Monday, September 28, 2026
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Contract Service: 10 साल तक ठेके पर काम करने के बाद लिखित परीक्षा की शर्त; खुली चयन प्रक्रिया से आए कर्मी बैक-डोर एंट्री नहीं, नौकरी करें नियमित

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी आधार

  1. ‘उमादेवी केस’ (Umadevi Judgment) और ‘बैक-डोर एंट्री’ का अंतर: अदालत ने सचिन अंबादास ढावले बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जो कर्मचारी खुले विज्ञापन और वैधानिक चयन समिति के माध्यम से चुने गए हैं, उन्हें उमादेवी मामले के तहत अवैध या चोर दरवाजे से घुसे कर्मचारी नहीं माना जा सकता।
  2. समानता का अधिकार (Principle of Parity): यूपी राज्य बनाम अरविंद कुमार श्रीवास्तव मामले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वासई-विरार नगर निगम के 33 अन्य कर्मचारियों को बिना किसी परीक्षा के नियमित किया जा चुका है। कानून सभी समान कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
  3. निरंतर और आवश्यक सेवाएं (Perennial Work): जग्गो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि जब कर्मचारी वर्षों तक अनिवार्य स्वास्थ्य सेवाएं (Perennial Duties) दे रहे हैं और स्वीकृत पद (Sanctioned Vacancies) उपलब्ध हैं, तो केवल “संविदा” (Contract) का टैग लगाकर उन्हें नियमित करने से इनकार नहीं किया जा सकता।
  4. तदर्थवाद (Ad-hocism) पर करारा प्रहार: खंडपीठ ने सरकारी तंत्र में तदर्थ प्रथा की कड़ी आलोचना करते हुए कहा:“वर्षों तक संविदा का नवीनीकरण करना नियोक्ता द्वारा अपनी सुविधा देखना नहीं, बल्कि कर्मचारी के कामकाजी जीवन को निचोड़ना है। बेरोजगारी के इस दौर में नागरिकों से काम लेकर उन्हें स्थायी अधिकारों से वंचित रखना किसी सार्वजनिक हित को पूरा नहीं करता।”

मुंबई: सार्वजनिक रोजगार में लंबे समय से चली आ रही संविदा/तदर्थ व्यवस्था (Cultivation of Ad-hocism), बारहमासी कार्यों (Perennial Duties) में कार्यरत कर्मियों के नियमितीकरण और उमादेवी सिद्धांत की विधिक सीमाओं पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अत्यंत व्यापक और दूरगामी फैसला सुनाया है।

याचिकाकर्ता डॉक्टरों को उनके संबंधित पदों पर समाहित का आदेश

न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे की खंडपीठ ने नगर निगम को सख्त निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता डॉक्टरों को उनके संबंधित पदों पर समाहित (Absorb) कर दो सप्ताह के भीतर नियमितीकरण (Regularisation) आदेश जारी करे। इसके साथ ही खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की मांग से आगे बढ़ते हुए महाराष्ट्र सरकार को एक स्पष्ट विधिक परामर्श दिया कि वह पूरे राज्य के सभी नगर निगमों के लिए एक व्यापक नीतिगत निर्देश जारी करे ताकि वर्षों तक चलने वाली संविदा नियुक्तियों की शोषणकारी प्रथा को समाप्त कर सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नियमितीकरण प्रदान किया जा सके। उच्च न्यायालय ने वसई-विरार शहर नगर निगम (VVCMC) के अस्पतालों और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पिछले 8 से 10 वर्षों से निरंतर सेवाएं दे रहे एमबीबीएस डॉक्टरों को स्थायी करने से पहले नई लिखित परीक्षा (Written Examination) उत्तीर्ण करने की राज्य सरकार की शर्त को पूरी तरह निरस्त (Quashed and Set Aside) कर दिया है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘खुली विज्ञापन प्रक्रिया से हुई नियुक्ति बैक-डोर एंट्री नहीं हो सकती’ न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे की पीठ ने संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले उमादेवी की आड़ लेकर नियमितीकरण से इनकार करने के तर्क को खारिज करते हुए कहा:

  • याचिकाकर्ता डॉक्टरों की नियुक्ति कोई अनौपचारिक या पिछले दरवाजे (Back-door Entry) से की गई व्यवस्था नहीं थी।
  • इन नियुक्तियों के लिए नगर निगम ने सार्वजनिक विज्ञापन (Public Advertisements) जारी किए थे और महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम, 1949 (MMC Act) तथा सुसंगत सेवा नियमों के तहत विधिवत गठित चयन समिति (Duly Constituted Selection Committee) के समक्ष खुली मेरिट प्रक्रिया के माध्यम से चयन हुआ था।
  • अदालत ने सचिन अंबादास दावले बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए व्यवस्था दी कि जहां चयन विहित भर्ती प्रक्रिया और खुली प्रतिस्पर्धा के तहत हुआ हो, वहां उन नियुक्तियों को अवैध (Illegal) नहीं ठहराया जा सकता और न ही उन पर उमादेवी की रोक लागू होती है।

2. बारहमासी सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्य (Perennial Nature of Work)

  • पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों—जग्गो बनाम भारत संघ, धरम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य—का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि जब कर्मचारियों द्वारा किया जाने वाला कार्य बारहमासी, अनिवार्य और संस्था के मूल संचालन से जुड़ा हो, तो नियोक्ता महज “संविदा” (Contractual Label) की आड़ लेकर अपने दायित्व से नहीं बच सकता।
  • स्वीकृत रिक्तियां (Sanctioned Vacancies) मौजूद होने और वर्षों तक निर्बाध सेवा लेने के बावजूद नियमित पदों पर स्थायी करने से मना करना मनमाना और असंवैधानिक है।

3. ‘समान स्थिति वाले कर्मियों के साथ एक जैसा व्यवहार अनिवार्य’

  • उच्च न्यायालय ने पाया कि वसई-विरार नगर निगम में ही 33 अन्य कर्मचारियों को राज्य सरकार की मंजूरी से बिना किसी नई परीक्षा के नियमित किया जा चुका है। अन्य नगर निगमों में भी समान संविदा कर्मियों को नियमितता दी गई है।
  • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अरविंद कुमार श्रीवास्तव में सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सेवा न्यायशास्त्र का स्थापित नियम है कि जब समान स्थिति वाले कर्मचारियों के एक वर्ग को लाभ दिया जाता है, तो शेष सभी समान कर्मियों को वही लाभ पाने का विधिक अधिकार है; चयनात्मक इनकार अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

4. ’10 साल संविदा पर रखकर युवा कार्यजीवन को निचोड़ लेना आपत्तिजनक’ अदालत ने एक दशक लंबी संविदा सेवा के मानवीय और करियर संबंधी पहलुओं पर गंभीर टिप्पणी की: “आठ से दस वर्षों तक नगर निगम की सेवा करने के बाद याचिकाकर्ताओं के पास इसी रोजगार में बने रहने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता; समान सार्वजनिक रोजगार या अन्य संगठनों में नई भर्ती के द्वार आयु सीमा आदि के कारण उनके लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। यह कोई भावुक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि तदर्थ व्यवस्था मूल रूप से क्यों आपत्तिजनक है—जो नियोक्ता एक दशक तक हर साल संविदा का नवीनीकरण करता रहता है, वह कोई प्रशासनिक लचीलापन नहीं दिखा रहा, बल्कि वह नियमित सेवा के लाभों को रोकते हुए उस व्यक्ति के पूरे कामकाजी जीवन को खपा (Consuming the working life) रहा है।”

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व्यवस्था पर प्रहार: ‘एडहॉक प्रथा को इतिहास के पन्नों में दफन करें’

फैसले का सबसे उल्लेखनीय हिस्सा प्रशासनिक नीति और सार्वजनिक रोजगार पर अदालत का विस्तृत विश्लेषण है:

  • पीठ ने स्पष्ट किया कि स्वीकृत नियमों के तहत पदों का सृजन और रिक्तियों को भरना सामान्य नियम (Rule) होना चाहिए, जबकि अत्यंत अल्पावधि के लिए संविदा नियुक्ति एक अपवाद (Exception) होनी चाहिए।
  • व्यवस्था में एडहॉक का संक्रमण: व्यवस्था को स्थायी कैडर बनाने के बजाय एडहॉक प्रथा के संवर्धन (Cultivation of Ad-hocism) ने संक्रमित कर दिया है।
  • रोजगार नीति पर सवाल: अदालत ने कहा कि जिस देश में बेरोजगारी राज्य की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है, वहां नागरिकों द्वारा संविदा या अस्थायी नौकरियों को लपकने में कोई दोष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन जब इतनी बड़ी संख्या में योग्य, प्रतिभाशाली और सक्षम कार्यबल उपलब्ध है, तो उचित स्वीकृत पदों का सृजन न करने और नियमित नियुक्तियां न करने से कौन सा ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ सिद्ध होता है, यह समझ से परे है।
  • वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation): अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक नियोक्ता के संदर्भ में ‘वैध अपेक्षा’ का सिद्धांत सरकारी कार्रवाइयों में मनमानेपन पर अंकुश लगाने का एक सशक्त विधिक साधन है। अदालत ने आशा व्यक्त की कि राज्य सरकार और निगम यह सुनिश्चित करेंगे कि सार्वजनिक रोजगार में एडहॉक प्रथा को इतिहास के हवाले किया जाए।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 2026 के विवादित आदेश

  • याचिकाकर्ताओं की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता महाराष्ट्र के अधिवासी (Domiciled) एमबीबीएस डॉक्टर हैं, जिन्हें खुली चयन प्रक्रिया के बाद वसई-विरार शहर नगर निगम के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में अनुबंधित आधार पर नियुक्त किया गया था। वे लगभग एक दशक (8-10 वर्ष) से निरंतर चिकित्सा सेवाएं दे रहे थे।
  • विवादित पत्राचार (जनवरी 2026):
    • 21 जनवरी 2026: नगर विकास विभाग (UDD) ने नगर निगम आयुक्त को पत्र भेजकर संविदा डॉक्टरों को स्थायी करने से पूर्व एक नई लिखित परीक्षा आयोजित करने का निर्देश दिया।
    • 28 जनवरी 2026: इसके अनुसरण में उप-आयुक्त (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य) ने कानूनी विभाग को पत्र जारी किया।
  • हाईकोर्ट में चुनौती: इन दोनों आदेशों को मनमाना और अवैध बताते हुए डॉ. भक्ति दीपक चौधरी और अन्य डॉक्टरों ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाएं दाखिल कर बिना किसी नई परीक्षा के नियमितीकरण और स्थायी सेवा लाभ की मांग की।

नियमितीकरण की ‘चार सूत्रीय’ विधिक कसौटी (Legal Test)

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सेवा की अवधि स्वतः नियमितीकरण का अधिकार नहीं देती; बल्कि यह निम्नलिखित 4 तत्वों का संयुक्त संतुलन है:

  1. वैध चयन: सार्वजनिक विज्ञापन और विधिवत गठित चयन समिति के माध्यम से खुली प्रतिस्पर्धा द्वारा नियुक्ति हुई हो।
  2. बारहमासी कार्य: कार्य की प्रकृति बारहमासी और अपरिहार्य हो, न कि किसी विशिष्ट अस्थायी परियोजना तक सीमित।
  3. स्वीकृत पद: विभाग या निगम में स्वीकृत पद/रिक्तियां निर्विवाद रूप से उपलब्ध हों।
  4. समानता का सिद्धांत: उसी संस्थान या समान निकायों में समकक्ष कर्मचारियों को बिना नई परीक्षा के पहले ही नियमित किया जा चुका हो।
  • जहां ये चारों तत्व मौजूद हों, वहां नियमितीकरण से इनकार करना विवेकाधिकार नहीं बल्कि स्पष्ट मनमानापन (Arbitrariness) है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: डॉ. भक्ति दीपक चौधरी व अन्य बनाम वसई विरार शहर नगर निगम व अन्य [रिट याचिका संख्या… 2026 (संबद्ध याचिकाओं सहित) – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम, 1949 (MMC Act, 1949) की धाराएं 51, 52, 53, 54 एवं 55 (नगर निगम अधिकारियों/सेवकों के पद, ग्रेड, नियुक्ति की शक्तियां और प्रक्रिया)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक नियोजन में अवसर की समानता) एवं अनुच्छेद 21 (आजीविका का अधिकार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 141 (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि की देश के सभी प्राधिकारियों पर बाध्यकारिता)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (3) (2006, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘अनियमित (Irregular) और अवैध (Illegal) नियुक्तियों में अंतर; खुली विज्ञापन प्रक्रिया से आए कर्मियों को बैक-डोर नहीं माना जा सकता।’
    • सचिन अंबादास दावले बनाम महाराष्ट्र राज्य (बॉम्बे उच्च न्यायालय) — ‘नियमों के तहत गठित चयन समिति से नियुक्त संविदा कर्मियों को उमादेवी के दायरे में बैक-डोर प्रवेशी नहीं कहा जा सकता।’
    • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अरविंद कुमार श्रीवास्तव (2015, सुप्रीम कोर्ट) — ‘समान स्थिति वाले कर्मचारियों को सेवा लाभ देने में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।’
    • जग्गो बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कार्य की प्रकृति बारहमासी और संस्थागत है, तो महज संविदा नामकरण के आधार पर स्थायीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता।’
    • धर्म सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) एवं भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘पदों के सृजन से अनुचित इनकार न्यायिक समीक्षा के अधीन है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे (बॉम्बे उच्च न्यायालय)
  • अंतिम निर्णय: 21 जनवरी 2026 और 28 जनवरी 2026 के विवादित आदेश निरस्त; डॉक्टरों पर नई लिखित परीक्षा थोपने पर रोक; नगर निगम को दो सप्ताह के भीतर सभी याचिकाकर्ताओं को नियमित कर स्थायीकरण आदेश जारी करने का परमादेश। राज्य के सभी नगर निगमों में दीर्घकालिक संविदा प्रथा बंद करने का नीतिगत परामर्श।

Contract Service: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
पीठन्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति आरती साठे
याचिकाकर्ता8-10 वर्षों से संविदा पर कार्यरत MBBS डॉक्टर
विवाद का कारण10 साल काम करने के बाद पक्का करने के लिए लिखित परीक्षा (Written Exam) थोपना
मुख्य आदेशपरीक्षा की शर्त रद्द; 2 सप्ताह के भीतर डॉक्टरों को स्थायी करने का निर्देश। राज्य सरकार को सभी नगर निगमों से लंबी संविदा प्रथा (Ad-hocism) खत्म करने की सलाह।
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