हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- सर्वोच्च न्यायालय जैसी ‘पूर्ण शक्तियां’ हाईकोर्ट के पास नहीं: खंडपीठ ने दुख जताते हुए कहा:“हम अभी भी ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं, जहां एक किशोर सर्वाइवर 22 वर्षीय वयस्क आरोपी के साथ सहमति से शारीरिक संबंध में शामिल थी… उनके इस रिश्ते से एक बच्चा भी है। आरोपी को 20 साल के लिए जेल भेजना उसके लगभग पूरे जीवन को खत्म कर देने जैसा है। हमारे पास सुप्रीम कोर्ट जैसी पूर्ण शक्तियां (Plenary Powers under Article 142) नहीं हैं कि हम इस सजा में हस्तक्षेप कर सकें, भले ही साक्ष्यों से यह स्पष्ट रूप से रोमियो-जूलियट जैसा मामला दिखता हो।”
- कानूनी सुधार की आवश्यकता: अदालत ने माना कि कानून निर्माताओं ने POCSO में कठोर सजा इसलिए रखी थी ताकि बच्चों का यौन शोषण रोका जा सके। लेकिन किशोरों में आपसी सहमति से बनने वाले रोमांटिक संबंधों (Consensual Adolescent Romantic Relationships) में 20 साल की अनिवार्य सजा से युवाओं और उनके परिवारों का जीवन तबाह हो रहा है।
गंगटोक: यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के तहत अनिवार्य न्यूनतम दंडादेश (Mandatory Minimum Sentencing) और किशोरावस्था के सहमतिजन्य प्रेम संबंधों (Consensual Adolescent Romantic Relationships) के बीच के कानूनी द्वंद्व पर सिक्किम हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील एवं गंभीर विधिक फैसला सुनाया है।
20 वर्ष की अनिवार्य न्यूनतम सजा को कम करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है
मुख्य न्यायाधीश ए. मुहम्मद मुश्ताक और न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि और दंडादेश के आदेश के खिलाफ दायर आपराधिक अपील की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी। उच्च न्यायालय ने इसे शेक्सपियर के नाटक जैसा एक “क्लासिक रोमियो-जूलियट मामला” (Classic Romeo-Juliet Case) करार दिया, जहां 15 वर्षीय किशोरी ने स्वेच्छा से 22 वर्षीय युवक से प्रेम किया, नेपाली वैवाहिक परंपरा के अनुसार ‘सिंदूर-पोते’ (Sindoor Potey) की रस्म निभाकर शादी की और दोनों की एक संतान (बेटी) भी हुई। इसके बावजूद अदालत ने गहरी विवशता और बेबसी व्यक्त करते हुए युवक की 20 वर्ष के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के नाबालिग की सहमति कानूनन पूरी तरह शून्य (Non-est/Void) होती है, और भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त असाधारण “पूर्ण शक्तियों” (Plenary Powers) के अभाव में उच्च न्यायालय के पास संसद द्वारा तय की गई 20 वर्ष की अनिवार्य न्यूनतम सजा को कम करने का कोई वैधानिक अधिकार (Statutory Discretion) नहीं है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक बेबसी
1. ‘रोमियो-जूलियट जैसा मामला, लेकिन हाईकोर्ट के पास सुप्रीम कोर्ट जैसी शक्तियां नहीं’ मुख्य न्यायाधीश ए. मुहम्मद मुश्ताक और न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान की पीठ ने अपने आदेश में पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा: “हम अभी भी ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं, जैसा कि एक किशोर पीड़िता (P.W.6) से जुड़े कई मामलों में होता है, जो घटना के समय लगभग 22 वर्ष के एक वयस्क अभियुक्त के साथ सहमतिजन्य शारीरिक संबंध में शामिल थी। पीड़िता ने अपनी जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने पारंपरिक ‘सिंदूर पोते’ (वैवाहिक अनुष्ठान) भी किया था। साक्ष्यों से यह भी साबित होता है कि इस संबंध से उनका एक बच्चा भी है। अभियुक्त पर लगाई गई सजा उसे 20 साल के लिए जेल भेजती है, जो लगभग एक जीवनकाल के बराबर है। हमारे पास दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के समान कोई ‘पूर्ण शक्तियां’ (Plenary Powers) नहीं हैं, जबकि साक्ष्यों से स्पष्ट है कि यह पूरी तरह से एक क्लासिक रोमियो-जूलियट का मामला है।”
2. नाबालिग की सहमति विधिक रूप से शून्य: पॉक्सो का सख्त ढांचा
- अदालत ने विधिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि पॉक्सो कानून का विधायी उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है।
- इस कठोर विधायी ढांचे में ‘सहमति’ (Consent) का कोई कानूनी बचाव उपलब्ध नहीं है। भले ही किशोरी ने अपनी मर्जी से घर छोड़ा हो, विवाह किया हो या शारीरिक संबंध बनाए हों, कानून की नजर में 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति ‘बच्चा’ (Child) ही रहेगा और सहमति का कोई विधिक अस्तित्व नहीं होगा।
3. उम्र निर्धारण (Age Determination) पर बचाव पक्ष का तर्क खारिज
- अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि पीड़िता की उम्र का निर्धारण गलत तरीके से किया गया था।
- खंडपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन कर पाया कि अभियोजन पक्ष ने नगर निगम के सांविधिक जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate), स्कूल प्रवेश रजिस्टर और अस्पताल के आधिकारिक दस्तावेजों के माध्यम से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध किया है कि घटना के समय पीड़िता की आयु मात्र 15 वर्ष थी।
- अतः वह पॉक्सो अधिनियम की धारा 2(d) के तहत वैधानिक रूप से ‘बच्ची’ की परिभाषा के दायरे में आती है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं वैवाहिक संबंध
- अक्टूबर 2021 में प्रेम संबंध:
- घटना की शुरुआत अक्टूबर 2021 में हुई, जब पीड़िता कक्षा 8 की छात्रा थी और अपीलकर्ता की आयु लगभग 22 वर्ष थी। दोनों के बीच प्रेम संबंध विकसित हुए।
- गंगटोक भागना और ‘सिंदूर पोते’ की रस्म (2022):
- वर्ष 2022 में किशोरी अपने घर से अपीलकर्ता के साथ गंगटोक चली गई।
- दोनों ने पति-पत्नी के रूप में रहना शुरू किया। पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट में दिए अपने बयानों में खुलकर स्वीकार किया कि यह संबंध पूरी तरह उसकी सहमति से था और युवक ने पारंपरिक नेपाली रीति-रिवाज के अनुसार ‘सिंदूर पोते’ (मांग में सिंदूर और गले में पोते की माला) पहनाकर उससे विवाह किया था।
- बच्ची का जन्म और डीएनए रिपोर्ट:
- इस वैवाहिक सहवास के परिणामस्वरूप पीड़िता ने एक बच्ची को जन्म दिया।
- जांच के दौरान कराए गए वैज्ञानिक डीएनए प्रोफाइलिंग (DNA Profiling) परीक्षण ने भी यह पुष्टि की कि अपीलकर्ता ही उस बच्ची का जैविक पिता (Biological Father) है।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला:
- इन तमाम भावनात्मक और पारिवारिक पहलुओं के बावजूद, विशेष पॉक्सो अदालत ने कानून की कठोर धाराओं—धारा 5(j)(ii) और 5(l) सहपठित धारा 6 (Aggravated Penetrative Sexual Assault)—के तहत युवक को दोषी ठहराया और 2019 के पॉक्सो संशोधन के तहत निर्धारित न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
संवैधानिक द्वंद्व: अनुच्छेद 142 (सुप्रीम कोर्ट) बनाम अनुच्छेद 226/अपीलीय क्षेत्राधिकार (हाईकोर्ट)
यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में किशोर न्यायशास्त्र की एक बड़ी विसंगति को उजागर करता है:
- सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण: सुप्रीम कोर्ट ने के. धीरूभाई और अन्य समान मामलों में भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए कई सहमतिजन्य किशोर प्रेम मामलों में ‘पूर्ण न्याय’ (Complete Justice) करने के लिए या तो सजा कम की है या अभियोजन को रद्द किया है, ताकि युवा परिवार और नवजात बच्चे का भविष्य नष्ट न हो।
- हाईकोर्ट की कानूनी सीमाएं: सिक्किम उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि उच्च न्यायालयों को केवल कानून की सीमाओं (Statute) के भीतर रहकर निर्णय देना होता है। जहां संसद ने किसी अपराध के लिए ‘न्यूनतम अनिवार्य सजा’ (Mandatory Minimum Punishment – 20 वर्ष) तय कर दी हो, वहां उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्तियों के आधार पर कानून को दरकिनार कर सजा 20 वर्ष से कम नहीं कर सकता।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अपीलकर्ता बनाम सिक्किम राज्य [आपराधिक अपील – सिक्किम उच्च न्यायालय, गंगटोक]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता की ओर से: अधिवक्ता गीता बिस्टा
- राज्य (अभियोजन) की ओर से: पेमा भूटिया, सहायक लोक अभियोजक (APP)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 2(d) (‘बच्चा’ – 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति)
- पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(j)(ii) एवं धारा 5(l) सहपठित धारा 6 (गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला – न्यूनतम 20 वर्ष का कठोर कारावास, जो आजीवन कारावास तक हो सकता है)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 (उम्र निर्धारण हेतु सार्वजनिक अभिलेखों की ग्राह्यता) एवं धारा 112 (डीएनए परीक्षण की महत्ता)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 (सर्वोच्च न्यायालय की अंतर्निहित पूर्ण न्याय शक्ति) बनाम अनुच्छेद 226/227 (उच्च न्यायालय की शक्तियां)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व विधिक विमर्श:
- भारत का विधि आयोग (283वीं रिपोर्ट) — ‘सहमतिजन्य किशोरावस्था संबंधों (Romeo-Juliet scenarios) में जहां पक्षों के बीच वास्तविक प्रेम संबंध या वैवाहिक जीवन स्थापित हो चुका हो, वहां पॉक्सो की अनिवार्य 20 वर्ष की न्यूनतम सजा अक्सर अन्यायपूर्ण परिणाम देती है और इस पर विधिक विवेक (Judicial Discretion) की आवश्यकता है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश ए. मुहम्मद मुश्ताक और न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान (सिक्किम उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: कानूनी सीमाओं और नाबालिग की सहमति के विधिक अभाव के चलते 26 वर्षीय अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और 20 वर्ष के कठोर कारावास का दंडादेश बरकरार; हालांकि अदालत ने इसे मानवीय दृष्टिकोण से विवशतापूर्ण मामला माना।
POCSO Act:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सिक्किम उच्च न्यायालय (Sikkim High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश ए. मोहम्मद मुश्ताक एवं न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान |
| अपीलकर्ता (दोषी) | घटना के समय 22 वर्षीय पुरुष (वर्तमान उम्र 26 वर्ष) |
| पीड़िता/सर्वाइवर | घटना के समय 15 वर्षीय किशोरी (कक्षा 8 की छात्रा) |
| मामला | आपसी सहमति से प्रेम संबंध, शादी (‘सिंदूर पोते’ रस्म) और एक बच्ची का जन्म। |
| सजा | POCSO Act की धारा 6 के तहत 20 साल का सश्रम कारावास (न्यूनतम अनिवार्य सजा)। |

