Thursday, October 8, 2026
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Investigate Case: जांच अधिकारी का वैधानिक दायित्व निष्पक्ष साक्ष्य एकत्र करना है, साक्ष्य गढ़ना या कृत्रिम गवाह तैयार करना नहीं; महिला (आरोपी) बरी

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और बरी करने के कारण

  1. गवाहों को पेश करने का कोई स्पष्ट कारण नहीं:अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी यह समझाने में पूरी तरह असमर्थ रहा कि उसे इन दोनों अनजान गवाहों के पास पहुँचने का सुराग कहाँ से मिला। न तो आरोपी के प्रकटीकरण बयान (Disclosure Statement) में और न ही मृतका के पिता के बयान में किसी टैक्सी या होटल का कोई उल्लेख था।
  2. सबूत जुटाना बनाम सबूत गढ़ना:पीठ ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की: “यह अच्छी तरह से स्थापित है कि जांच अधिकारी की भूमिका सबूत एकत्र करना है, न कि उसे बनाना। जब पुलिस किसी ऐसे व्यक्ति का बयान दर्ज करती है जिसका अपराध से कोई स्पष्ट संबंध नहीं है, और यह खुलासा नहीं करती कि वह व्यक्ति जांच के दौरान कैसे सामने आया, तो यह संदेह पैदा करता है कि गवाह को केवल साक्ष्य गढ़ने के लिए खड़ा किया गया था।”
  1. पारिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) की अधूरी कड़ी:सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केवल डीएनए प्रोफाइल मिलना या किसी परिस्थिति का होना ही काफी नहीं है। आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए सभी कड़ियों (Chain of Circumstances) का निर्बाध रूप से जुड़ा होना अनिवार्य है, जिसे साबित करने में अभियोजन पूरी तरह विफल रहा।

नई दिल्ली: परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) पर आधारित हत्या के मुकदमों में साक्ष्य की संपूर्ण कड़ी (Chain of Circumstances) साबित करने की अनिवार्यता, दंड प्रक्रिया संहिता व भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत पुलिस जांच अधिकारी (Investigating Officer – IO) के विधिक कर्तव्यों की मर्यादा, और अभियोजन द्वारा जांच के दौरान अप्रत्याशित रूप से नए “गढ़े हुए गवाहों” (Stock/Introduced Witnesses) को पेश करने की विधिक त्रुटियों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आपराधिक न्यायशास्त्रीय फैसला सुनाया है।

अभियोजन का पक्ष मजबूत करने के लिए अपनी मर्जी से साक्ष्य गढ़ने की भूमिका

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के बरी किए जाने के निर्णय के विरुद्ध दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए 1 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी महिला (अंचला उर्फ चंचला) के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक अखंड और अटूट कड़ी साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी यह बताने में असमर्थ रहा कि टैक्सी चालक और होटल कर्मचारी के बयान दर्ज करने की प्रेरणा उसे कहां से मिली, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कड़ी जोड़ने के लिए इन गवाहों को पुलिस द्वारा बाद में “सेट अप” (तैयार) किया गया था। शीर्ष अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच अधिकारी की भूमिका निष्पक्ष साक्ष्य संकलित (Collect evidence) करने की है, न कि अभियोजन का पक्ष मजबूत करने के लिए अपनी मर्जी से साक्ष्य गढ़ने (Create evidence) की।

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सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘जांच अधिकारी का कार्य साक्ष्य एकत्र करना है, साक्ष्य गढ़ना नहीं’ न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने आपराधिक जांच के मूलभूत सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए कहा: “यह एक सुस्थापित विधिक सिद्धांत है कि जांच अधिकारी की भूमिका निष्पक्ष साक्ष्य एकत्र करना (To collect evidence) है, न कि साक्ष्य का निर्माण करना या गढ़ना (Not to create one)। जब पुलिस किसी ऐसे व्यक्ति का बयान दर्ज करती है जिसका अपराध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं दिखता—और जांच में यह खुलासा किए बिना कि वह व्यक्ति जांच के दायरे में कैसे आया—तो यह गंभीर संदेह पैदा करता है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य की कड़ी को पूरा करने के लिए उस गवाह को कृत्रिम रूप से गढ़ा गया (Set up to create evidence) था।”

2. जांच अधिकारी का सवालों से बचना और अनभिज्ञता जताना संदेहास्पद:

  • शीर्ष अदालत ने गवाहों के बयानों और केस डायरी का परीक्षण करते हुए पाया कि जांच अधिकारी (PW-20) अदालत में इस सवाल पर बगलें झांकता रहा और अनभिज्ञता जताता रहा कि उसने टैक्सी चालक (PW-4) और होटल कर्मचारी (PW-18) के बयान कब और किस आधार पर दर्ज किए।
  • पीठ ने आदेश में रेखांकित किया:“वर्तमान मामले में, पीडब्ल्यू-20 (जांच अधिकारी) सवाल से बचता है और इस बात से अनभिज्ञता का नाटक करता है कि उसने जांच के दौरान पीडब्ल्यू-4 (टैक्सी ड्राइवर) और पीडब्ल्यू-18 (होटल कर्मचारी) के बयान कब दर्ज किए थे। इसके अलावा, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि जांच के दौरान इन दोनों के बयान दर्ज करने के लिए उसे किस बात ने प्रेरित किया था।”

3. गवाहों के स्वतः सामने आने की संभावना शून्य:

  • अदालत ने तार्किक विश्लेषण करते हुए कहा कि किसी टैक्सी में सफर करना या होटल में ठहरना अपने आप में कोई ऐसा आपत्तिजनक कृत्य नहीं है जो किसी व्यक्ति को बेचैन कर दे और वह खुद पुलिस के पास जाकर गवाही देने लगे।
  • चूंकि न तो आरोपी के प्रकटीकरण बयान (Disclosure Statement under Section 27 Evidence Act) में टैक्सी या होटल का कोई जिक्र था, और न ही शिकायतकर्ता (मृतका के पिता) ने आरोपी को टैक्सी से आते देखने की बात कही थी, इसलिए पुलिस द्वारा सीधे इन दोनों गवाहों तक पहुंचने का कोई स्वाभाविक विधिक सूत्र (Lead) मौजूद नहीं था।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: चंबा और दिऊर का दोहरा हत्याकांड (2011)

  • अपराध और दोहरे शवों की बरामदगी:
    • 7 सितंबर 2011 को हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के दिऊर (Diur) स्थित एक मकान के भीतर अमर सिंह की दूसरी पत्नी मिथिलेश कुमारी और उनके नाबालिग बेटे भूपेंद्र सिंह के शव पाए गए। दोनों की गला दबाकर (Strangulation) नृशंस हत्या की गई थी।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि और संपत्ति का विवाद:
    • आरोपी अंचला उर्फ चंचला अमर सिंह की पहली पत्नी की बेटी थी। पहली पत्नी के निधन के बाद अमर सिंह ने मिथिलेश से विवाह किया था, जिनसे भूपेंद्र का जन्म हुआ था।
    • अंचला चंबा में रहती थी लेकिन दिऊर स्थित पैतृक घर आती-जाती रहती थी। अभियोजन का आरोप था कि अमर सिंह द्वारा अपनी संपत्ति नाबालिग बेटे भूपेंद्र के नाम वसीयत कर देने की रंजिश के चलते अंचला ने 31 अगस्त 2011 की रात दोनों की हत्या कर दी और घर पर ताला लगाकर फरार हो गई।
  • अभियोजन का ताना-बाना और गढ़े गए गवाह:
    • टैक्सी चालक (PW-4): अभियोजन ने साबित करने की कोशिश की कि 31 अगस्त की शाम अंचला चंबा से टैक्सी किराए पर लेकर दिऊर गई थी और आधी रात के बाद वापस लौटी। चालक ने यह भी दावा किया कि वापसी यात्रा में उसके अंगूठे से खून बह रहा था और उसने उसे प्राथमिक उपचार दिया था।
    • होटल कर्मचारी (PW-18): उसने दावा किया कि दिऊर से लौटने के बाद उसने अंचला को चंबा के एक होटल में देखा था।
    • बरामदगी व डीएनए: पुलिस ने दावा किया कि अंचला के घर से मृतका का मोबाइल व चाबियों का गुच्छा बरामद हुआ और घटनास्थल पर मिला खून अंचला के डीएनए से मेल खाता था।
  • ट्रायल कोर्ट बनाम हाईकोर्ट:
    • सत्र न्यायालय ने 7 नवंबर 2012 को अंचला को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
    • परंतु हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 28 जुलाई 2014 को दोषसिद्धि को पलटते हुए अंचला को पूरी तरह बरी कर दिया था। हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा साक्ष्यों की विधिक विफलता का विश्लेषण

सर्वोच्च न्यायालय ने अभियोजन के साक्ष्यों में कई घातक विसंगतियां पाईं, जिन्होंने पूरे मामले को ध्वस्त कर दिया:

  1. टैक्सी में खून के धब्बों का न होना: टैक्सी चालक ने दावा किया कि अंचला के अंगूठे से गहरा खून बह रहा था और उसने मरहम-पट्टी की थी; परंतु फोरेंसिक जांच में टैक्सी के भीतर खून का एक भी कतरा नहीं मिला।
  2. होटल का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं: होटल कर्मचारी की गवाही के समर्थन में पुलिस ने न तो कोई गेस्ट रजिस्टर जब्त किया और न ही होटल में ठहरने का कोई दस्तावेजी साक्ष्य पेश किया।
  3. गिरफ्तारी के बाद गवाहों को शामिल करना: रिकॉर्ड से पता चला कि पुलिस ने टैक्सी चालक से अंचला की औपचारिक गिरफ्तारी के बाद ही संपर्क किया था, जब पुलिस को पहले से ही उसके अंगूठे की चोट की जानकारी थी। इससे स्पष्ट हुआ कि अभियोजन की मनगढ़ंत कहानी को पुष्ट करने के लिए चालक को एक औजार (Tool) के रूप में इस्तेमाल किया गया।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • परिस्थितिजन्य साक्ष्य का पंचशील सिद्धांत (शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1984, सुप्रीम कोर्ट):
    1. जिन परिस्थितियों से दोष का निष्कर्ष निकाला जाना है, वे पूरी तरह स्थापित होनी चाहिए।
    2. परिस्थितियां केवल और केवल आरोपी के दोष की ओर संकेत करने वाली होनी चाहिए।
    3. परिस्थितियां एक निर्णायक प्रकृति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए।
    4. वे परिकल्पना के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष साक्ष्यों से पुष्ट होनी चाहिए।
    5. परिस्थितियों की ऐसी पूर्ण और अटूट श्रृंखला (Complete Chain) होनी चाहिए जिससे आरोपी की बेगुनाही का कोई उचित संदेह न बचे।
  • निष्पक्ष जांच का अधिकार (संविधान का अनुच्छेद 21):
    • निष्पक्ष जांच (Fair Investigation) निष्पक्ष सुनवाई की पूर्व-शर्त है।
    • यदि जांच अधिकारी किसी मामले में पूर्व-निर्धारित सोच के साथ जांच करता है और साक्ष्य संकलित करने के बजाय अनुकूल साक्ष्य गढ़ने लगता है, तो यह अभियुक्त के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है।
  • बरी किए जाने के फैसले में अपीलीय हस्तक्षेप की सीमाएं:
    • सुप्रीम कोर्ट ने पुनः दोहराया कि जब उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों की तार्किक समीक्षा करके किसी आरोपी को बरी कर दिया हो, तो अपीलीय अदालत केवल इसलिए हस्तक्षेप नहीं करेगी क्योंकि मामले में कोई दूसरा दृष्टिकोण भी संभव था। जब तक हाईकोर्ट का फैसला स्पष्ट रूप से विकृत (Perverse) न हो, बरी किए जाने का निर्णय सुरक्षित रहता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: हिमाचल प्रदेश राज्य (अपीलार्थी) बनाम अंचला उर्फ चंचला (प्रत्यर्थी) [आपराधिक अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • राज्य/अपीलार्थी की ओर से: अधिवक्ता विक्रांत नारायण वासुदेव, रोहित लोचव, एवं अरिंदम गुप्ता
    • प्रत्यर्थी (आरोपी महिला) की ओर से: अधिवक्ता संगीता कुमार
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302 (हत्या का अपराध)
    • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 8, 9 एवं धारा 27 (परिस्थितिजन्य साक्ष्य एवं प्रकटीकरण के आधार पर तथ्य की खोज)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष जांच एवं निष्पक्ष सुनवाई का मौलिक अधिकार) एवं अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका)
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984, सुप्रीम कोर्ट) — ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामलों में यदि परिस्थितियां अटूट श्रृंखला नहीं बनातीं, तो संदेह का लाभ आरोपी को मिलना अनिवार्य है।’
    • बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘जांच अधिकारी को निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए; साक्ष्य गढ़ना या पूर्वाग्रह से की गई जांच अभियोजन के पूरे मामले को विषाक्त बना देती है।’
  • अंतिम परिणाम: हिमाचल प्रदेश सरकार की आपराधिक अपील खारिज; उच्च न्यायालय द्वारा अंचला उर्फ चंचला को हत्या के सभी आरोपों से बरी करने का फैसला पूरी तरह बरकरार रखा गया।

Investigate Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित मामलाState of Himachal Pradesh v. Anchla @ Chanchla (Neutral Citation: 2026 INSC 1074)
पीठन्यायमूर्ति मनोज मिश्रा एवं न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई
घटनाक्रम (2011)हिमाचल प्रदेश के दिउर (Diur) में सौतेली माँ (मिथिलेश कुमारी) और मासूम भाई (भूपिंदर सिंह) का गला घोंटकर कत्ल।
न्यायालयों का रुखसत्र अदालत द्वारा 2012 में आजीवन कारावास की सजा; 2014 में हाईकोर्ट द्वारा बरी; 1 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरी करने का फैसला कायम।
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