Wednesday, October 7, 2026
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Maoist Group: महाराष्ट्र में देश में सर्वाधिक 64 माओवादी मुखौटा संगठन सक्रिय; शहरी नेटवर्क को ध्वस्त करने और वित्तीय नकेल कसने के लिए विशेष लोक सुरक्षा कानून अपरिहार्य

राज्य सरकार के मुख्य तर्क और हलफनामे के बिंदु

  1. शहरी माओवादी नेटवर्क का केंद्र:गृह विभाग ने कहा कि अपनी विशाल शहरी आबादी और औद्योगिक केंद्रों के कारण महाराष्ट्र शहरी माओवादी नेटवर्क (Urban Maoist Network) का मुख्य केंद्र बन गया है। पड़ोसी राज्यों के विपरीत, महाराष्ट्र के पास इन छद्म (Frontal) संगठनों को प्रतिबंधित करने के लिए कोई विशेष जन सुरक्षा कानून नहीं था।
  2. सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना:केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों के तहत राज्यों के लिए ऐसा विशिष्ट कानून बनाना अनिवार्य था, ताकि उन्हें सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना के तहत माओवादी विरोधी अभियानों के लिए महत्वपूर्ण केंद्रीय फंड प्राप्त हो सके।
  3. कानूनी प्रक्रिया और जन-परामर्श:सरकार ने इस दावे को खारिज किया कि कानून बिना जन-परामर्श के पारित किया गया। राज्य ने बताया कि एक संयुक्त समिति ने 15,000 से अधिक लिखित आपत्तियों/सुझावों की समीक्षा की थी, जिसके बाद मुख्य शर्तों में संशोधन करके पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय (Safeguards) शामिल किए गए।
  4. याचिकाकर्ताओं के लोकस स्टैंडाई (Locus Standi) पर सवाल:राज्य ने हाईकोर्ट से याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध करते हुए कहा कि केवल जिज्ञासा या अकादमिक बहस के लिए संविधान संशोधन या कानून की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती; इसके लिए वास्तविक विधिक क्षति (Legal Injury) होना आवश्यक है।

मुंबई: वामपंथी उग्रवाद (LWE) के बदलते स्वरूप, घने शहरी केंद्रों में पनपने वाले तथाकथित ‘शहरी माओवादी नेटवर्क’ (Urban Maoist Network) पर विधायी नियंत्रण, नागरिक स्वतंत्रताओं बनाम लोक व्यवस्था (Public Order) के संतुलन, और महाराष्ट्र विशेष लोक सुरक्षा अधिनियम, 2025 (Maharashtra Special Public Security Act, 2025) की संवैधानिक वैधता को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक विवाद शुरू हो गया है।

महाराष्ट्र 64 माओवादी मुखौटा संगठनों के साथ पूरे देश में शीर्ष पर है

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिकाओं के उत्तर में राज्य के गृह विभाग ने गृह मंत्रालय (MHA) के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए खुलासा किया कि महाराष्ट्र 64 माओवादी मुखौटा संगठनों के साथ पूरे देश में शीर्ष पर है। सरकार ने तर्क दिया कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे पड़ोसी राज्यों में ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए पहले से विशेष लोक सुरक्षा कानून मौजूद थे, जबकि महाराष्ट्र में इस कानूनी शून्यता (Legal Vacuum) का फायदा उठाकर चरमपंथी संगठनों ने अपनी जड़े जमा ली थीं। अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में महाराष्ट्र सरकार ने 6 अक्टूबर को दाखिल अपने व्यापक जवाबी हलफनामे (Affidavit) में इस कानून की अपरिहार्यता का जोरदार बचाव किया है।

राज्य सरकार के हलफनामे के प्रमुख विधिक एवं रणनीतिक तर्क

1. माओवादी मुखौटा संगठनों की उपस्थिति के चौंकाने वाले आंकड़े

गृह विभाग द्वारा प्रस्तुत हलफनामे में केंद्रीय गृह मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों का विवरण देते हुए रेखांकित किया गया कि अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में मुखौटा संगठनों का जाल कहीं अधिक फैला हुआ है:

राज्यसक्रिय माओवादी मुखौटा संगठनपूर्व से प्रतिबंधित संगठनों की संख्या
महाराष्ट्र64 (देश में सर्वाधिक)2025 अधिनियम से पूर्व कोई विशेष कानून नहीं था
तेलंगाना297 प्रतिबंधित
आंध्र प्रदेश197 प्रतिबंधित
झारखंड1414 प्रतिबंधित
छत्तीसगढ़1111 प्रतिबंधित
ओडिशा0707 प्रतिबंधित

2. महाराष्ट्र ‘शहरी माओवादी नेटवर्क’ का मुख्य केंद्र:

  • हलफनामे में जोर दिया गया कि महाराष्ट्र में उच्च शहरी आबादी (High Urban Population) और प्रमुख औद्योगिक/शैक्षणिक केंद्र होने के कारण यह चरमपंथी विचारधारा के प्रसार, भूमिगत कार्यकर्ताओं को रसद मुहैया कराने, और शहरी नेटवर्क संचालित करने का मुख्य केंद्र बन गया है।
  • सरकार ने स्पष्ट किया कि पड़ोसी राज्यों के विपरीत, महाराष्ट्र के पास इन मुखौटा संगठनों को विधिवत गैर-कानूनी घोषित करने (Outlaw) के लिए अब तक कोई विशिष्ट राज्य लोक सुरक्षा कानून उपलब्ध नहीं था।

3. केंद्र सरकार की सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना की अनिवार्यता:

  • राज्य ने अदालत को अवगत कराया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के तहत, केंद्र की सुरक्षा संबंधी व्यय (Security Related Expenditure – SRE) योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए राज्यों में ऐसे विशिष्ट लोक सुरक्षा कानूनों का होना अनिवार्य शर्त थी।
  • माओवाद-विरोधी अभियानों, स्थानीय पुलिस के आधुनिकीकरण और वित्तीय प्रवाह को अवरुद्ध करने के लिए यह निधि अत्यंत आवश्यक है।

4. ‘नागरिक स्वतंत्रताओं और राष्ट्रीय अखंडता के बीच संतुलित विधिक ढांचा’:

राज्य सरकार ने इस आरोप को खारिज किया कि यह कानून नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन करता है: “यह अधिनियम नागरिकों की मूलभूत स्वतंत्रताओं (Fundamental Liberties) और लोक व्यवस्था व राष्ट्रीय अखंडता (National Integrity) के संरक्षण के सर्वोच्च दायित्व के बीच एक सुदृढ़ संतुलन स्थापित करता है। यह उन चरमपंथी संगठनों, छद्म समूहों या लोगों से लोकतांत्रिक ताने-बाने की रक्षा के लिए बनाया गया एक सुव्यवस्थित तंत्र है, जो कानून और नियमों का पालन करने का ढोंग करते हुए पर्दे के पीछे से राष्ट्र को कमजोर या नष्ट करने का गुप्त षड्यंत्र रचते हैं।”

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जन-परामर्श और याचियों के कानूनी अधिकार (Locus Standi) पर सरकार का रुख

  • 15,000 से अधिक लिखित आपत्तियों की समीक्षा:
    • याचिकाओं में दावा किया गया था कि विधेयक को बिना किसी जन-परामर्श या व्यापक विमर्श के आनन-फानन में पारित किया गया।
    • इसके उत्तर में राज्य ने स्पष्ट किया कि एक संयुक्त विधायी समिति (Joint Committee) ने जनता और हितधारकों से प्राप्त 15,000 से अधिक लिखित आपत्तियों व सुझावों की गहन समीक्षा की थी। इसके बाद ही प्रमुख कानूनी शब्दों को संशोधित किया गया और पर्याप्त विधिक सुरक्षा उपाय (Safeguards) अधिनियम में शामिल किए गए।
  • याचिकाकर्ताओं के ‘लोकस’ (Locus Standi) पर प्रारंभिक आपत्ति:
    • राज्य ने तर्क दिया कि किसी भी कानून की संवैधानिक वैधता को केवल राजनीतिक विरोध, बौद्धिक जिज्ञासा या अकादमिक बहस (Curiosity or Academic Exercise) के आधार पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
    • याचिका को बनाए रखने के लिए याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना होगा कि उन्हें इस कानून से कोई वास्तविक विधिक क्षति (Legal Injury) या व्यक्तिगत व्यथा (Real Grievance) पहुंची है। अतः याचिकाओं को प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त किया जाना चाहिए।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • महाराष्ट्र विशेष लोक सुरक्षा अधिनियम, 2025 की मुख्य रूपरेखा:
    • यह कानून राज्य सरकार को किसी ऐसे संगठन या समूह को ‘गैर-कानूनी’ (Unlawful) घोषित करने का अधिकार देता है जो विध्वंसक, चरमपंथी या राज्य विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है।
    • इसमें मुखौटा संगठनों पर प्रतिबंध लगाने, उनके बैंक खातों व वित्तीय संपत्तियों को फ्रीज (Financial Choking) करने और उनके प्रचार-प्रसार पर रोक लगाने के कड़े प्रावधान हैं।
  • संवैधानिक प्रावधान एवं न्यायिक सीमाएं:
    • अनुच्छेद 19(1)(c) (संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता): संविधान नागरिकों को संगठन बनाने का मौलिक अधिकार देता है, परंतु अनुच्छेद 19(4) के तहत राज्य को भारत की प्रभुता, अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता के हित में इस अधिकार पर “युक्तियुक्त निर्बंधन” (Reasonable Restrictions) लगाने की पूरी शक्ति प्राप्त है।
    • विधि की उचित प्रक्रिया (Due Process): याचिकाकर्ताओं का मुख्य आक्षेप यह है कि कानून में ‘गैर-कानूनी गतिविधि’ की परिभाषा अत्यधिक व्यापक (Vague and Overbroad) है, जिससे असहमति और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध को भी निशाना बनाया जा सकता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
  • अदालत: बॉम्बे उच्च न्यायालय (मुख्य पीठ, मुंबई)
  • हलफनामा दाखिल करने की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
  • प्रतिवादी: महाराष्ट्र राज्य (गृह विभाग)
  • प्रासंगिक कानून एवं नीतियां:
    • महाराष्ट्र विशेष लोक सुरक्षा अधिनियम, 2025 (Maharashtra Special Public Security Act, 2025)
    • गृह मंत्रालय (MHA) राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचा, 2020 (शहरी माओवादी नेटवर्क और वित्तीय संपत्तियों पर रोकथाम)
    • केंद्र सरकार की सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 19(1)(a) एवं 19(1)(c) (वाक् स्वतंत्रता एवं संगठन बनाने का अधिकार)
      • अनुच्छेद 19(2) एवं 19(4) (सार्वजनिक व्यवस्था व राष्ट्रीय अखंडता के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन)
      • अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध राज्य कानून नजीरें:
    • छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 एवं आंध्र प्रदेश लोक सुरक्षा अधिनियम, 1992 (समान उद्देश्यों वाले पहले से लागू राज्य कानून)।
  • वर्तमान स्थिति: राज्य सरकार ने विस्तृत हलफनामा दाखिल कर अधिनियम का बचाव किया और याचिकाओं को खारिज करने की मांग की; बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा याचिकाओं के गुण-दोष पर सुनवाई जारी।

Maoist Group:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित मामलाIndian National Congress & Ors. v. State of Maharashtra & Ors.
संबंधित कानूनमहाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2025
याचिकाकर्ताकांग्रेस पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) एवं अन्य
मुख्य मुद्दाकानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती; राज्य द्वारा शहरी माओवाद (Urban Maoism) का हवाला देकर बचाव।
गृह मंत्रालय (MHA) का डेटामहाराष्ट्र में 64 फ्रंटल संगठन हैं, जो देश के किसी भी अन्य राज्य से सर्वाधिक हैं।
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