मामले के मुख्य तथ्य और हाईकोर्ट के निष्कर्ष
- MLC में पीड़िता का शुरुआती बयान (सबसे अहम सबूत): घटना के तुरंत बाद जब पुलिस महिला कांस्टेबल के साथ पीड़िता को अस्पताल ले गई, तो उसने डॉक्टर को साफ कहा कि उसके साथ कोई शारीरिक या यौन हमला नहीं हुआ है और वह माता-पिता के दबाव के कारण घर छोड़कर गई थी। उस वक्त आरोपी पुलिस हिरासत में था और अस्पताल में मौजूद नहीं था। हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस सुरक्षा में दिया गया यह शुरुआती बयान सबसे महत्वपूर्ण है।
- FSL रिपोर्ट (फॉरेंसिक साक्ष्य) से झूठा दावा बेनकाब: पीड़िता ने अदालत में बयान दिया था कि हमले के दौरान उसके कपड़े खून से पूरी तरह भीग गए थे। हालांकि, FSL रिपोर्ट (फॉरेंसिक साइंस लैब) में पीड़िता के कपड़ों या सैंपल पर खून या वीर्य (Semen) का कोई निशान नहीं मिला। अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक रिपोर्ट ने पीड़िता के दावे को सीधे तौर पर खारिज कर दिया।
- उम्र का विवाद और केवल स्कूल रजिस्टर पर निर्भरता: पीड़िता की उम्र को लेकर रिकॉर्ड में चार अलग-अलग तिथियां/उम्र थीं (17 साल, 18 साल, और भाई के शिकायत पत्र में 1992 जन्मतिथि)। State v. Sonu मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल स्कूल एडमिशन रजिस्टर में दर्ज उम्र को अंतिम सबूत नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब माता-पिता का बयान न लिया गया हो और कोई बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) न कराया गया हो।
- सार्वजनिक स्थानों पर व्यवहार और स्वतंत्र आवाजाही: पीड़िता ऑटो-रिक्शा, रेलवे स्टेशन और ट्रेन में यात्रा के दौरान आरोपी के साथ रही, लेकिन उसने किसी सह-यात्री या रेलवे पुलिस से कोई शिकायत नहीं की और न ही शोर मचाया। अदालत ने माना कि यह जबरन अपहरण के बजाय अपनी मर्जी से जाने की ओर इशारा करता है।
- बचाव पक्ष के सुझावों को स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता: निचली अदालत ने आरोपी द्वारा पूछे गए सवालों (Defence Suggestions) को ही उसका अप्रत्यक्ष अपराध स्वीकार करना मान लिया था। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को पूरी तरह गलत ठहराया और कहा कि साबित करने का भार (Burden of Proof) हमेशा अभियोजन पक्ष (Prosecution) पर होता है।
नई दिल्ली: यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता, चिकित्सा साक्ष्य (MLC), फॉरेंसिक रिपोर्ट (FSL) और पीड़िता की आयु निर्धारण के विधिक मानकों पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 23 सितंबर 2026 को एक अत्यंत विस्तृत और नजीर बनने योग्य फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 में विशेष फास्ट ट्रैक अदालत द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म), 363, 366/368 (अपहरण) और 506 के तहत सुनाई गई दोषसिद्धि और कारावास की सजा को 13 साल बाद पूरी तरह निरस्त (Set Aside) करते हुए अपीलकर्ता को सभी आरोपों से दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया।
न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की एकल पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि हालांकि यह स्थापित विधि है कि अभियोजन पक्ष केवल पीड़िता के एकमात्र विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि हासिल कर सकता है, लेकिन जब अभियोजन के अपने ही प्राथमिक दस्तावेज़—विशेष रूप से घटना के तुरंत बाद तैयार की गई मेडिकल हिस्ट्री (MLC), फॉरेंसिक रिपोर्ट और असत्यापित स्कूल दाखिला रजिस्टर—पीड़िता की गवाही के भौतिक तथ्यों का प्रत्यक्ष खंडन करते हों, तो उस गवाही को “अकाट्य सत्य” (Gospel Truth) मानकर संदेह का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘पुलिस सुरक्षा में डॉक्टर को दिया गया पहला बयान सबसे महत्वपूर्ण’ न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने मेडिकल जांच के समय दर्ज इतिहास (MLC History) के विधिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा: “यौन उत्पीड़न के मामले में सबसे पहला आधिकारिक दस्तावेज आमतौर पर मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट (MLC) होता है, और इसमें दर्ज की गई हिस्ट्री उस समय ली जाती है जब किसी के पास कहानी गढ़ने या सोचने का समय नहीं होता। यही बात इसे कानूनी वजन प्रदान करती है। जब पीड़िता को महिला पुलिस कांस्टेबल के आधिकारिक एस्कॉर्ट में अस्पताल लाया गया था और आरोपी आसपास कहीं नहीं था (उसने कई दिनों बाद आत्मसमर्पण किया था), तब उसने स्वतंत्र डॉक्टर के सामने किसी भी प्रकार के शारीरिक या यौन उत्पीड़न से स्पष्ट इनकार किया और घर छोड़ने का कारण ‘पारिवारिक दबाव’ (Parental Pressure) बताया। यह बयान अभियुक्त द्वारा झूठे फंसाए जाने के बचाव से पूरी तरह मेल खाता है।”
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस निष्कर्ष को खारिज कर दिया जिसमें पीड़िता द्वारा बाद में दी गई ‘धमकी’ की दलील को स्वीकार किया गया था। पीठ ने नोट किया कि पुलिस सुरक्षा में और अस्पताल के सुरक्षित माहौल में किसी हथियार या शारीरिक बल का उपयोग किए बिना डॉक्टर को ऐसा बयान देना और बाद में उसे धमकी का परिणाम बताना ‘सोच-समझकर बाद में गढ़ा गया बहाना’ (Afterthought) प्रतीत होता है।
2. कपड़ों पर खून का दावा झूठा साबित: फॉरेंसिक रिपोर्ट (FSL) का प्रत्यक्ष खंडन
- पीड़िता ने अदालत में गवाही दी थी कि कथित हमले के दौरान उसके कपड़े खून से लथपथ (Soaked with blood) हो गए थे।
- हालांकि, डॉक्टर द्वारा तैयार एमएलसी में शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई।
- इसके अलावा, 9 मई 2011 की एफएसएल (FSL) रिपोर्ट ने उसके कपड़ों या वैजाइनल स्वैब पर रक्त का कोई निशान नहीं पाया। किसी भी कपड़े या अंडरगारमेंट्स पर वीर्य (Semen) का कोई अंश भी नहीं मिला।
- अदालत ने माना कि यह फॉरेंसिक रिपोर्ट केवल पुष्टि करने में विफल नहीं रही, बल्कि इसने पीड़िता द्वारा अदालत में दिए गए विशिष्ट और जांच-योग्य दावे को पूरी तरह झूठा सिद्ध (Directly Disproved) कर दिया।
3. स्कूल दाखिला रजिस्टर उम्र का अकाट्य साक्ष्य नहीं: ऑसिफिकेशन टेस्ट का अभाव नाबालिग होने के दावे पर अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर उम्र को लेकर चार अलग-अलग विरोधाभासी आंकड़े मौजूद थे:
- भाई की शिकायत में जन्मतिथि: 1 अगस्त 1992
- अदालत में पीड़िता की गवाही: लगभग 18 वर्ष
- धारा 164 CrPC के बयान: 17 वर्ष
- एमएलसी रिकॉर्ड: 17 वर्ष
- भाई ने जिरह में स्वीकार किया कि वह जन्मतिथि को लेकर आश्वस्त नहीं था, लड़की का जन्म गांव में हुआ था और कोई जन्मपत्री या नगर निगम का जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। माता-पिता में से किसी का बयान दर्ज नहीं कराया गया और न ही हड्डियों की जांच (Ossification Test) कराई गई।
- अदालत ने स्टेट बनाम सोनू (2026) का हवाला देते हुए व्यवस्था दी कि बिना किसी सहायक प्राथमिक दस्तावेज के स्कूल रजिस्टर में दर्ज प्रविष्टि अपने आप में उम्र का अकाट्य प्रमाण नहीं हो सकती।
4. सार्वजनिक स्थानों पर आचरण और बचाव पक्ष के सुझाव
- पीड़िता आरोपी के साथ ऑटो-रिक्शा, खुले रेलवे प्लेटफॉर्म और पैसेंजर ट्रेन में लंबी यात्रा करती रही, लेकिन उसने कहीं भी सह-यात्रियों या रेलवे पुलिस से कोई मदद नहीं मांगी और न ही कोई शोर मचाया। यह आचरण जबरन अपहरण के बजाय स्वेच्छा से जाने की ओर संकेत करता है।
- अदालत ने ट्रायल कोर्ट के इस दृष्टिकोण को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताया कि बचाव पक्ष द्वारा गवाहों को दिए गए सुझावों (Suggestions) को दोष की अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति मान लिया गया था। पीठ ने दोहराया कि संदेह से परे अपराध सिद्ध करने का भार सदैव अभियोजन पर रहता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 13 साल का कानूनी सफर
- 2010 की घटना और एफआईआर:
- मामला शाहदरा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 307/2010 से संबंधित है।
- आरोप था कि अपीलकर्ता शाहबुद्दीन ने पीड़िता का जबरन अपहरण किया, उसे बंधक बनाकर रखा और उसके साथ दुष्कर्म किया।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि (2013):
- विशेष फास्ट ट्रैक अदालत (कड़कड़डूमा, दिल्ली) के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 19 जुलाई 2013 को शाहबुद्दीन को IPC की धारा 363, 368/366, 376 और 506 के तहत दोषी ठहराया था और 24 जुलाई 2013 को सश्रम कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई थी।
- अपीलकर्ता का लगातार बचाव:
- अपीलकर्ता ने शुरू से रुख अपनाया कि वह पीड़िता के भाई की टेलरिंग की दुकान पर 15 दिनों से काम कर रहा था, जहां पीड़िता भी सिलाई मशीनों पर काम करती थी।
- विवाह का प्रस्ताव ठुकराए जाने और पारिवारिक कलह के बाद उसे रंजिशन झूठे मुकदमे में फंसाया गया था।
- हाईकोर्ट से राहत (2026): उच्च न्यायालय ने पाया कि 13 वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने वाले अभियुक्त के खिलाफ अभियोजन पक्ष का पूरा मामला अपनी ही अंतर्विरोधों की नींव पर ढह गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शाहबुद्दीन बनाम राज्य (NCT दिल्ली) व अन्य [आपराधिक अपील – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता की ओर से: अधिवक्ता सुनील कुमार
- राज्य (अभियोजन) की ओर से: सतिंदर सिंह बावा, अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP)
- अभियोक्त्री (पीड़िता) की ओर से: सुश्री आस्था (दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म), धारा 363 एवं 366/368 (अपहरण व व्यपहरण) तथा धारा 506 (आपराधिक धमकी)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 (सार्वजनिक दस्तावेजों की ग्राह्यता), धारा 101-102 (सबूत का भार), एवं धारा 114A (सहमति की उपधारणा की शर्तें)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 164 एवं 374 (अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें:
- वेद पाल बनाम हरियाणा राज्य (2023, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यद्यपि दुष्कर्म पीड़िता की एकमात्र गवाही दोषसिद्धि का आधार बन सकती है, लेकिन यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक निष्कर्ष गवाही का प्रत्यक्ष खंडन करते हों, तो अभियुक्त को संदेह का लाभ अवश्य मिलना चाहिए।’
- राजू बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2008, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पीड़िता के बयान को बिना किसी जांच के अचूक सत्य (Gospel Truth) नहीं माना जा सकता; अदालतों को झूठे फंसाए जाने की संभावनाओं और वैज्ञानिक साक्ष्यों के प्रति सजग रहना चाहिए।’
- स्टेट बनाम सोनू (2026, दिल्ली हाईकोर्ट) — ‘विश्वसनीय आधारभूत दस्तावेजों के बिना स्कूल रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि को नाबालिग होने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता, विशेषकर जब मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट न कराया गया हो।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: आपराधिक अपील स्वीकार; कड़कड़डूमा अदालत का 19 जुलाई 2013 का दोषसिद्धि आदेश और 24 जुलाई 2013 का दंडादेश पूरी तरह निरस्त; अपीलकर्ता को सभी आरोपों से ससम्मान बरी किया गया।
Rape & Kidnapping: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव |
| अपीलकर्ता | शहाबुद्दीन (Shahbuddin) |
| निचली अदालत का फैसला | जुलाई 2013 में कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा IPC 363, 368, 366, 376 और 506 में सजा। |
| हाईकोर्ट का अंतिम आदेश | 23 सितंबर 2026 को दोषसिद्धि और सजा का आदेश रद्द; आरोपी पूरी तरह बरी। |

