अदालत के समक्ष कानूनी तर्क
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का संदर्भ (K. Umadevi Case): याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के. उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार का हवाला देकर तर्क दिया कि मातृत्व अवकाश से इनकार करना अनुचित है। हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि के. उमादेवी मामले के तथ्य अलग थे, क्योंकि उसमें महिला के पहली शादी से दो बच्चे थे और सरकारी सेवा में आने के बाद दूसरी शादी से उनका पहला बच्चा हुआ था।
- मद्रास हाईकोर्ट का फैसला (M. Asiya Begum Case): अधिकारियों ने मद्रास हाईकोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एम. असिया बेगम फैसले का सहारा लिया, जहां पहली बार में जुड़वां बच्चे होने के बाद अगली गर्भावस्था के लिए छुट्टी नहीं दी गई थी। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:“मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया था कि नियम 43 के तहत पात्रता डिलीवरी की संख्या (Number of Deliveries) पर नहीं, बल्कि आवेदन के समय जीवित बच्चों की संख्या (Number of Surviving Children) पर आधारित है।”
नई दिल्ली: महिला सरकारी कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों (Maternity Rights), प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और सेवा नियमों के बीच के संवैधानिक अंतर्संबंध पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक परीक्षण शुरू किया है।
डॉ. गीता रानी की याचिका पर सुनवाई
न्यायमूर्ति अवनीश झिंगन और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने डॉ. गीता रानी की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न का संज्ञान लिया और मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 6 अक्टूबर को तय की है। यह नियम किसी महिला सरकारी कर्मचारी को केवल तभी 180 दिनों के मातृत्व अवकाश का हकदार मानता है जब उसके “दो से कम जीवित बच्चे” (Less than two surviving children) हों। याचिकाकर्ता महिला चिकित्सक ने अपनी पहली गर्भावस्था में जुड़वां (Twins) बच्चों को जन्म दिया था, जिसके चलते विभाग ने दूसरी गर्भावस्था के दौरान उसे तीसरे जीवित बच्चे के आधार पर सवैतनिक मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972 [CCS (Leave) Rules, 1972] के नियम 43 (Rule 43) की संवैधानिक वैधता (Vires) को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य विधिक प्रश्न एवं न्यायिक अवलोकन
1. ‘प्रसव की संख्या’ बनाम ‘जीवित बच्चों की संख्या’ का विधिक द्वंद्व खंडपीठ के समक्ष मुख्य विचारणीय बिंदु यह है कि क्या नियम 43(1) के तहत मातृत्व अवकाश की पात्रता का निर्धारण गर्भावस्था/प्रसव (Pregnancy/Delivery) की संख्या के आधार पर होना चाहिए अथवा जीवित बच्चों (Surviving Children) की संख्या के आधार पर:
- वर्तमान नियम 43(1) स्पष्ट रूप से “दो से कम जीवित बच्चों” की शर्त लगाता है।
- याचिकाकर्ता के मामले में गर्भावस्था तो केवल दूसरी (Second Pregnancy) थी, परंतु पहली ही डिलीवरी में जुड़वां बच्चों के जन्म के कारण जीवित बच्चों की संख्या पहले से दो हो चुकी थी।
- अदालत ने परीक्षण के लिए यह बिंदु निर्धारित किया कि क्या प्राकृतिक रूप से जुड़वां बच्चे पैदा होने जैसी जैविक घटना के आधार पर किसी महिला को उसकी अगली गर्भावस्था में नवजात शिशु की देखभाल और स्वयं के स्वास्थ्य लाभ हेतु मातृत्व अवकाश से पूरी तरह वंचित किया जा सकता है।
2. न्यायिक नजीरों का विश्लेषण एवं तथ्यात्मक भेद
- के. उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार (सुप्रीम कोर्ट):
- याचिकाकर्ता के वकील ने इस नजीर का हवाला देते हुए तर्क दिया कि तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश अनुचित रूप से नकारा गया।
- हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि के. उमादेवी मामले के तथ्य वर्तमान मामले से भौतिक रूप से भिन्न (Materially Different) थे। उस मामले में महिला कर्मचारी के पास सरकारी सेवा में प्रवेश से पहले अपनी पूर्व शादी से दो जैविक बच्चे थे, और सेवा में आने के बाद उसने अपनी मौजूदा शादी से पहले बच्चे को जन्म दिया था।
- भारत संघ बनाम एम. आसिया बेगम (मद्रास उच्च न्यायालय):
- सरकारी प्राधिकारियों ने इस फैसले का हवाला देकर अवकाश खारिज करने की कार्रवाई को सही ठहराया था, जिसमें पहली बार जुड़वां बच्चे होने के बाद तीसरे बच्चे पर अवकाश मांगा गया था।
- दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक अवलोकन दर्ज किया:“मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले ने अपील स्वीकार करते हुए इस बुनियादी पहलू पर विचार नहीं किया था कि सीसीएस नियम 43 के तहत पात्रता प्रसव (Deliveries) की संख्या पर आधारित नहीं है, बल्कि मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन करते समय जीवित बच्चों (Surviving Children) की संख्या पर आधारित है।”
- इस जटिल विधिक स्थिति को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने नियम 43 की वैधानिकता और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के साथ इसकी असंगतता पर अदालत की सहायता के लिए अतिरिक्त समय का अनुरोध किया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- 2024 में पहली गर्भावस्था और जुड़वां बच्चे: याचिकाकर्ता डॉ. गीता रानी एक सरकारी कर्मचारी/चिकित्सक हैं। वर्ष 2024 में उनकी पहली गर्भावस्था के दौरान जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ, जो दोनों जीवित और स्वस्थ हैं।
- दूसरी गर्भावस्था और अवकाश आवेदन: हाल ही में जब वे दूसरी बार गर्भवती हुईं, तो उन्होंने प्रसव पूर्व और प्रसव पश्चात देखभाल के लिए 180 दिनों के मातृत्व अवकाश हेतु विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया।
- विभाग द्वारा आवेदन निरस्त: सक्षम प्राधिकारियों ने केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972 के नियम 43 का हवाला देते हुए उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि उनके पास पहले से ही दो जीवित बच्चे हैं, इसलिए वे सेवा नियमों के तहत तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश पाने की हकदार नहीं हैं।
- हाईकोर्ट में चुनौती: व्यथित होकर डॉ. गीता रानी ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर नियम 43 की संवैधानिक वैधता को सीधे चुनौती दी।
सीसीएस (अवकाश) नियम, 1972 का नियम 43 क्या कहता है?
- नियम 43(1): किसी महिला सरकारी सेवक को, जिसके दो से कम जीवित बच्चे हों, सक्षम प्राधिकारी द्वारा 180 दिनों की अवधि के लिए मातृत्व अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है।
- अपवाद: नियम यह भी प्रावधान करता है कि गर्भपात (Miscarriage or Abortion) के मामलों में जीवित बच्चों की संख्या पर विचार किए बिना पूरे सेवाकाल में अधिकतम 45 दिनों का मातृत्व अवकाश दिया जा सकता है।
- संवैधानिक विरोधाभास: याचिका में उठाया गया मुख्य तर्क यह है कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961) और भारत के संविधान का अनुच्छेद 42 (प्रसूति सहायता का उपबंध) मातृत्व को एक मानवीय और स्वास्थ्य अधिकार के रूप में देखते हैं। दो बच्चों के जनसंख्या नियंत्रण के नीतिगत उद्देश्य को ऐसी असाधारण परिस्थितियों में थोपना जहां पहली ही बार में जुड़वां बच्चे हो गए हों, मनमाना (Arbitrary) और भेदभावपूर्ण है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. गीता रानी बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं सेवा नियम:
- केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972 का नियम 43 (महिला सरकारी कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश की पात्रता)
- मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961) की धारा 5
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की राज्य की शक्ति), और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें प्रजनन स्वायत्तता शामिल है)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 42 (काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का उपबंध – DPSP)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- दीपिका सिंह बनाम केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) (2022, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल जैविक प्रसव तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चे के पालन-पोषण और मां के स्वास्थ्य की सुरक्षा है; सेवा नियमों की ऐसी कठोर व्याख्या नहीं की जा सकती जो सामाजिक सुरक्षा और मातृत्व के मूल उद्देश्य को ही परास्त कर दे।’
- म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम महिला कर्मचारी (मस्टर रोल) (2000, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मातृत्व लाभ प्रत्येक कामकाजी महिला की गरिमा और सामाजिक न्याय का अनिवार्य हिस्सा है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति अवनीश झिंगन और न्यायमूर्ति शैल जैन (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: केंद्र सरकार और प्रतिवादियों को नोटिस जारी; नियम 43 की वैधानिकता पर विस्तृत विधिक परीक्षण हेतु मामला 6 अक्टूबर 2026 के लिए सूचीबद्ध।
Maternity Leave: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अवनीश झिंगन एवं न्यायमूर्ति शैल जैन |
| याचिकाकर्ता | डॉ. गीता रानी (सरकारी कर्मचारी) |
| चुनौतीपूर्ण कानून | CCS (Leave) Rules, 1972 का नियम 43 |
| मुख्य मुद्दा | पहली डिलीवरी में जुड़वां (Twins) बच्चे होने के बाद, क्या दूसरी डिलीवरी/गर्भावस्था के दौरान मातृत्व अवकाश का अधिकार मिलता है? |
| अगली सुनवाई | 6 अक्टूबर 2026 |

