हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी
- “छोटे विवादों पर तलाक और फिर शादी एक दुखद स्थिति”: हाईकोर्ट ने दंपत्ति के इस कदम पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:“विवाह जैसी पवित्र संस्था को इतने हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। मामूली विवादों के कारण आपसी सहमति से तलाक ले लेना और फिर दो बच्चे होने के बाद दोबारा शादी करना सचमुच एक अफसोसजनक स्थिति (Sorry State of Affairs) को दर्शाता है।”
- बालिगों को अपनी पसंद से रहने का संवैधानिक अधिकार: हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से दोनों बालिग हैं और उन्हें अपनी पसंद से शादी करने व रहने का पूरा अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Lata Singh v. State of UP) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी निजी व्यक्ति या सरकारी एजेंसी उनके शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर सकती।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों की गंभीरता, परिवार संस्था के सामाजिक महत्व और वयस्कों द्वारा अपनी पसंद से विवाह करने के संवैधानिक अधिकार पर एक अत्यंत विचारणीय फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने पुनर्विवाहित दंपती द्वारा सुरक्षा और विवाह पंजीकरण में सहायता की मांग को लेकर दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। उच्च न्यायालय ने दो बच्चों के माता-पिता द्वारा पूर्व में आपसी सहमति से तलाक (Mutual Divorce) लेने और फिर पारिवारिक हित में एक-दूसरे से दोबारा शादी रचाने के मामले में दंपती के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन को पुलिस सुरक्षा प्रदान की है। हालांकि, अदालत ने विवाह संस्था के प्रति उपजे इस आकस्मिक दृष्टिकोण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सख्त टिप्पणी की कि विवाह जैसी “पवित्र संस्था को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए” (Pious institution of marriage should not be taken lightly)।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक अवलोकन
1. ‘विवाह की पवित्र संस्था को हल्के में न लें; मामूली विवादों पर तलाक खेदजनक’ न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने दंपती के अलग होने और फिर जुड़ने के घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा: “विवाह जैसी पवित्र संस्था (Pious Institution of Marriage) को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। दो बच्चों के माता-पिता होने के बावजूद केवल कुछ तुच्छ या मामूली विवादों (Trivial Disputes) के चलते आपसी सहमति से तलाक की डिक्री प्राप्त करना और उसके बाद पुनः एक-दूसरे से विवाह करना वास्तव में एक अत्यंत खेदजनक स्थिति (Really a sorry state of affairs) है।”
2. वयस्क नागरिक अपनी पसंद के साथी से विवाह के लिए स्वतंत्र: ‘लता सिंह’ नजीर
- विवाह संस्था के प्रति लापरवाही पर नाराजगी जताने के बावजूद, अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि हैं:
- सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि एक बार जब कोई व्यक्ति बालिग/वयस्क (Major) हो जाता है, तो उसे अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से विवाह करने का पूर्ण विधिक अधिकार है।
- चाहे कोई निजी व्यक्ति हो (जैसे परिवार के सदस्य या रिश्तेदार) अथवा कोई सार्वजनिक प्राधिकारी, किसी को भी ऐसे दो वयस्कों के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में खलल डालने, धमकी देने या बाधा उत्पन्न करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
3. पुलिस और प्रशासन को सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश
- अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को अपने शांतिपूर्ण दांपत्य जीवन के निर्वहन हेतु सुरक्षा पाने का पूरा हक है और पुलिस प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी तीसरा पक्ष उनके निजी जीवन में गैर-कानूनी हस्तक्षेप न करे।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं वैवाहिक घटनाक्रम
- पूर्व विवाह और दो बच्चे: दोनों याचिकाकर्ता पूर्व में पति-पत्नी थे और उनके वैवाहिक जीवन से दो बच्चे हैं।
- आपसी सहमति से तलाक: दांपत्य जीवन में उपजे कुछ घरेलू और छोटे-मोटे मतभेदों के चलते दोनों ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B के तहत पारिवारिक अदालत से आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) की डिक्री प्राप्त कर ली थी।
- पुनर्विवाह का निर्णय और आर्य समाज मंदिर में फेरे (2026):
- अलग होने के बाद, दोनों ने महसूस किया कि उनके बच्चों के भविष्य और पूरे परिवार के समग्र हित में उनका साथ रहना आवश्यक है।
- दोनों पक्षों ने अपने पुराने गिले-शिकवे भुलाकर 2 अप्रैल 2026 को एक आर्य समाज मंदिर में पारंपरिक और विधिक रीति-रिवाजों के अनुसार दोबारा एक-दूसरे से विवाह कर लिया।
- ससुराल/परिवार का विरोध और हाईकोर्ट में याचिका:
- याचिकाकर्ता संख्या 2 (पति) के पिता इस पुनर्विवाह से पूरी तरह असहमत थे और कड़ा विरोध कर रहे थे।
- परिवार की ओर से धमकियों और शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में व्यवधान की आशंका के चलते दंपती ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुरक्षा और विवाह पंजीकरण में किसी प्रकार की रुकावट न आने देने के लिए रिट याचिका दायर की।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: याचिकाकर्ता दंपती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार सहपठित अपनी पसंद के साथी से विवाह करने और शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार)
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-B (आपसी सहमति से विवाह विच्छेद) एवं धारा 15 (तलाक के बाद पुनर्विवाह की विधिक वैधता)
- उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली (विवाह का अनिवार्य पंजीकरण)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि दो बालिग अपनी मर्जी से विवाह करते हैं, तो कोई भी रिश्तेदार या खाप/पंचायत उन्हें परेशान नहीं कर सकती; प्रशासन को ऐसे जोड़ों को सुरक्षा देना अनिवार्य है।’
- शफीन जहां बनाम असोकन के.एम. (हदिया केस, 2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार की अनिवार्य अभिव्यक्ति है।’
- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (निजता का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वैवाहिक और पारिवारिक निर्णय व्यक्ति के निजता क्षेत्र (Zone of Privacy) का अभिन्न हिस्सा हैं।’
- पीठ: न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
- अंतिम आदेश: रिट याचिका निस्तारित; दंपती को शांतिपूर्ण जीवन और विवाह पंजीकरण में पूर्ण प्रशासनिक सुरक्षा का निर्देश जारी।
Mutual Divorce: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा |
| मुख्य पक्षकार | पुनर्विवाह करने वाला दंपत्ति (दो बच्चों के माता-पिता) |
| कानूनी नजीर (Precedent) | लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (स्वतंत्रता से शादी का अधिकार) |
| अदालत का फैसला | दंपत्ति के शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा नहीं डालेगा; पुलिस को सुरक्षा देने का आदेश। |

