हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी आधार
- “साले” शब्द पर कोर्ट की टिप्पणी: खंडपीठ ने पीड़ित (P.W.-3) के बयानों का विश्लेषण करते हुए कहा:“घायल सुंदर लाल की गवाही से यह साबित नहीं होता कि SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) का अपराध हुआ है। पीड़ित के बयान में न तो यह उल्लेख है कि आरोपी को उसकी जाति का ज्ञान था, और न ही आरोपी द्वारा बोला गया कथित शब्द ‘साले’ जाति से संबंधित गाली के दायरे में आता है।”
- जांच की कमियों (Investigative Lapses) का असर: आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि अपराध में इस्तेमाल हथियार बरामद नहीं हुआ और खून के नमूनों को FSL जांच के लिए नहीं भेजा गया। इस पर हाईकोर्ट ने दोहराया कि केवल जांच अधिकारी (Investigating Officer) की ढिलाई या खामियों के आधार पर अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, यदि अन्य मौखिक व चिकित्सकीय साक्ष्य (Ocular & Medical Evidence) अपराध साबित करते हों।
- IPC 307 और 452 के तहत सजा बरकरार: हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी ने घर में घुसकर जानलेवा हमला (IPC 307 & 452) किया था, जो साक्ष्यों से पूरी तरह साबित होता है। इसलिए इन धाराओं के तहत उसकी दोषसिद्धि सही है।
- सजा का संतुलित दृष्टिकोण: कोर्ट ने कहा कि सजा का उद्देश्य समाज में कड़ा संदेश देना होना चाहिए, लेकिन यह न तो बहुत सख्त और न ही बहुत उदार होनी चाहिए। SC/ST एक्ट का अपराध न बनने के कारण आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया गया।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के कठोर दंडात्मक प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि के लिए आवश्यक तत्वों पर एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय दिया है।
न्यायमूर्ति मनोज बजाज और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की खंडपीठ ने विशेष अदालत द्वारा अपीलकर्ता को SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत सुनाई गई आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा को पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया। हालांकि, घर में अनाधिकृत प्रवेश कर जानलेवा गोली चलाने के चश्मदीद साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और धारा 452 (घर में अनधिकार प्रवेश) के तहत उसकी दोषसिद्धि को यथावत बरकरार रखा। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि किसी व्यक्ति को बोलचाल में “साले” कहकर संबोधित करना जाति आधारित गाली (Caste-related Abuse) की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा कि अभियुक्त को घायल पीड़ित की जाति का पूर्व ज्ञान था या उसने जातिगत आधार पर उसे अपमानित या प्रताड़ित करने के आशय से यह कृत्य किया था।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘शब्द “साले” जातिसूचक गाली नहीं, धारा 3(2)(v) का अपराध साबित नहीं’ न्यायमूर्ति मनोज बजाज और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की पीठ ने घायल गवाह के बयानों का गहन विश्लेषण करते हुए अपने आदेश में कहा: “अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(v) के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि का विश्लेषण करते हुए हम पाते हैं कि घायल सुंदर लाल (P.W.-3) का बयान उक्त अपराध के गठन को निर्णायक रूप से साबित नहीं करता है। घायल का बयान न तो यह उल्लेख करता है कि अभियुक्त को उसकी जाति की जानकारी थी, और न ही अभियुक्त द्वारा कथित रूप से इस्तेमाल किया गया अपशब्द ‘साले’ (Saale) जाति से संबंधित गाली के दायरे में आएगा।”
2. जांच में खामियां (Lapses in Investigation) अभियोजन के पुख्ता केस को खारिज करने का आधार नहीं
- बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि न तो अपराध में प्रयुक्त असलहा (हथियार) बरामद किया गया और न ही घटनास्थल से खून के धब्बे एफएसएल (FSL) जांच के लिए भेजे गए।
- खंडपीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए दोहराया:“यदि जांच उचित तरीके से संचालित नहीं की गई है, तो केवल वही आधार अभियोजन पक्ष के मामले को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा, यदि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्य अभियुक्त के खिलाफ आरोपों को निर्णायक रूप से साबित करते हैं।”
- अदालत ने माना कि जांच अधिकारी (IO) की यह चूक इतनी गंभीर नहीं है कि चश्मदीद गवाहों और घायल के विश्वसनीय बयानों को नकार दिया जाए। अभियोजन ने IPC की धारा 452 और 307 के तहत अपराध साबित करने का भार सफलतापूर्वक निभाया है।
3. दंडादेश का संतुलन (Sentencing Policy) अदालत ने सजा के उद्देश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा कि विचारण न्यायालय द्वारा सजा सुनाने का उद्देश्य समाज में एक कड़ा संदेश देना होता है जो अपराधों को रोकने के लिए निवारक (Deterrent) का काम करे। हालांकि, इसके लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, और अदालत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सजा न तो अत्यधिक नरम हो और न ही अत्यधिक कठोर या असंगत।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं घटनाक्रम
- गन्ने के खेत में मजदूरी से विवाद:
- शिकायतकर्ता मुन्ना और उसके भाई सुंदर लाल के अनुसार, उनका चाचा (अपीलकर्ता) गन्ने की खेती करता था और उसने सुंदर लाल को अपने खेत में काम पर लगाया हुआ था।
- घटना के दिन सुंदर लाल अपीलकर्ता को बताए बिना दोपहर का भोजन करने अपने घर चला गया।
- इस बात से नाराज होकर अपीलकर्ता अवैध हथियार लेकर शिकायतकर्ता के घर में घुस गया।
- अपशब्द और गोलीबारी:
- आरोप था कि अपीलकर्ता ने सुंदर लाल को कथित तौर पर “साले” कहकर अपशब्द कहे और उस पर सीधे जान से मारने की नीयत से गोली चला दी।
- गोली लगने से सुंदर लाल के दाहिने हाथ और दाहिनी छाती पर गंभीर चोटें आईं।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला:
- विशेष न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई के बाद अभियुक्त को IPC की धारा 452, 307 और SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत दोषी ठहराया था और उसे आजीवन कारावास तथा जुर्माने की कठोर सजा सुनाई थी।
- इस दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के दंडादेश के खिलाफ अभियुक्त ने उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील दाखिल की।
दोनों पक्षों की मुख्य विधिक दलीलें
अपीलकर्ता (अभियुक्त) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार द्विवेदी ने तर्क दिया कि अभियोजन की कहानी में गंभीर विरोधाभास हैं; घायल को पहले स्थानीय अस्पताल ले जाने या अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज रेफर किए जाने का कोई पुख्ता दस्तावेजी रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया।
- यह भी तर्क दिया गया कि अभियोजन के अनुसार केवल एक फायर किया गया था, इसलिए एक ही फायर से हाथ और छाती दोनों पर दो अलग-अलग चोटें आना मेडिकल दृष्टि से संदेहास्पद है।
- सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह था कि दोनों पक्षों के बीच विवाद मजदूरी और बिना बताए खाना खाने जाने को लेकर था; इसमें कोई जातिगत विद्वेष या जाति के आधार पर अपराध करने का तत्व मौजूद नहीं था।
राज्य (अभियोजन) की ओर से:
- शासकीय अधिवक्ता दुर्गा कुमारी ने दलील दी कि शिकायतकर्ता मुन्ना ने घटना के तुरंत बाद स्पष्ट एफआईआर दर्ज कराई थी और घायल सुंदर लाल के प्रत्यक्षदर्शी बयान से घर में घुसकर जानलेवा हमला करना पूरी तरह साबित हुआ है। हथियार बरामद न होना पुलिस की लापरवाही हो सकती है, लेकिन इससे घायल का साक्ष्य कमजोर नहीं पड़ता।
SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(v) की विधिक स्थिति
धारा 3(2)(v) के तहत आजीवन कारावास की सजा लागू करने के लिए कानूनन दो अनिवार्य शर्तें पूरी होनी चाहिए:
- आरोपी द्वारा IPC के तहत ऐसा कोई अपराध किया गया हो जो 10 वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय हो (जैसे धारा 307)।
- वह अपराध केवल इस आधार पर किया गया हो कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है।
उच्च न्यायालय ने पाया कि वर्तमान मामले में विवाद का कारण खेत में काम छोड़कर भोजन करने जाना था, न कि पीड़ित की जाति। चूंकि “साले” शब्द किसी जाति की पहचान या जातिगत हीनता को इंगित नहीं करता, इसलिए SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) का बुनियादी तत्व अनुपस्थित था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अपीलकर्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [आपराधिक अपील – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार द्विवेदी
- राज्य (अभियोजन) की ओर से: शासकीय अधिवक्ता दुर्गा कुमारी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(v) (SC/ST सदस्य के विरुद्ध इस आधार पर जघन्य अपराध करना)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास)
- भारतीय दंड संहिता की धारा 452 (हमले या क्षति पहुंचाने की तैयारी के साथ गृह-अतिचार / House-trespass)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 134 (साक्ष्यों की गुणवत्ता बनाम मात्रा)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- दिनेश उर्फ बुद्धू बनाम राजस्थान राज्य (2006, सुप्रीम कोर्ट) — ‘SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि के लिए केवल यह साबित होना पर्याप्त नहीं है कि पीड़ित SC/ST समुदाय से था; अभियोजन को यह सिद्ध करना होगा कि अपराध केवल और केवल उसकी जाति के कारण ही किया गया था।’
- हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सभी प्रकार के सामान्य अपमान या व्यक्तिगत झगड़े SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाते, जब तक कि अपमान का कृत्य जातिगत आधार पर और सार्वजनिक स्थान पर जनता के सामने न किया गया हो।’
- कर्नाटक राज्य बनाम के. गोपीनाथ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘जांच अधिकारी द्वारा की गई प्रक्रियात्मक चूक या हथियार की गैर-बरामदगी घायल चश्मदीद गवाह के विश्वसनीय साक्ष्य को अमान्य नहीं कर सकती।’
- पीठ: न्यायमूर्ति मनोज बजाज और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: आपराधिक अपील आंशिक रूप से स्वीकार; SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा निरस्त (दोषमुक्त); IPC की धारा 307 एवं 452 के तहत दोषसिद्धि बरकरार और तदनुसार सजा संशोधित।
Foul Word: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति मनोज बजाज एवं न्यायमूर्ति हरवीर सिंह |
| मूल अपराध | IPC की धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 452 और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) |
| मुख्य कानूनी निष्कर्ष | 1. “साले” शब्द का इस्तेमाल जातिसूचक टिप्पणी/अपमान नहीं है। 2. SC/ST एक्ट के तहत मिली आजीवन कारावास की सजा रद्द। 3. IPC की धाराओं (307 और 452) के तहत दोषसिद्धि बरकरार। |

