नाबालिग होने के दावों का दिलचस्प कानूनी तर्क
- अपराध के समय कानून और सर्टिफिकेट का विरोधाभास
- घटना के समय कानून (1986 Act): जब यह अपराध (1995) हुआ और जब याचिकाकर्ता को जनवरी 2000 में नेशनल ओपन स्कूल (NIOS) से मार्कशीट मिली, तब Juvenile Justice Act, 1986 लागू था। इसके तहत लड़कों के लिए नाबालिग होने की सीमा 16 वर्ष थी।
- मार्कशीट में उम्र: मार्कशीट के अनुसार, घटना की तिथि पर उसकी उम्र 17 साल 1 महीना 27 दिन थी।
- कोर्ट का निष्कर्ष: वर्ष 2000 में यह सर्टिफिकेट आरोपी के किसी काम का नहीं था, क्योंकि उस वक्त के कानून के अनुसार 16 साल से ऊपर का लड़का बालिग माना जाता था। इसलिए, आरोपी के पास वर्ष 2000 में झूठी मार्कशीट बनवाने या अपनी उम्र कम लिखवाने का कोई मकसद (Motive) नहीं था।
- बाद में बदला कानून
- वर्ष 2000 के नए बाल न्याय अधिनियम (JJ Act, 2000) में लड़कों के लिए उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष की गई, और 2006 के संशोधन से यह प्रावधान जुड़ा कि नाबालिग होने का दावा मुकदमे या अपील के किसी भी चरण में किया जा सकता है।
- कानून बदलने के बाद ही उस पुरानी मार्कशीट की कानूनी उपयोगिता बनी।
- मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट (Bone Age Test): दिल्ली हाईकोर्ट ने 2004 में आरोपी का ‘मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट’ कराया था। दीन दयाल उपाध्याय (DDU) अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने पाया कि जनवरी 2005 में उसकी उम्र 22 से 25 साल के बीच थी। इस गणित से गणना करने पर भी 1 दिसंबर 1995 को उसकी उम्र 12 से 15 साल के बीच आती है, जिससे वह हर लिहाज से नाबालिग सिद्ध होता है।
सजा रद्द करने का कानूनी आधार
- JJ Act के तहत अधिकतम 3 साल की सजा: बाल न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) की धारा 15(1) के तहत किसी भी नाबालिग को सुधार गृह में अधिकतम 3 वर्ष के लिए ही रखा जा सकता है।
- अतिरिक्त समय जेल में काटा: आरोपी 2004 में जमानत मिलने से पहले ही 7 साल, 8 महीने और 15 दिन की वास्तविक जेल काट चुका था, जो कि कानूनन अधिकतम सजा (3 वर्ष) से दोगुनी से भी अधिक है।
- सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का पालन: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पवन कुमार बनाम यूपी राज्य (2023) और करण उर्फ फतिया का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अब मामले को ‘जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड’ (JJB) के पास भेजना निरर्थक होगा।
नई दिल्ली: किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के वर्षों बाद किशोर होने (Plea of Juvenility) का दावा पेश किए जाने पर दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच कैसे की जाए, इस पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 25 सितंबर 2026 को एक अत्यंत तार्किक और नजीर बनने योग्य विधिक व्यवस्था दी है।
वर्ष 2004 में सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की खंडपीठ ने 1 दिसंबर 1995 के लूट और हत्या (IPC धारा 394 व 302) के मामले में निचली अदालत द्वारा वर्ष 2004 में सुनाई गई आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा को निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि घटना के दिन अपीलकर्ता नाबालिग/किशोर था। चूंकि वह किशोर न्याय अधिनियम के तहत निर्धारित 3 वर्ष की अधिकतम सुधारात्मक हिरासत सीमा के मुकाबले पहले ही लगभग 8 वर्ष (7 वर्ष 8 माह से अधिक) की वास्तविक जेल काट चुका था, इसलिए अदालत ने उसकी दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखते हुए आजीवन कारावास के दंडादेश को निरस्त कर उसे पूर्णतः रिहा करने का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने माना कि जब कोई आयु संबंधी दस्तावेज किसी ऐसे पुराने कानूनी दौर में जारी हुआ हो जब उसमें दर्ज उम्र से अभियुक्त को कोई वैधानिक संरक्षण मिलता ही न रहा हो, तो उस दस्तावेज में उम्र घटाने या फर्जीवाड़ा करने का कोई दुर्भावनापूर्ण मकसद (Motive to Falsify) नहीं हो सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं विधिक तर्क
1. ‘दस्तावेज बनते समय कानून की स्थिति क्या थी?’ — प्रामाणिकता की अनूठी कसौटी न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की पीठ ने दस्तावेजी प्रामाणिकता की जांच के लिए एक अत्यंत सशक्त और व्यावहारिक सिद्धांत प्रतिपादित किया:
- अपीलकर्ता का सेकेंडरी स्कूल एग्जामिनेशन का अंकपत्र 22 जनवरी 2000 को ‘राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय’ (अब NIOS) द्वारा जारी किया गया था। इसमें घटना की तिथि (1 दिसंबर 1995) को उसकी आयु 17 वर्ष, 1 महीना और 27 दिन बैठती थी।
- खंडपीठ ने 2000 के विधिक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए रेखांकित किया:“वर्ष 2000 में जब यह अंकपत्र जारी हुआ था, तब देश में किशोर न्याय अधिनियम, 1986 (JJ Act, 1986) लागू था। 1986 के अधिनियम की धारा 2(h) के अनुसार केवल 16 वर्ष से कम आयु के बालक को ही ‘किशोर’ (Juvenile) माना जाता था। अंकपत्र के अनुसार घटना के समय अपीलकर्ता 17 वर्ष से अधिक का था, यानी वह 1986 के कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर था। इसलिए वर्ष 2000 में अपनी उम्र कम लिखाने या प्रमाण पत्र में हेरफेर करने से अभियुक्त को कोई कानूनी लाभ नहीं मिल सकता था। लाभ का अभाव यह सिद्ध करता है कि उम्र में छेड़छाड़ का कोई मकसद (Motive) नहीं था।”
- बाद में संसद द्वारा किशोर न्याय अधिनियम, 2000 लाया गया (जिसमें लड़कों के लिए आयु सीमा बढ़ाकर 18 वर्ष की गई) और वर्ष 2006 के संशोधन अधिनियम द्वारा धारा 7A जोड़ी गई, जिसने किसी भी अदालत या अपीलीय चरण में किशोर होने का दावा उठाने का कानूनी अधिकार प्रदान किया। संसद के इन परवर्ती बदलावों के बाद ही यह अंकपत्र उसके लिए उपयोगी साबित हुआ।
2. दोहरे साक्ष्यों का एक ही निष्कर्ष: मेडिकल बोर्ड का ऑसिफिकेशन टेस्ट अदालत के समक्ष अंकपत्र के अलावा मेडिकल साक्ष्य भी मौजूद था:
- वर्ष 2005 में डीडीयू अस्पताल (DDU Hospital) के मेडिकल बोर्ड द्वारा गठित बोर्ड ने शारीरिक, रेडियोलॉजिकल और डेंटल जांच (Ossification Test) के बाद निष्कर्ष निकाला था कि जनवरी 2005 में उसकी आयु 22 से 25 वर्ष के बीच थी।
- अदालत ने दोनों सिरों से गणितीय गणना की:
- यदि निचली सीमा (22 वर्ष) मानी जाए, तो घटना की तिथि पर उसकी आयु लगभग 12 वर्ष 11 माह थी।
- यदि ऊपरी सीमा (25 वर्ष) मानी जाए, तो भी घटना की तिथि पर उसकी आयु लगभग 15 वर्ष 11 माह थी।
- दोनों ही गणनाओं और NIOS द्वारा सत्यापित अंकपत्र के आधार पर यह अकाट्य रूप से साबित हुआ कि 1 दिसंबर 1995 को अपराध कारित होने के समय अपीलकर्ता विधिक रूप से नाबालिग था।
3. दोषसिद्धि बरकरार, सजा रद्द: JJB को वापस भेजना निरर्थक
- अपीलकर्ता ने 23 जुलाई 2026 को हलफनामा देकर स्पष्ट किया था कि वह गुण-दोष (Merits) पर दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि केवल किशोर न्याय के लाभ तक सीमित है। अदालत ने तदनुसार ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
- सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत किशोर साबित होने पर मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) को भेजा जाता है। परंतु JJ Act की धारा 15(1) के तहत किसी किशोर को अधिकतम 3 वर्ष के लिए ही विशेष गृह (Special Home) में भेजा जा सकता है।
- रिकॉर्ड के अनुसार अपीलकर्ता 19 जुलाई 2004 तक ही 7 वर्ष, 8 माह और 15 दिन की वास्तविक जेल काट चुका था (15 अप्रैल 2005 को हाईकोर्ट से सजा निलंबन मिला था)। अतः वह कानूनन स्वीकार्य अधिकतम अवधि से दोगुने से अधिक समय पहले ही जेल में बिता चुका था। ऐसे में मामले को जेजेबी भेजना सर्वथा निरर्थक (Futility) होता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 31 साल का कानूनी सफर
- 1995 का अपराध:
- घटना 1 दिसंबर 1995 की है, जो दिल्ली के सुल्तानपुरी पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 1176/1995 से संबंधित थी।
- अभियुक्त पर लूट और हत्या (IPC धारा 394 और 302) के गंभीर आरोप लगे थे।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्रकैद (2004):
- अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दिल्ली ने 19 फरवरी 2004 को उसे दोषी ठहराया और 21 फरवरी 2004 को IPC धारा 394 में 5 साल तथा धारा 302 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
- अपील में किशोर होने की अर्जी:
- उच्च न्यायालय में अपील लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता ने वर्ष 2000 में जारी ओपन स्कूल अंकपत्र के आधार पर जुवेनाइलिटी की अर्जी दाखिल की।
- अदालत के निर्देश पर वर्ष 2005 में मेडिकल बोर्ड द्वारा ऑसिफिकेशन टेस्ट हुआ और अंततः वर्ष 2026 में एनआईओएस (NIOS) ने आधिकारिक रूप से अंकपत्र की सत्यता की पुष्टि की।
- सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का अनुपालन:
- हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों—पवन कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) और करन उर्फ फतिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य—के न्यायशास्त्र का अनुसरण करते हुए दंडादेश को निरस्त किया।
विधिक प्रासंगिकता: देर से उठाए गए किशोर दावों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत
यह फैसला भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में एक मौलिक सिद्धांत स्थापित करता है:
- जब भी किसी पुराने मामले में दशकों बाद आयु प्रमाण पत्र पेश किया जाए, तो जांच का सबसे सुरक्षित पैमाना यह देखना है कि “जिस क्षण वह दस्तावेज अस्तित्व में आया, उस समय उस दस्तावेज का उसके धारक के लिए क्या कानूनी मूल्य था?”
- यदि तत्कालीन कानून के तहत वह दस्तावेज उसे कोई छूट या संरक्षण नहीं दिला सकता था, तो यह स्वतः प्रमाणित करता है कि उस प्रविष्टि को किसी मुकदमे से बचने की साजिश के तहत तैयार नहीं कराया गया था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अपीलकर्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली) [आपराधिक अपील संख्या… 2004 – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 7A (किसी भी स्तर पर किशोर होने का दावा उठाने का अधिकार) एवं धारा 15(1) (अधिकतम 3 वर्ष की सुधारात्मक हिरासत)
- किशोर न्याय अधिनियम, 1986 की धारा 2(h) (बालक किशोर की तत्कालीन 16 वर्ष की सीमा)
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) नियमावली, 2007 का नियम 12 (उम्र निर्धारण की प्रक्रिया और दस्तावेजों का पदानुक्रम – मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट > स्कूल प्रवेश रजिस्टर > मेडिकल बोर्ड राय)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302 एवं 394
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (न्यायसंगत प्रक्रिया और अवैध लंबी हिरासत से संरक्षण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें:
- पवन कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि अभियुक्त अपराध के समय किशोर था और वह अधिनियम के तहत निर्धारित 3 वर्ष से अधिक की अवधि पहले ही जेल में काट चुका है, तो दोषसिद्धि को यथावत रखते हुए उसे तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।’
- करन उर्फ फतिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘दोषसिद्धि के बाद भी जुवेनाइलिटी सिद्ध होने पर आजीवन कारावास की सजा निरस्त की जाएगी और जेजेबी को औपचारिक भेजने की आवश्यकता नहीं रह जाती।’
- हरि राम बनाम राजस्थान राज्य (2009, सुप्रीम कोर्ट) — ‘2000 का अधिनियम और 2006 का संशोधन 2000 से पूर्व घटित सभी लंबित मामलों पर पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होता है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: आपराधिक अपील आंशिक रूप से स्वीकार; ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि बरकरार, परंतु आजीवन कारावास और 5 वर्ष का दंडादेश पूरी तरह निरस्त; अपीलकर्ता के जमानत मुचलके निरस्त कर उसे पूर्ण विधिक मुक्ति (Release) प्रदान की गई।
JJ Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति रविंद्र दुदेजा |
| घटना का वर्ष / मामला | 1 दिसंबर 1995 (FIR 1176/1995, थाना सुल्तानपुरी – IPC 302, 394) |
| निचली अदालत की सजा | 2004 में आजीवन कारावास (Life Imprisonment) |
| मुख्य कानूनी आधार | वर्ष 2000 में जारी नेशनल ओपन स्कूल का मार्कशीट और 2005 का मेडिकल बोन-एज टेस्ट |
| अंतिम आदेश | दोषसिद्धि बरकरार; आजीवन कारावास रद्द; जेल में बिताई अवधि (7+ वर्ष) के आधार पर रिहाई। |

