मुख्य संकेतक (Key Indicators)
- मौके पर पकड़े जाने पर भी ‘अज्ञात’ के खिलाफ FIR:याचिकाकर्ता (जो स्वयं अदालत में पेश हुईं) ने बताया कि एक हादसे के बाद उन्होंने आरोपी बाइक सवार को मौके पर ही पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था। इसके बावजूद, पुलिस ने एफआईआर में आरोपी का नाम खाली छोड़ दिया और मामला “अज्ञात व्यक्ति” के खिलाफ दर्ज किया।
- अदालत की तीखी टिप्पणियां:“आपके पास हर मामले में कोई न कोई एजेंडा होता है। अगर आप इस तरह काम करेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे? बेहतर होगा कि हम राज्य के सभी मामलों में सीबीआई को जांच सौंप दें। हम यूपी पुलिस को भंग कर दें तो बेहतर रहेगा। इस बकवास को किसी न किसी मोड़ पर रोकना ही होगा।”“लाइन पर चलना (बात मानना) एक बात है, लेकिन इस तरह घुटने टेक देना और इस प्रकार का ‘कवर-अप’ (मामला दबाना) काम? जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है।”
- जांच में फर्जीवाड़ा और हेरफेर:हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने चार्जशीट में बाइक सवार (तुषार) का नाम तो जोड़ा, लेकिन बाद में उसे क्लीन चिट दे दी। इसके अलावा, जब्त की गई जिस मोटरसाइकिल पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी, उसे जांच के दौरान रहस्यमय तरीके से एक पंजीकरण संख्या आवंटित कर दी गई।
- अदालती प्रक्रिया पर तंज:पीठ ने पुलिस के वकील से पूछा:“आप आरोपी को मौके पर पकड़ते हैं लेकिन एफआईआर में उसका नाम नहीं लिखना चाहते। शायद अगर समीकरण बन जाए तो आप नाम बदल सकते हैं, या अपनी पसंद का कोई नाम शामिल कर सकते हैं… क्या आपके यहां काम इसी तरह चलता है?”
नई दिल्ली: आपराधिक मामलों में निष्पक्ष जांच (Fair Investigation), प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में जानबूझकर तथ्यों की हेराफेरी, ‘कवर-अप जॉब’ और पुलिस तंत्र की संस्थागत विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस (UP Police) को कड़ी और अभूतपूर्व फटकार लगाई है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने उस मामले का संज्ञान लेते हुए यह तल्ख टिप्पणी की, जहां शिकायतकर्ता ने मौके पर ही मोटरसाइकिल सवार संदिग्ध को रंगे हाथ पकड़कर पुलिस को सौंपा था, लेकिन पुलिस ने जानबूझकर एफआईआर में आरोपी का कॉलम खाली छोड़ते हुए मामला “अज्ञात मोटरसाइकिल सवार” के खिलाफ दर्ज कर लिया और बाद में उसे क्लीनचिट दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने एक आपराधिक जांच में सामने आई गंभीर अनियमितताओं पर तीखी मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि यूपी पुलिस का यही रवैया रहा, तो बेहतर होगा कि पुलिस बल को ही भंग कर दिया जाए और राज्य की सभी जांचें केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी जाएं।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख मौखिक अवलोकन एवं तीखी न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘हर चीज में आपका एक एजेंडा होता है; हम यूपी पुलिस को भंग ही कर देते हैं’ खंडपीठ ने यूपी पुलिस के आचरण और जांच के तौर-तरीकों पर सीधा प्रहार करते हुए कहा:
“आपके पास हर मामले में एक एजेंडा होता है। यदि आप मामलों को इसी तरह आगे बढ़ाएंगे, तो आम जनता आप पर भरोसा कैसे करेगी? इससे तो बेहतर है कि हम राज्य की सभी जांचों में सीबीआई (CBI) को हस्तक्षेप करने का निर्देश दे दें। हम यूपी पुलिस को भंग ही कर देते हैं। इस बकवास (Nonsense) को किसी न किसी बिंदु पर तो बंद होना ही होगा।“
2. ‘लाइन पर चलना एक बात है, लेकिन इस तरह का लीपापोती (Cover-up Job) अस्वीकार्य’ जांच को गलत दिशा में मोड़ने और तथ्यों को दबाने के पुलिसिया रवैये पर पीठ ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा:“सरकार या व्यवस्था के अनुकूल चलना (Toeing the line) एक बात है, लेकिन जांच में इस कदर झुक जाना और इस तरह का लीपापोती का काम (Cover up job)? इस पर जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है।”
3. ‘क्या आपके पास आरोपियों की कोई तैयार लिस्ट रहती है जिसे आप मनमर्जी से बदलते हैं?’ अदालत ने राज्य पुलिस के वकील से तीखे सवाल पूछे:“एफआईआर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ क्यों दर्ज की गई? जब व्यक्ति को मौके पर ही रंगे हाथ पकड़ लिया गया था, तो आपने ‘अज्ञात’ क्यों लिखा? जनता पुलिस पर कैसे विश्वास करेगी? आप आरोपी को मौके पर पकड़ते हैं लेकिन एफआईआर में उसका नाम दर्ज नहीं करते। शायद इसलिए ताकि यदि कोई समीकरण बैठ जाए तो आप नाम बदल सकें, या अपनी पसंद का कोई नाम शामिल कर सकें! आपने अलग-अलग एफआईआर में आरोपियों की कोई सूची बनाकर रखी होगी कि जिस पर कम एफआईआर दर्ज हैं, उसका नाम डाल दिया जाए। क्या वहां इसी तरह काम होता है?“
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: क्या थी पूरी घटना?
- शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं पैरवी: यह मामला व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी पैरवी कर रही एक महिला शिकायतकर्ता की याचिका से जुड़ा है।
- घटनाक्रम और ‘अज्ञात’ एफआईआर:
- एक मोटरसाइकिल से जुड़ी घटना के बाद शिकायतकर्ता ने मौके पर ही भाग रहे सवार को पकड़ा और उसे सीधे स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया।
- इसके बावजूद, स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर एफआईआर में आरोपी का नाम नहीं लिखा और कॉलम खाली छोड़ते हुए मामला ‘अज्ञात व्यक्ति’ के नाम दर्ज किया।
- हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हेरफेर:
- जब मामला उच्च न्यायालय पहुंचा और हाईकोर्ट ने पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी, तो पुलिस ने आनन-फानन में आरोप पत्र (Chargesheet) में उस सवार का नाम जोड़ा।
- परंतु इसके बाद पुलिस ने आगे बढ़ते हुए उसी आरोपी को पूरी तरह क्लीनचिट (Clean Chit) दे दी।
- बिना नंबर प्लेट की बाइक को रहस्यमयी नंबर:
- शिकायतकर्ता ने अदालत को दिखाया कि जब मोटरसाइकिल जब्त की गई थी, तो उस पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी। परंतु जांच के दौरान पुलिस ने जादुई तरीके से उस बाइक को एक नया पंजीकरण नंबर आवंटित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा आदेश: जांच अधिकारी तलब
खंडपीठ ने पाया कि शीर्ष अदालत के पूर्व निर्देशों के जवाब में यूपी पुलिस द्वारा दाखिल किया गया जवाबी हलफनामा पूरी तरह “असंतोषजनक और प्रभावहीन” (Completely uninspiring) था। अदालत ने विस्तृत आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया:
- संबंधित पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत रूप से हाजिर हों: संबंधित जांच अधिकारी/पुलिस अधिकारी अगली सुनवाई पर अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहें।
- संतुष्टिजनक हलफनामा पेश करें: अधिकारी एक बेहतर और तथ्यपरक हलफनामा पेश कर यह स्पष्ट करें कि:
- जब यह स्वीकृत तथ्य (Admitted Fact) है कि मोटरसाइकिल सवार को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो एफआईआर अज्ञात सवार के खिलाफ क्यों लिखी गई?
- पुलिस के अपने हलफनामे के पैरा 6 में सवार का नाम ‘तुषार’ उजागर किया गया है; ऐसे में एफआईआर में उस नाम को प्रारंभ में खाली क्यों छोड़ा गया और बाद में उसे क्यों जोड़ा व हटाया गया?
विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत
- निष्पक्ष जांच का मौलिक अधिकार (Right to Fair Investigation):
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष जांच और त्वरित न्याय केवल आरोपी का ही नहीं, बल्कि अपराध पीड़ित/शिकायतकर्ता का भी मौलिक अधिकार है।
- जानबूझकर एफआईआर में आरोपी का नाम छिपाना या हेरफेर करना पुलिस की निष्पक्षता और संवैधानिक शपथ का सीधा उल्लंघन है।
- ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार (सुम्रीम कोर्ट संविधान पीठ):
- संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। एफआईआर कोई गोपनीय दस्तावेज नहीं बल्कि अपराध की प्रथम सूचना का अक्षुण्ण वैधानिक अभिलेख है, जिसमें उपलब्ध तथ्यों को दबाना गैरकानूनी है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: याचिकाकर्ता (इन-पर्सन) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [विशेष अनुमति याचिका / आपराधिक रिट – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा (सर्वोच्च न्यायालय)
- विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता: व्यक्तिगत रूप से उपस्थित (Party in-person)
- उत्तर प्रदेश पुलिस/राज्य की ओर से: राज्य के स्थायी वकील
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 154 (संज्ञेय मामलों में सूचना एवं एफआईआर दर्ज करने का अनिवार्य दायित्व)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया एवं निष्पक्ष विचारण का अधिकार)
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) / आईपीसी की धाराएं (जांच में साक्ष्य छिपाने व लोक सेवक द्वारा विधि की अवज्ञा से जुड़े अपराध)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें
- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘संज्ञेय अपराध में पुलिस के पास एफआईआर दर्ज न करने या तथ्यों को टालने का कोई विवेकाधिकार नहीं है।’
- बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि जांच पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या लीपापोती वाली पाई जाती है, तो वह अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन है और अदालतें जांच को सीबीआई या किसी स्वतंत्र एजेंसी को स्थानांतरित करने के लिए पूर्णतः सशक्त हैं।’
- अंतिम निर्देश: यूपी पुलिस का हलफनामा खारिज; संबंधित पुलिस अधिकारी को विस्तृत स्पष्टीकरण हलफनामे के साथ अगली सुनवाई पर अदालत में सशरीर पेश होने का सख्त आदेश।
UP Police:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति संजय कुमार एवं न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा |
| संबंधित पुलिस | उत्तर प्रदेश पुलिस (UP Police) |
| मुख्य विवाद | शिकायतकर्ता द्वारा आरोपी मोटरसाइकिल सवार को मौके पर पकड़कर पुलिस को सौंपने के बावजूद पुलिस द्वारा “अज्ञात” व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज करना और बाद में उसे क्लीन चिट देना। |
| अदालत का निर्देश | संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से पेश होने और बेहतर हलफनामा दाखिल करने के कड़े आदेश। |

