Tuesday, October 6, 2026
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Low IQ: क्या मानसिक स्थिति वास्तव में बचाव करने की कार्यात्मक क्षमता को रोकती है; 10 वर्ष की सामाजिक आयु वाले POCSO आरोपी का ट्रायल स्थगित करने से इनकार

At A Glance | एक नजर में

  • अदालत का सिद्धांत: हाईकोर्ट ने कहा कि बौद्धिक अक्षमता का मूल्यांकन आरोपी की व्यावहारिक क्षमता (Functional Capacity) के संदर्भ में किया जाना चाहिए—यानी क्या वह अपने खिलाफ लगे आरोपों, अदालती प्रक्रिया और वकील को निर्देश देने की स्थिति को समझ सकता है।
  • संबंधित कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 368 के तहत यह जांच की जाती है कि क्या विकृत चित्त (Unsound Mind) का व्यक्ति अपना बचाव करने में सक्षम है या नहीं।
  • मामले की पृष्ठभूमि: POCSO कानून के तहत आरोपी 20 वर्षीय युवक (कमल राज) ने दावा किया था कि उसका IQ केवल 35 है और सामाजिक आयु 10 वर्ष है, इसलिए उस पर मुकदमा न चलाया जाए।
  • मेडिकल बोर्ड का निष्कर्ष: मेडिकल बोर्ड ने पाया कि कम IQ के बावजूद आरोपी अपने खिलाफ लगे आरोपों को समझने और पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम है।

कोच्चि: मानसिक रूप से अस्वस्थ या बौद्धिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक विचारण (Criminal Trial) चलाने की विधिक पूर्व-शर्तों, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 368 [पूर्ववर्ती CrPC की धारा 318/328-329] के तहत ‘बचाव करने में अक्षम’ होने के विधिक मानकों, तथा अभियुक्त की नैदानिक अक्षमता (Clinical Disability) बनाम वास्तविक कार्यात्मक क्षमता (Actual Functional Capacity) के अंतर पर केरल उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आपराधिक न्यायशास्त्रीय फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि केवल कम बुद्धि लब्धि (Low IQ) या बौद्धिक अक्षमता की उपस्थिति स्वतः किसी अभियुक्त को मुकदमे का सामना करने के अयोग्य या अक्षम नहीं बनाती।

न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ ने पुनालूर (Punalur) की विशेष पॉक्सो अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने आरोपी द्वारा ट्रायल स्थगित करने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दिया था। अदालत ने 20 वर्षीय आरोपी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को खारिज करते हुए कहा कि बौद्धिक अक्षमता का मूल्यांकन अभियुक्त की न्यायिक कार्यवाही को समझने, अपने वकील को आवश्यक निर्देश देने और प्रश्नों का उत्तर देने की वास्तविक कार्यात्मक क्षमता (Functional Capacity) के संदर्भ में किया जाना अनिवार्य है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘केवल कम आईक्यू या बौद्धिक अक्षमता मुकदमे के लिए अक्षम नहीं बनाती’ न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन ने BNSS की धारा 368 के मूल विधायी उद्देश्य का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कहा:

“केवल एक बौद्धिक अक्षमता (Intellectual Disability) या कम बुद्धि लब्धि (Low IQ) की उपस्थिति, अपने आप में किसी व्यक्ति को मुकदमे का सामना करने के लिए अक्षम (Incapacitated to stand trial) नहीं बना देती।

महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न यह है कि क्या वह मानसिक स्थिति या अक्षमता अभियुक्त को कार्यवाही की प्रकृति को समझने, उससे पूछे जाने वाले प्रश्नों को समझने और अपने अधिवक्ता को आवश्यक तथ्य व निर्देश संसूचित करने से रोकती है या नहीं।”

2. वास्तविक कार्यात्मक क्षमता (Actual Functional Capacity) का परीक्षण निर्णायक: अदालत ने नैदानिक वर्गीकरण और विधिक सक्षमता के भेद को रेखांकित करते हुए कहा:

  • बौद्धिक अक्षमता के अस्तित्व पर केवल अमूर्त चिकित्सा रिपोर्टों के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता, बल्कि यह देखना होगा कि अभियुक्त की कार्यवाही में भाग लेने की व्यावहारिक क्षमता क्या है।
  • अदालत ने दो-टूक टिप्पणी की:“यदि मात्र बौद्धिक अक्षमता या कम आईक्यू का अस्तित्व ही किसी अभियुक्त को विचारण का सामना करने के अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त मान लिया जाए, तो ऐसी अक्षमता से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति—चाहे उसके पास कार्यात्मक क्षमता की डिग्री (Degree of Functional Capacity) कितनी भी क्यों न हो—आपराधिक कार्यवाहियों से पूरी तरह बाहर हो जाएगा।”

3. मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का व्यावहारिक विश्लेषण:

  • यद्यपि मेडिकल बोर्ड ने याचिकाकर्ता का आईक्यू 35 और सामाजिक आयु 10 वर्ष दर्ज की थी, परंतु उसी बोर्ड ने परीक्षण में यह सुस्पष्ट निष्कर्ष भी दिया था कि वह:
    1. अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों की प्रकृति को समझ सकता है,
    2. अदालती कार्यवाही के स्वरूप को समझता है, और
    3. उससे पूछे जाने वाले सवालों को समझकर उनका तार्किक उत्तर देने में सक्षम है।
  • उच्च न्यायालय ने माना कि जब आरोपी बुनियादी तथ्यों को समझकर अपने बचाव में निर्देश दे सकता है, तो विचारण को स्थगित करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: पुनालूर पॉक्सो केस और धारा 368 BNSS की अर्जी

  • आरोपी और पॉक्सो मामला:
    • 20 वर्षीय याचिकाकर्ता (कमल राज) के खिलाफ पुनालूर स्थित विशेष न्यायालय में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत आपराधिक मुकदमा लंबित है।
  • बौद्धिक अक्षमता का दावा और ट्रायल स्थगन की मांग:
    • याचिकाकर्ता ने विशेष अदालत के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 368 के तहत आवेदन दायर किया।
    • उसने दावा किया कि वह गंभीर बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित है, जिसके कारण वह अपना बचाव करने में असमर्थ है; अतः उसके स्वस्थ होने तक उसके खिलाफ आपराधिक विचारण को स्थगित (Postpone) किया जाए।
  • बचाव पक्ष के चिकित्सीय साक्ष्य:
    • बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने चिकित्सीय साक्ष्यों पर उचित ध्यान नहीं दिया।
    • उन्होंने एक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पेश की जिसमें आरोपी का आईक्यू केवल 35 आंका गया था।
    • एक अन्य मूल्यांकन रिपोर्ट का हवाला दिया गया जिसके अनुसार उसकी सामाजिक आयु (Social Age) मात्र 10 वर्ष थी।
    • यह भी बताया गया कि बचपन से ही उसका मानसिक विकास अवरुद्ध रहा है और स्कूली पढ़ाई के दौरान परीक्षाओं में उसे स्क्राइब (लेखक/सहायक) की आवश्यकता पड़ती थी।
  • ट्रायल कोर्ट की न्यायिक जांच (Inquiry):
    • विशेष अदालत ने धारा 368 के तहत अनिवार्य जांच की और मेडिकल बोर्ड की संपूर्ण रिपोर्ट का विश्लेषण करने के बाद पाया कि आरोपी अदालती कार्यवाही और आरोपों को समझने में सक्षम है। अतः उसे विचारण के लिए फिट (Fit to stand trial) पाया गया।
    • इस आदेश के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: BNSS की धारा 368 की कार्यप्रणाली

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 368:
    • [पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 318 एवं धारा 328/329 के समतुल्य]
    • न्यायालय का दायित्व: जब किसी मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय के समक्ष यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त विकृतचित्त (Unsound Mind) या मानसिक दुर्बलता से पीड़ित है, तो न्यायालय सिविल सर्जन या मेडिकल बोर्ड से जांच कराएगा।
    • स्थगन की पूर्व-शर्त: कार्यवाही केवल तभी रोकी या स्थगित की जा सकती है जब मेडिकल और न्यायिक जांच में यह प्रमाणित हो जाए कि अभियुक्त “अपना बचाव करने में असमर्थ” (Incapable of making his defense) है।
  • विधिक अक्षमता (Legal Incapacity) बनाम चिकित्सीय अक्षमता (Medical Disability):
    • आपराधिक न्यायशास्त्र में ‘चिकित्सीय पागलपन/दुर्बलता’ (Medical Insanity) और ‘विधिक पागलपन/अक्षमता’ (Legal Insanity/Incapacity) में बुनियादी भेद है।
    • कोई व्यक्ति चिकित्सीय दृष्टि से कम आईक्यू या बौद्धिक रूप से धीमा (Mentally challenged) हो सकता है, परंतु यदि वह यह समझने की बुनियादी क्षमता रखता है कि उस पर क्या आरोप हैं और अदालत में क्या चल रहा है, तो वह विधिक रूप से विचारण के अयोग्य नहीं माना जाता।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: कमल राज बनाम केरल राज्य [आपराधिक पुनरीक्षण याचिका – केरल उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: 29 सितंबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (अभियुक्त) की ओर से: अधिवक्ता हरिकृष्णन एम.एस., शक्ति प्रकाश एवं के. ध्रुव कुमार
    • राज्य/अभियोजन की ओर से: वी.आर. रामलाल (लोक अभियोजक)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 368 [पूर्ववर्ती CrPC की धारा 328 व 329 — विकृतचित्त या बचाव में अक्षम व्यक्ति के विचारण की प्रक्रिया एवं स्थगन]
    • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • सुप्रीम कोर्ट नजीरें (मानसिक अक्षमता और विचारण सक्षमता) — ‘विचारण का सामना करने की सक्षमता का परीक्षण इस बात पर निर्भर करता है कि क्या अभियुक्त के पास अपने वकील को तथ्य समझाने और अभियोजन के साक्ष्यों को समझने की न्यूनतम कार्यात्मक क्षमता है।’
    • आर. बनाम प्रिचर्ड (R. v. Pritchard – क्लासिक कॉमन लॉ सिद्धांत) — ‘सक्षमता की कसौटी यह है कि क्या अभियुक्त अभियोग को समझने, जूरी/अदालत को चुनौती देने और साक्ष्य को समझने में सक्षम है।’
  • अंतिम परिणाम: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज; विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा आरोपी को विचारण के लिए सक्षम (Fit to stand trial) ठहराने का आदेश पूरी तरह बहाल; आपराधिक मुकदमा नियमानुसार जारी रहेगा।

Low IQ: Key Indicators | मुख्य बिंदु

संकेत बिंदुविवरण
संबंधित न्यायाधीशजस्टिस जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ
कानूनी प्रावधानभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 368
याचिकाकर्ताकमल राज (पुनालुर की POCSO विशेष अदालत में आरोपी)
आरोपी की मेडिकल स्थितिIQ 35, सामाजिक आयु (Low IQ:) 10 वर्ष
हाईकोर्ट का निर्णयनिचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा गया जिसमें आरोपी को मुकदमे का सामना करने के लिए फिट माना गया था।
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