जब उसने दूसरी शादी कर ली, तब पुलिस का रुख किया।
मामले की वर्तमान स्थिति
हाईकोर्ट द्वारा मामले के गुण-दोषों पर निर्णय दिए बिना याचिका वापस लेने की अनुमति देने के बाद अब आपराधिक मामले की जांच जारी रहेगी। आरोपी वकील को ट्रायल कोर्ट से भी अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) नहीं मिल सकी है।
अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत के एक पुरुष अधिवक्ता द्वारा अपने खिलाफ दर्ज दुष्कर्म (Rape on Promise of Marriage), पहचान छुपाने और धोखे से संबंध बनाने की प्राथमिकी (FIR) को रद्द (Quash) कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे वापस लेने (Withdraw) की अनुमति प्रदान कर दी है।
न्यायमूर्ति एम.के. ठक्कर की एकल पीठ ने आरोपी वकील द्वारा याचिका वापस लेने की अनुमति मांगने पर मामले का निस्तारण कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि उसने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। याचिकाकर्ता-वकील के खिलाफ उसकी ही साथी महिला अधिवक्ता ने सूरत के संबंधित थाने में शादी का झूठा झांसा देकर 8 साल तक शारीरिक संबंध बनाने, वास्तविक धार्मिक पहचान छुपाने और बाद में चुपके से किसी अन्य महिला से निकाह कर लेने के गंभीर आरोपों के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई है।
उच्च न्यायालय की कार्यवाही और आदेश
- याचिका वापस लेने की अनुमति: सुनवाई के दौरान अभियोजन और शिकायतकर्ता महिला वकील द्वारा प्रस्तुत जवाबी हलफनामे और गंभीर आरोपों को देखते हुए आरोपी वकील के वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की प्रार्थना की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
- अदालत का स्पष्टीकरण:“इस अदालत ने मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया है। याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दिए जाने के बाद इस आवेदन का निस्तारण किया जाता है।”
- अग्रिम जमानत खारिज: मामले के अनुसार, आरोपी वकील ने सत्र/ट्रायल कोर्ट के समक्ष अग्रिम जमानत याचिका (Anticipatory Bail) भी दायर की थी, जिसे ट्रायल कोर्ट पूर्व में ही खारिज कर चुका है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (आरोपी वकील बनाम महिला वकील)
1. शिकायतकर्ता महिला अधिवक्ता के आरोप (8 साल लंबा संबंध और पहचान छुपाना):
- शुरुआत (2018): शिकायतकर्ता के अनुसार, दोनों के बीच संबंध 2018 में शुरू हुए थे। पहली मुलाकात के दौरान आरोपी ने अपनी वास्तविक मुस्लिम पहचान छुपाई और खुद को “रोहन” (Rohan) के रूप में पेश किया।
- ऑफिस में प्रतीकात्मक विवाह (Symbolic Marriage): महिला वकील ने आरोप लगाया कि अगस्त 2018 में आरोपी ने उसके कार्यालय में उसकी मांग में सिंदूर भरकर और मंगलसूत्र पहनाकर उसके साथ “प्रतीकात्मक विवाह” किया और जीवन भर साथ निभाने का वादा किया।
- धर्म परिवर्तन का झांसा: पीड़िता का दावा है कि जब बाद में उसे आरोपी की वास्तविक धार्मिक पहचान का पता चला, तब भी आरोपी ने शादी का भरोसा देना जारी रखा। उसने कथित रूप से आश्वासन दिया कि वह हिंदू धर्म अपनाएगा, औपचारिक रूप से अपना नाम बदलेगा और उसके साथ कानूनी विवाह करेगा।
- मार्च 2026 में धोखा: पीड़िता को बाद में पता चला कि आरोपी ने 1 मार्च 2026 को किसी अन्य महिला से शादी कर ली है, जिसे वह पूर्व में पीड़िता से अपनी ‘बहन’ बताकर मिलवाता रहा था।
- एफआईआर: पीड़िता ने 15 मई 2026 को सूरत पुलिस में दुष्कर्म और धोखाधड़ी की औपचारिक प्राथमिकी दर्ज कराई।
2. आरोपी वकील का बचाव (सहमति से संबंध और जबरन वसूली का दावा):
- आरोपी वकील ने एफआईआर रद्द कराने की अर्जी में दावा किया कि दोनों के बीच का रिश्ता पूरी तरह सहमति (Consensual Relationship) पर आधारित था और शादी का झूठा वादा करने के आरोप मनगढ़ंत हैं।
- व्हाट्सएप चैट और वित्तीय लेन-देन: आरोपी ने अदालत में कुछ व्हाट्सएप चैट और बैंक लेन-देन प्रस्तुत कर दावा किया कि महिला वकील उसे धमकियां दे रही थी और पैसों की मांग कर रही थी।
- विलंब का तर्क: उसने दलील दी कि 2018 से शुरू हुए रिश्ते में 2026 में एफआईआर दर्ज कराई गई, जो स्पष्ट रूप से दुर्भावना और विचारोपरांत (Afterthought) उठाया गया कदम है।
3. पीड़िता का जवाबी हलफनामा (फेक ऐप से चैट बनाने का आरोप):
- पीड़िता ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि वह आरोपी के शादी के वादों पर लगातार भरोसा करती रही, इसलिए उसने पहले पुलिस से संपर्क नहीं किया; धोखा उजागर होने पर ही प्राथमिकी दर्ज हुई।
- पीड़िता ने आरोपी द्वारा प्रस्तुत व्हाट्सएप संदेशों को फर्जी बताते हुए कहा:“याचिकाकर्ता ने एक फर्जी मोबाइल एप्लिकेशन (Fake Application) का उपयोग करके मनगढ़ंत और झूठी चैट तैयार की है, ताकि यह दिखाया जा सके कि मैंने उससे पैसों की मांग की या उसे धमकी दी।”
- वित्तीय लेन-देन के संबंध में उसने स्पष्ट किया कि वे कोई व्यक्तिगत ऋण नहीं थे, बल्कि बिजली के बिलों और मोटरसाइकिल की किस्तों के खर्च थे।
कानूनी परिणाम
याचिका वापस लिए जाने के बाद पुलिस द्वारा दर्ज की गई आपराधिक प्राथमिकी (FIR) यथावत प्रभावी रहेगी और पुलिस को आरोपी के खिलाफ आपराधिक जांच, चार्जशीट दाखिल करने अथवा गिरफ्तारी सहित कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की पूरी छूट रहेगी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सूरत स्थित पुरुष अधिवक्ता (याचिकाकर्ता) बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य [धारा 528 BNSS / पूर्ववर्ती 482 CrPC याचिका – गुजरात उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 (पहचान छुपाकर या धोखे से शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाना / पूर्ववर्ती धारा 375/376 IPC); धारा 318 (धोखाधड़ी / पूर्ववर्ती 420 IPC); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘शादी के झूठे वादे (False promise of marriage) और शादी के वादे को पूरा न कर पाने (Breach of promise) के बीच का अंतर शुरुआत से मौजूद आपराधिक इरादे (Mens Rea) पर निर्भर करता है।’
- अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं था और पहचान या स्थिति छुपाकर शारीरिक सहमति ली गई, तो वह कानूनन सहमति नहीं मानी जाएगी।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- आरोपी वकील की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मितेश अमीन एवं अधिवक्ता राहुल आर. ढोलकिया
- राज्य सरकार की ओर से: सहायक लोक अभियोजक (APP) मीत ठक्कर
- शिकायतकर्ता महिला वकील की ओर से: अधिवक्ता जय ए. तमाकुवाला, ए. मौलिक नानावटी एवं रोनिथ जॉय
- पीठ: न्यायमूर्ति एम.के. ठक्कर (गुजरात उच्च न्यायालय)
Rape on Promise of Marriage:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एम.के. ठक्कर (Justice MK Thakker) |
| शिकायतकर्ता | महिला वकील |
| आरोपी | सूरत स्थित पुरुष वकील |
| मुख्य आरोप | पहचान छिपाकर, शादी के झूठे वादे पर 8 साल तक शारीरिक संबंध बनाना |
| मामले का मोड़ | हाईकोर्ट से याचिका वापस; ट्रायल कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत याचिका भी खारिज |

