Saturday, September 19, 2026
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POCSO Case: जहां सुमति तहं संपति नाना, जहां कुमति तहं बिपति निदाना; गुजरात की कलोल पोक्सो अदालत ने रामायण की चौपाई उद्धृत कर दोषी को सुनाई कैद

अदालत की कड़ा रुख और मुख्य टिप्पणी

  1. ‘पति और पिता के चरित्र को किया शर्मसार’: अदालत ने कहा कि आरोपी खुद शादीशुदा है और एक बच्चे का पिता है। इसके बावजूद उसने नाबालिग को शादी का झांसा देकर बहलाया-फुसलाया और उसका यौन शोषण किया।“यह आरोपी की विकृत मानसिकता को दर्शाता है। यदि ऐसी विकृतियों पर रोक नहीं लगाई गई, तो समाज में कोई भी नाबालिग बच्ची सुरक्षित नहीं रहेगी।”
  2. नाबालिग की सहमति कानून की नजर में अमान्य: बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज करते हुए कि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम (17 वर्ष, 2 महीने) थी। कानून की नजर में नाबालिग की सहमति का कोई अस्तित्व नहीं होता।
  3. डॉक्टर के सामने दिए बयान को माना ‘अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति’: चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान आरोपी ने डॉक्टर को बताया था कि वह पीड़िता को 2 साल से जानता है और उनके बीच शारीरिक संबंध थे। कोर्ट ने इसे पीड़िता के बयान का समर्थन करने वाली “अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति” (Extrajudicial Confession) माना।

गांधीनगर/कलोल: गुजरात के गांधीनगर जिले की कलोल स्थित विशेष पोक्सो (POCSO) अदालत ने एक विवाहित व्यक्ति द्वारा 17 वर्षीय नाबालिग लड़की को शादी का झांसा देकर भगाने, बंधक बनाकर बार-बार दुष्कर्म करने और पोक्सो अधिनियम के तहत सहमति की कानूनी अमान्यता पर एक ऐतिहासिक व विचारोत्तेजक फैसला सुनाया है।

कलोल विशेष पोक्सो अदालत ने त्वरित न्याय की मिसाल पेश करते हुए ट्रायल शुरू होने के मात्र 2 महीने और 8 दिन के भीतर और एफआईआर दर्ज होने के 5 महीने के भीतर मुकदमे का अंतिम निपटारा कर दिया। अदालत ने अपने 20 साल के सश्रम कारावास के फैसले की शुरुआत रामचरितमानस (रामायण) की प्रसिद्ध चौपाई से करते हुए कहा कि जब व्यक्ति कुमति और विकृत मानसिकता का शिकार होता है, तो उसका परिणाम विनाश और दुख ही होता है। अदालत ने टिप्पणी की कि खुद एक बच्चे का पिता और पति होने के बावजूद एक नाबालिग बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाना समाज की नींव को हिला देने वाली विकृति है।

विशेष अदालत के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. फैसले की शुरुआत में रामायण की चौपाई का उल्लेख अदालत ने अपने निर्णय के आरंभिक प्रस्तर में विवेक और कुबुद्धि के परिणामों को रेखांकित करते हुए लिखा: “जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥” (अर्थात्: जहां सद्बुद्धि और विवेक होता है, वहां सुख-समृद्धि का वास होता है; लेकिन जहां दुर्बुद्धि और कुमति होती है, वहां केवल विपत्ति, दुख और विनाश ही शेष रहता है।)

2. पिता और पति की गरिमा को किया शर्मसार सजा के कारणों को दर्ज करते हुए विशेष न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा: “प्रस्तुत मामले में अभियुक्त स्वयं एक विवाहित व्यक्ति और एक बच्चे का पिता है। इसके बावजूद, उसने एक नाबालिग लड़की को शादी का झूठा प्रलोभन देकर फुसलाया और उसका गंभीर यौन शोषण किया। यह अभियुक्त की घोर विकृत मानसिकता (Perverse Mentality) को स्थापित करता है। उसने एक पिता और एक पति के व्यक्तित्व को कलंकित किया है। यदि समाज में ऐसी विकृतियों पर कानून का कड़ा प्रहार नहीं किया गया, तो कोई भी नाबालिग बालिका सुरक्षित नहीं रह सकेगी। इसलिए विधि द्वारा विहित कठोरतम दंड दिया जाना न्याय के हित में अनिवार्य है।”

3. पोक्सो कानून में सहमति (Consent) कानूनन शून्य

  • बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि पीड़िता के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे, कोई जबरदस्ती सिद्ध नहीं हुई और संबंध सहमति से बने थे।
  • अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए दोहराया कि पोक्सो अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा दी गई कथित सहमति भी कानून की नजर में कोई सहमति नहीं होती:
    • पोक्सो अधिनियम की धारा 29 और 30 के तहत अपराध दर्ज होने और बुनियादी साक्ष्य आने के बाद अभियुक्त पर अपनी बेगुनाही साबित करने का वैधानिक भार (Statutory Presumption) होता है।
    • अभियुक्त पीड़िता से लगभग दोगुनी उम्र का था और यह भली-भांति जानता था कि वह नाबालिग है; उसने उसकी अबोध व कोमल मानसिक अवस्था का अनुचित लाभ उठाया।

4. डॉक्टर को दिया गया बयान ‘अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति’ (Extrajudicial Confession)

  • मेडिकल जांच के दौरान अभियुक्त ने सरकारी डॉक्टर के सामने स्वीकार किया था कि वह पीड़िता को दो साल से जानता था, उनके बीच “प्रेम संबंध” थे और उसने विभिन्न शहरों में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
  • अदालत ने डॉक्टर के समक्ष दिए गए अभियुक्त के इस बयान को कानूनी रूप से मान्य ‘एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन’ माना, जिसने पीड़िता की गवाही और अभियोजन के कथानक की पूर्ण पुष्टि (Corroboration) की।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (कलोल मंदिर अपहरण व शोषण)

  • घटना की तारीख: 19 अप्रैल 2026
  • वारदात का विवरण: कलोल की रहने वाली पीड़िता (आयु 17 वर्ष, 2 महीने, 28 दिन) को अभियुक्त ने शादी का झांसा देकर एक मंदिर के बाहर से अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और ले गया।
  • पहचान का संदर्भ: पीड़िता अभियुक्त को इसलिए जानती थी क्योंकि अभियुक्त की पत्नी एक ब्यूटी पार्लर में काम करती थी, जहां पीड़िता अक्सर जाया करती थी।
  • बंधक बनाकर यौन शोषण: अभियुक्त ने किशोरी को दहेगाम, करंभा, नरोदा और अंत में नडियाद में अपने रिश्तेदारों व दोस्तों के घरों में रखा और लगातार कई बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
  • बरामदगी: सामाजिक प्रतिष्ठा और बदनामी के डर से परिवार ने शुरुआत में शिकायत नहीं की थी, लेकिन बाद में पुलिस में गुमशुदगी/अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने 4 जून को दोनों को बरामद किया।

सजा और प्रतिकर का ब्योरा

विशेष पोक्सो अदालत ने अभियुक्त को निम्नलिखित धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई:

  • धारा 6 पोक्सो एक्ट (Aggravated Penetrative Sexual Assault): 20 वर्ष का कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) और ₹50,000 का जुर्माना।
  • धारा 4 पोक्सो एक्ट (Penetrative Sexual Assault): 10 वर्ष का कठोर कारावास और ₹50,000 का जुर्माना।
  • सजा का समवर्ती निष्पादन: दोनों सजाएं एक साथ (Concurrently) चलेंगी, यानी दोषी को कुल 20 वर्ष जेल में बिताने होंगे। कुल जुर्माना ₹1,00,000 नियत किया गया।
  • पीड़िता प्रतिकर: अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), गांधीनगर को निर्देश दिया कि वह गुजरात पीड़ित प्रतिकर योजना, 2019 के तहत पीड़िता को ₹2 लाख की आर्थिक सहायता/मुआवजा तत्काल वितरित करे।

विधिक विवरण

  • न्यायालय: विशेष पोक्सो न्यायालय, कलोल (गांधीनगर जिला), गुजरात
  • प्रासंगिक कानून: लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 4, धारा 6, धारा 29 (दोष का उपधारणा) एवं धारा 30 (मानसिक स्थिति की उपधारणा); भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता के अपहरण एवं संकीर्ण परिरोध से संबंधित प्रावधान; गुजरात पीड़ित प्रतिकर योजना, 2019
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • स्वतंत्र बनाम राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘नाबालिग के मामले में सहमति का अभाव अंतर्निहित होता है; शादी का झांसा देकर नाबालिग से संबंध बनाना दुष्कर्म व एग्रैविटेड पेनिट्रेटिव असॉल्ट ही माना जाएगा।’
    • सतपाल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘पोक्सो की धारा 29/30 के तहत अभियोजन द्वारा बुनियादी तथ्य सिद्ध करने के बाद बचाव का विधिक दायित्व अभियुक्त पर स्थानांतरित हो जाता है।’

मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतविशेष पॉक्सो कोर्ट, कलोल (गांधीनगर, गुजरात)
सजा का विवरण20 साल का कठोर कारावास और ₹1 लाख का जुर्माना
मुख्य धाराएंपॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 4 और धारा 6
पीड़िता को मुआवजागुजरात पीड़ित मुआवजा योजना के तहत ₹2 लाख का मुआवजा
सुनवाई की समय-सीमाशिकायत के 5 महीने के भीतर फैसला; ट्रायल केवल 2 महीने 8 दिन में पूरा
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