Thursday, October 8, 2026
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Gurmeet Ram Rahim Singh: डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के पक्ष में फ्रंट-पेज प्रोपेगैंडा विज्ञापन छापने पर ‘द हिंदू’ और ‘दैनिक भास्कर’ पर एक्शन, पढ़ें

अवमानना का संदर्भ और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ

यह स्वतः संज्ञान कार्यवाही न्यायमूर्ति सुभाष मेहला (Justice Subhas Mehla) द्वारा पारित एक संदर्भ आदेश (Reference Order) के आधार पर शुरू की गई है।

  1. अदालत पर लांछन लगाने की कोशिश:न्यायमूर्ति मेहला ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि विज्ञापनों की सामग्री से यह आक्षेप निकलता है कि न्यायिक प्रक्रिया और अदालतें भी कथित साजिश का हिस्सा थीं।
  2. जनमत को प्रभावित करने का प्रयास:आदेश में कहा गया कि इस प्रकार के विज्ञापन जनमत (Public Opinion) को गोलबंद करने और विचाराधीन न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक सीधा प्रयास हैं, जो न्याय प्रशासन में बाधा डालते हैं।
  3. अदालत की गरिमा को ठेस:अदालत ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की:“इन विज्ञापनों की सामग्री में इस अदालत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने या इसके अधिकार को नीचा दिखाने (Scandalise or lower the authority) की प्रवृत्ति है। इसलिए यह मामला आपराधिक अवमानना क्षेत्राधिकार के तहत जांच का हकदार है।”

चंडीगढ़: विचाराधीन आपराधिक अपीलों के दौरान समाचार पत्रों में पेड-विज्ञापनों (Paid Advertisements) के जरिए जनमत को प्रभावित करने के प्रयासों, प्रिंट मीडिया द्वारा न्यायिक निष्पक्षता पर अप्रत्यक्ष लांछन लगाने, और संविधान के अनुच्छेद 215 सहपठित न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के कठोर प्रावधानों के तहत मीडिया घरानों की जवाबदेही पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों ‘द हिंदू’ (The Hindu) और ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) के प्रधान संपादकों (Editors-in-Chief) और प्रकाशकों (Publishers) के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू की है। यह मामला 7 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज और न्यायमूर्ति रविंद्र मलिक की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुआ। खंडपीठ ने इस गंभीर अवमानना याचिका को विस्तृत विचारार्थ 25 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता की आड़ में अदालती फैसलों और लंबित अपीलों को किसी “षड्यंत्र” का हिस्सा बताकर न्यायालय के प्राधिकार को कम आंकने की इजाजत किसी भी मीडिया समूह को नहीं दी जा सकती।

उच्च न्यायालय के संदर्भ आदेश के मुख्य विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

यह स्वतः संज्ञान कार्यवाही न्यायमूर्ति सुभाष मेहला द्वारा पिछले महीने पारित किए गए एक औपचारिक संदर्भ आदेश (Reference Order) के आधार पर शुरू हुई है। न्यायमूर्ति मेहला ने समाचार पत्रों में प्रकाशित सामग्री का प्रथम दृष्टया विश्लेषण करते हुए कड़े विधिक निष्कर्ष दर्ज किए थे:

1. ‘अदालतें साजिश का हिस्सा हैं, ऐसा जताना न्याय प्रशासन में सीधा अवरोध’ न्यायमूर्ति सुभाष मेहला ने विज्ञापनों की भाषा और अंतर्निहित संदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा:

“उक्त विज्ञापनों में यह संकेत दिया गया है कि अदालतें भी कथित साजिश का एक हिस्सा थीं। यह कृत्य स्पष्ट रूप से जनमत जुटाने (Mobilize public opinion) और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास था। ऐसी कार्रवाई सीधे तौर पर न्याय प्रशासन में बाधा (Directly obstructs the administration of justice) उत्पन्न करती है।”

2. अदालत के प्राधिकार को कलंकित करने की प्रवृत्ति:

  • पीठ ने प्रथम दृष्टया विचार करते हुए पाया:“उपर्युक्त विज्ञापन प्रकाशनों के अवलोकन से इस न्यायालय का यह सुविचारित मत है कि इनकी सामग्री में इस न्यायालय के प्राधिकार को कलंकित करने (Scandalise) या उसे कमतर आंकने (Lower the authority of this Court) की स्पष्ट प्रवृत्ति मौजूद है।”

3. सार्वजनिक माफी के बावजूद अवमानना कार्यवाही का पुनर्जीवन:

  • 12 सितंबर को दोनों प्रमुख समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर डेरा सच्चा सौदा का यह विज्ञापन प्रकाशित होने के बाद देशभर में तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया (Public Backlash) हुई थी।
  • इसके बाद ‘द हिंदू’ ने सार्वजनिक माफी (Public Apology) भी प्रकाशित की थी।
  • हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि केवल सार्वजनिक खेद जता देने से अदालती मर्यादा और लंबित न्यायिक अपीलों की शुचिता पर पहुंचे आघात की गंभीरता समाप्त नहीं हो जाती; अतः अवमानना क्षेत्राधिकार के तहत इसका गहन न्यायिक परीक्षण अनिवार्य है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: गुरमीत राम रहीम और 12 सितंबर के विज्ञापन

  • गुरमीत राम रहीम की कानूनी स्थिति:
    • डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह अपनी दो शिष्याओं से बलात्कार के अपराध में वर्तमान में 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा काट रहा है।
    • सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई इस दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध उसकी आपराधिक अपील वर्तमान में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है।
    • यद्यपि उच्च न्यायालय ने वर्ष 2024 में और मार्च 2026 में उसे दो अलग-अलग हत्या के मामलों (रणजीत सिंह हत्याकांड और रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड) में साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था, परंतु बलात्कार मामले में उसकी 20 साल की सजा बरकरार है।
  • 12 सितंबर 2026 के विज्ञापनों की सामग्री:
    • 12 सितंबर को ‘द हिंदू’ और ‘दैनिक भास्कर’ ने पहले पन्ने पर पूरे पृष्ठ का एक विज्ञापन प्रकाशित किया।
    • विज्ञापन में दावा किया गया कि डेरा प्रमुख को एक सुनियोजित “साजिश” (Conspiracy) के तहत निशाना बनाया गया है और फंसाया गया है।
    • विज्ञापन की भाषा ऐसी थी जिससे यह ध्वनि निकलती थी कि न्यायिक प्रक्रिया और अदालतों द्वारा दिए गए दोषसिद्धि के फैसले निष्पक्ष न्याय के बजाय इसी तथाकथित षड्यंत्र का परिणाम थे।
  • स्वतः संज्ञान संज्ञान (Suo Motu Cognizance):
    • जब यह विज्ञापन हाईकोर्ट के संज्ञान में आया, तो न्यायमूर्ति सुभाष मेहला ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता पर खुला हमला मानते हुए स्वतः संज्ञान आपराधिक अवमानना का आदेश जारी किया और मामले को डिवीजन बेंच के समक्ष सुनवाई हेतु भेजा।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
    • धारा 2(c)(i) (आपराधिक अवमानना): किसी भी बात का प्रकाशन (लिखित, मौखिक, दृश्य या विज्ञापनों के रूप में) जो किसी न्यायालय को कलंकित करता है या उसके प्राधिकार को कम करता है, आपराधिक अवमानना है।
    • धारा 2(c)(iii): किसी भी न्यायिक कार्यवाही या न्याय प्रशासन के सुचारू संचालन में किसी भी प्रकार से बाधा या हस्तक्षेप उत्पन्न करना।
    • धारा 15(1): उच्च न्यायालय को अपनी पहल पर (Suo Motu) आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
  • भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय की शक्ति):
    • उच्च न्यायालय एक ‘अभिलेख न्यायालय’ (Court of Record) है और उसे अपनी गरिमा, स्वतंत्रता और मातहत अदालतों की विश्वसनीयता की रक्षा के लिए किसी भी व्यक्ति को अवमानना हेतु दंडित करने की अंतर्निहित संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
  • प्रेस की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) बनाम न्यायिक शुचिता:
    • संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ‘न्यायालय अवमानना’ के युक्तियुक्त निर्बंधनों (Reasonable Restrictions) के अधीन है।
    • मीडिया संगठन व्यावसायिक लाभ या विज्ञापन राजस्व (Ad Revenue) के लिए ऐसे विज्ञापनों को प्रकाशित नहीं कर सकते जो किसी विचाराधीन (Sub-judice) आपराधिक मामले में अदालत के निष्कर्षों को षड्यंत्रकारी बताकर जनता को गुमराह करते हों।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान बनाम प्रधान संपादक एवं प्रकाशक, द हिंदू एवं दैनिक भास्कर [आपराधिक अवमानना याचिका – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज और न्यायमूर्ति रविंद्र मलिक (डिवीजन बेंच)
  • संदर्भ आदेशकर्ता जज: न्यायमूर्ति सुभाष मेहला
  • सूचीबद्धता की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
  • अगली सुनवाई की तिथि: 25 नवंबर 2026
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)(i), 2(c)(iii) एवं धारा 15(1)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अवमानना शक्तियां) एवं अनुच्छेद 19(2) (अवमानना के आधार पर अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता / दंड प्रक्रिया संहिता (विचाराधीन मामलों की शुचिता)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • इन रे: प्रशांत भूषण (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायपालिका के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाना जो संस्था के प्रति जनविश्वास को हिला दे, आपराधिक अवमानना की परिधि में आता है।’
    • साहब सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अखबार के संपादक और प्रकाशक मुद्रित सामग्री के लिए विधिक रूप से जवाबदेह होते हैं; विज्ञापन के रूप में छपे मानहानिकारक या अवमाननापूर्ण बयानों से भी वे अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते।’
  • वर्तमान स्थिति: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अवमानना याचिका पर औपचारिक विचार शुरू किया; दोनों समाचार पत्रों के संपादकों व प्रकाशकों की भूमिका की जांच के लिए अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को निर्धारित।

Gurmeet Ram Rahim Singh: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतपंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति विनोद एस. भारद्वाज एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मलिक)
प्रतिवादी‘द हिंदू’ और ‘दैनिक भास्कर’ के प्रधान संपादक और प्रकाशक
विवाद का कारण12 सितंबर को मुख्य पृष्ठ पर डेरा प्रमुख के पक्ष में “साजिश” का दावा करने वाला विज्ञापन
कानूनी प्रावधानसंविधान का अनुच्छेद 215 सह-पठित अवमानना अदालत अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) और 15(1)
अगली सुनवाई25 नवंबर 2026
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