अदालत की मुख्य तीखी टिप्पणियां और चिंताएं
- अस्पतालों के इन-हाउस फार्मेसी का एकाधिकार:अदालत ने कहा कि कॉर्पोरेट अस्पताल में भर्ती मरीजों को केवल उनकी इन-हाउस दुकानों से ही महंगे खुदरा मूल्य (MRP) पर दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। यदि कोई मरीज बाहर की दुकान से सस्ती दवा लाता है, तो अस्पताल इलाज करने से मना कर देते हैं या जिम्मेदारी लेने से पीछे हट जाते हैं।
- कैंसर की दवा का उदाहरण—₹2,700 की दवा ₹27,000 में:पिछली सुनवाई का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा कि एक कैंसर की दवा का खुदरा विक्रेता मूल्य (PTR) ₹2,700 है, लेकिन उसकी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) ₹27,000 तय की गई है। अदालत ने बिना किसी सीमा के इस तरह के मार्जिन को “दहाड़े डकैती” (Broad Daylight Dacoity) और “तबाही” करार दिया।
- करदाताओं के पैसे का नुकसान:पीठ ने रेखांकित किया कि जब कोई मरीज सरकार की कल्याणकारी स्वास्थ्य योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत आदि) के तहत इलाज कराता है, तो कॉर्पोरेट अस्पताल सरकार (सरकारी खजाने) से इन कृत्रिम रूप से बढ़ाए गए MRP पर पूरा पैसा वसूलते हैं। यानी अंततः इसका पूरा बोझ टैक्सपेयर्स की जेब पर पड़ता है।
- 16% मार्जिन कैपिंग का सुझाव:अदालत ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि दवाओं को ‘आवश्यक’ (Essential) और ‘गैर-आवश्यक’ (Non-essential) श्रेणियों में विभाजित क्यों रखा गया है? आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत सभी फार्मास्युटिकल उत्पादों पर 16% का एक समान मुनाफा मार्जिन कैप (16% Margin Cap) क्यों नहीं लागू किया जा सकता?
- ब्रांडेड बनाम जेनेरिक और फर्जी दवाओं का डर:कोर्ट ने कहा कि इस तरह की अत्यधिक कीमतों के कारण आम जनता में विश्वास का संकट पैदा हो गया है। अगर कोई ईमानदार दुकानदार ₹27,000 की MRP वाली दवा ₹3,000 में बेचने का प्रस्ताव रखता है, तो गरीब और मजबूर मरीज डर के मारे उसे नहीं खरीदता कि कहीं वह दवा नकली या घटिया ना हो।
नई दिल्ली: देश में स्वास्थ्य सेवाओं के अनियंत्रित व्यावसायीकरण (Commercialization of Healthcare), कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा मरीजों के शोषण, इन-हाउस फार्मेसी की बाध्यता और आवश्यक जीवन रक्षक दवाओं पर वसूले जा रहे बेतहाशा मुनाफे (Profiteering) पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा और तीखा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने आवश्यक दवाओं के मूल्य नियंत्रण (Price Control) और जेनेरिक दवाओं के अनिवार्य नुस्खे से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया कि जब आवश्यक दवाओं पर 16% का ट्रेड मार्जिन कैप लागू है, तो सभी गैर-अनुसूचित (Non-Scheduled) दवाओं और चिकित्सा उपकरणों पर एक समान 16 प्रतिशत का मार्जिन कैप क्यों नहीं लगाया जा सकता। शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि निजी कॉरपोरेट अस्पताल अब सेवा प्रदाता (Service Providers) नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरी तरह मुनाफे से संचालित ‘उद्योग’ (Industries) बन चुके हैं, जिसका अंतिम वित्तीय खामियाजा देश के गरीब मरीजों और आम करदाताओं (Taxpayers) को भुगतना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं तीखी टिप्पणियां
1. ‘कॉरपोरेट अस्पताल उद्योग हैं, सेवा नहीं; आम जनता क्यों भुगते?’ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के रवैये पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा: “कॉरपोरेट अस्पताल उद्योग (Industries) बन चुके हैं। यह अब बिल्कुल भी सेवा (Service) नहीं रह गई है। आम आदमी और करदाता इस सब का खामियाजा क्यों भुगते?”
2. ₹2,700 बनाम ₹27,000: ‘दिनदहाड़े डकैती और करदाताओं के पैसे की लूट’
- पीठ ने पिछली सुनवाई का संदर्भ दिया, जहां कैंसर की एक महत्वपूर्ण दवा का खुदरा मूल्य (Price to Retailer – PTR) मात्र ₹2,700 था, परंतु उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) ₹27,000 अंकित किया गया था। पिछली सुनवाई में अदालत ने इसे “पूर्ण तबाही और नरसंहार” (Absolute Rampage and Carnage) तथा “दिनदहाड़े डकैती” (Broad Daylight Dacoity) करार दिया था।
- आज की सुनवाई में अदालत ने इस लूट के तंत्र को उजागर करते हुए कहा:“कॉरपोरेट अस्पतालों में… एमआरपी ₹27,000 है और पीटीआर लगभग ₹3,000 है। जरा इस अंतर को देखिए! कॉरपोरेट अस्पताल मरीज से कहते हैं कि आपको दवा हमारे ही केमिस्ट (इन-हाउस फार्मेसी) से खरीदनी होगी; यदि आप इसे बाहर से लाते हैं, तो हम मरीज के इलाज की कोई गारंटी नहीं लेंगे। और यदि वही मरीज किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना (जैसे आयुष्मान भारत या सीजीएचएस) के तहत इलाज करा रहा है, तो इस ₹27,000 की प्रतिपूर्ति (Reimbursement) कौन करता है? देश का ईमानदार करदाता इसका भुगतान करता है। इसके लिए एक समान मानदंड (Uniform Criteria) क्यों नहीं होना चाहिए?”
3. ‘सस्ती दवा को नकली समझने का संकट’ (Crisis of Consumer Trust)
- अदालत ने भारी एमआरपी और वास्तविक लागत के अंतर से बाजार में पैदा हुए अविश्वास के संकट को रेखांकित किया:“मान लीजिए कोई दवा है, मरीज बाहर के केमिस्ट के पास जाता है; वह ईमानदार केमिस्ट कहता है कि इस पर एमआरपी भले ही ₹27,000 है, लेकिन मैं आपको यह ₹3,000 में दे दूंगा। क्या वह लाचार मरीज यह सोचेगा कि दवा असली है? वह सोचेगा कि यह निश्चित रूप से कोई नकली या घटिया (Spurious) दवा होगी। आखिर यह भारी-भरकम मुनाफा किसकी जेब में जा रहा है?”
4. अनुसूचित बनाम गैर-अनुसूचित का भेद क्यों? 16% कैप की मांग
- अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि वह दवाओं को ‘आवश्यक/अनुसूचित’ (Scheduled) और ‘गैर-अनुसूचित’ (Non-Scheduled) में क्यों बांटती है:“यह भेद क्यों रखा गया है? आवश्यक और गैर-आवश्यक? आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत प्रत्येक दवा की एमआरपी पर 16 प्रतिशत का ट्रेड मार्जिन कैप क्यों नहीं तय किया जाता?”

केंद्र सरकार का पक्ष: ‘हितों का संतुलन बनाने की आवश्यकता’
- भारत सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अदालत द्वारा उठाई गई चिंताओं की गंभीरता को स्वीकार किया।
- सॉलिसिटर जनरल ने प्रस्तुत किया:“हमें इसका कोई समाधान निकालना ही होगा। एक ऐसा रास्ता जो सभी पक्षों के विधिक व आर्थिक हितों में संतुलन (Balances Equities) बनाए… मुझे संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों के साथ बैठने दीजिए, जिसके बाद मैं अदालत में औपचारिक जवाब दाखिल करूंगा।”
- एसजी मेहता ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार के भारी मूल्य अंतर (Price Spreads) से अक्सर दवा निर्माता कंपनियों (Pharma Manufacturers) को उतना लाभ नहीं होता, बल्कि अधिकांश मार्जिन निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा मुनाफे के रूप में समाहित (Absorb) कर लिया जाता है।
जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए मुख्य विधिक आधार
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन द्वारा दायर जनहित याचिका में देश की स्वास्थ्य प्रणाली में व्यापक विधिक और नीतिगत सुधारों की मांग की गई है:
- जेनेरिक दवाओं का अनिवार्य प्रिस्क्रिप्शन: चिकित्सकों द्वारा ब्रांडेड दवाओं के बजाय केवल जेनेरिक साल्ट (Generic Names) लिखने की वैधानिक अनिवार्यता।
- गैर-अनुसूचित दवाओं पर प्रारंभिक मूल्य नियंत्रण: ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत सभी प्रकार की दवाओं के लॉन्च के समय ही उनके ट्रेड मार्जिन और अधिकतम मूल्य पर कड़े नियम तय करना।
- चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य सीमा (MRP Caps): स्टेंट, आर्थोपेडिक इम्प्लांट्स, सीरिंज और अन्य उपभोग्य सामग्रियों पर अस्पतालों द्वारा वसूले जाने वाले अनुचित लाभ पर प्रतिबंध।
- इन-हाउस फार्मेसी की एकाधिकारवादी प्रथा (Tying Arrangements): अस्पतालों द्वारा इन-हाउस केमिस्ट से ही दवाएं खरीदने की बाध्यता को प्रतिस्पर्धा कानून (Competition Act, 2002) और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) घोषित करना।
विधिक एवं नीतिगत ढांचा
- ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 (DPCO, 2013):
- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल अनुसूचित फॉर्मूलेशन पर सीलिंग प्राइस तय करता है, जहां खुदरा विक्रेता का मार्जिन 16% निर्धारित है। परंतु गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में निर्माताओं को सालाना 10% तक दाम बढ़ाने की छूट है, जिससे अस्पताल भारी मार्जिन तय करते हैं।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955):
- अधिनियम की धारा 3 केंद्र सरकार को आवश्यक वस्तुओं (जिसमें दवाएं शामिल हैं) के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण और उचित मूल्य पर बिक्री को नियंत्रित करने की व्यापक शक्तियां प्रदान करती है।
- संविधान का अनुच्छेद 21 एवं 47:
- स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। जीवन रक्षक दवाओं को जानबूझकर महंगा बनाकर जनता को इलाज से वंचित करना और सरकारी खजाने से अनुचित प्रतिपूर्ति लेना जन स्वास्थ्य (अनुच्छेद 47) के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: किशन चंद जैन बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: उपस्थित अधिवक्ता
- केंद्र सरकार (प्रतिवादी) की ओर से: सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया (SG) तुषार मेहता
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 (DPCO 2013) एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (अनुचित व्यापार प्रथाएं एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार पद्धतियां)
- प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 3 एवं 4 (बाजार में अपनी मजबूत स्थिति का दुरुपयोग और टाई-इन व्यवस्थाएं)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार) सहपठित अनुच्छेद 47 (लोक स्वास्थ्य में सुधार का राज्य का दायित्व)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- पश्चिम बंगाल राज्य बनाम पाशुपति डे (1996, सुप्रीम कोर्ट) — ‘नागरिकों को समय पर और वहन योग्य चिकित्सा उपचार उपलब्ध कराना कल्याणकारी राज्य का प्राथमिक संवैधानिक दायित्व है।’
- यूनियन ऑफ इंडिया बनाम साइप्रस लेबोरेटरीज (सुप्रीम कोर्ट) — ‘दवाओं का मूल्य नियंत्रण जनहित में एक आवश्यक आर्थिक नियमन है ताकि जीवन रक्षक दवाएं आम आदमी की पहुंच में रहें।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्देश: केंद्र सरकार और सॉलिसिटर जनरल को स्वास्थ्य मंत्रालय, फार्मास्यूटिकल्स विभाग और एनपीपीए के साथ अंतर-विभागीय परामर्श करने हेतु समय प्रदान किया गया; मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को नियत।
Hospital Like Industry: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| याचिकाकर्ता | किशन चंद जैन (जनहित याचिका) |
| मुख्य मुद्दा | दवाओं और मेडिकल उपकरणों के MRP पर भारी मार्जिन, कॉर्पोरेट अस्पतालों का एकाधिकार और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में करदाताओं के पैसे की लूट। |
| अगली सुनवाई | 12 अक्टूबर 2026 |

