हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और यूजीसी नियमों की व्याख्या
1. “विश्वविद्यालय अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकते”:
न्यायामूर्ति न्यापति विजय ने अपने फैसले में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा: “याचिकाकर्ताओं को असिस्टेंट प्रोफेसर के समान वेतन न देकर, विश्वविद्यालय अपनी ही गलती का लाभ उठाकर याचिकाकर्ताओं के आवेदनों को खारिज नहीं कर सकते। जहां 8 वर्षों के न्यूनतम गुणवत्तापूर्ण शिक्षण अनुभव पर कोई संदेह नहीं है, वहां वेतन को अनुभव पर एक पूर्ण निर्धारक कारक (Absolute Determining Factor) नहीं माना जा सकता।”
2. नियम 13 (Regulation 13) के तहत वेतन देने की बाध्यता:
- कोर्ट ने नोट किया कि यूजीसी नियम 13 स्पष्ट रूप से अनिवार्य करता है कि सभी अनुबंध शिक्षकों को नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर के बराबर परिलब्धियां दी जानी चाहिए।
- चूंकि पिछले 15 वर्षों से नियमित भर्तियां न होने के कारण विश्वविद्यालयों ने संविदा पर काम लिया, इसलिए कम वेतन मिलने में उम्मीदवारों की कोई गलती नहीं थी। उनकी मोलभाव की शक्ति (Bargaining Power) सीमित थी।
3. वेतन शर्त का वास्तविक उद्देश्य:
अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम 10(f)(iii) में वेतन संबंधी शर्त का मुख्य उद्देश्य केवल शिक्षण अनुभव की सत्यता की पुष्टि करना है, ताकि फर्जी दावों को रोका जा सके। यदि उम्मीदवार का चयन प्रक्रिया से चुना जाना और 8 साल तक पढ़ाना निर्विवाद (Undisputed) है, तो वेतन की कमी के कारण उसे अयोग्य घोषित करना पूरी तरह मनमाना और अव्यवहारिक है।
अमरावती: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियम, 2018 के विनियम 10(f)(iii) (पूर्व तदर्थ/संविदात्मक शिक्षण सेवा को अर्हक अनुभव के रूप में गिने जाने हेतु नियमित शिक्षक के समकक्ष सकल परिलब्धियों / Gross Emoluments की शर्त), विनियम 13 (संविदा शिक्षकों को नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर के बराबर न्यूनतम वेतन देने की सांविधिक बाध्यता), आंध्र प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग के शासनादेश G.O.Ms.No.14 (2019) एवं G.O.Ms.No.20 (2023), अपनी ही गलती का लाभ उठाने पर रोक का सिद्धांत (Doctrine of Commodum Ex Injuria Sua Nemo Habere Debet), तथा 8 वर्ष के गुणात्मक शिक्षण अनुभव (Qualitative Teaching Experience) के विधिक मूल्यांकन पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए एक युगांतरकारी निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति न्यापति विजय की एकल पीठ ने राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर के करीब 1,500 पदों पर निकाली गई भर्ती से संविदा/अस्थायी शिक्षकों को बाहर किए जाने को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं के एक बैच का निस्तारण करते हुए स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि जब शिक्षकों की निर्धारित चयन समिति द्वारा नियुक्ति और उनके 8 वर्ष के न्यूनतम शिक्षण अनुभव पर कोई विवाद नहीं है, तो उन्हें दिए गए कम वेतन को उनकी अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने विश्वविद्यालयों को फटकार लगाते हुए कहा कि संस्थान स्वयं संविदा शिक्षकों को यूजीसी के अनुरूप पूरा वेतन न देकर कानून का उल्लंघन करते रहे हैं, और बाद में उसी कम वेतन का हवाला देकर उनके शिक्षण अनुभव को खारिज करना अपनी ही गलती का अनुचित लाभ (Taking Advantage of Their Own Wrong) उठाने जैसा है। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया कि वे विनियमन 10(f)(iii) के वेतन मानदंड पर जोर दिए बिना सभी याचिकाकर्ताओं के आवेदनों की पात्रता का नए सिरे से परीक्षण करें।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘शिक्षण अनुभव के मुकाबले वेतन को निरपेक्ष या एकमात्र निर्णायक कारक नहीं माना जा सकता’
न्यायमूर्ति न्यापति विजय ने यूजीसी विनियम 2018 के मूल विधायी उद्देश्य का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी: “वेतन (Emoluments) को शिक्षण अनुभव के मुकाबले एक निरपेक्ष निर्णायक कारक (Absolute Determining Factor) नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब असिस्टेंट प्रोफेसर के संवर्ग या समकक्ष संवर्ग में न्यूनतम गुणात्मक शिक्षण अनुभव के संबंध में कोई संदेह न हो—जैसा कि विश्वविद्यालयों में कार्यरत गैर-नियमित शिक्षण संकाय और सरकारी कॉलेजों में संबंधित पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले व्याख्याताओं के मामले में है। विश्वविद्यालयों ने स्वयं याचिकाकर्ताओं को असिस्टेंट प्रोफेसर के बराबर परिलब्धियों का भुगतान नहीं किया, इसलिए वे अपनी ही गलती का अनुचित लाभ (Take advantage of their own wrong) उठाकर याचिकाकर्ताओं के आवेदनों को खारिज नहीं कर सकते थे।”
2. ‘अपनी ही चूक का लाभ लेने पर रोक’ (Commodum Ex Injuria Sua):
- अदालत ने रेखांकित किया कि यूजीसी के विनियम 13 के अनुसार संविदा शिक्षकों को नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर के निर्धारित सकल वेतन से कम भुगतान नहीं किया जा सकता।
- चूंकि राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों ने पिछले 15 वर्षों से नियमित भर्तियां नहीं की थीं और शिक्षकों को कम मानदेय पर ‘एकेडमिक कंसल्टेंट’ जैसे अलग-अलग नामों से रखा था, इसलिए कम वेतन देने का दोष विश्वविद्यालयों का था, न कि शिक्षकों का। कोई भी नियोक्ता अपनी वैधानिक चूक का खामियाजा कर्मचारियों की पात्रता छीनकर नहीं भुगतवा सकता।
3. वेतन शर्त का उद्देश्य ‘सत्यापन’ था, न कि योग्यता पर प्रतिबंध लगाना:
- पीठ ने स्पष्ट किया कि विनियमन 10(f)(iii) में वेतन का उल्लेख करने का वास्तविक उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना था कि कोई फर्जी या अप्रमाणिक शिक्षण अनुभव का दावा न करे।
- जब यह तथ्य निर्विवाद है कि अभ्यर्थियों ने नियमित चयन समिति के माध्यम से नियुक्ति पाई थी और वे वास्तविक कक्षाओं में असिस्टेंट प्रोफेसर के समान ही शिक्षण कार्य कर रहे थे, तो वेतन पर्ची में कम राशि होना अनुभव की वास्तविकता को समाप्त नहीं कर सकता:“किसी उम्मीदवार की पात्रता को उसके पिछले नियोक्ता द्वारा दिए गए वेतन पर निर्भर बनाना मनमाना (Arbitrary) होगा, क्योंकि प्राप्त होने वाली राशि पर उम्मीदवार का कोई नियंत्रण नहीं होता। संविदा शिक्षकों के पास सेवा से हटाए जाने के डर और सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) के अभाव के कारण नियमित वेतन की मांग करने की स्थिति नहीं होती।”
4. ‘एकेडमिक कंसल्टेंट्स’ का पदनाम भी असिस्टेंट प्रोफेसर के समकक्ष माना जाएगा:
- विश्वविद्यालयों का तर्क था कि कुछ याचिकाकर्ताओं को ‘असिस्टेंट प्रोफेसर’ के बजाय ‘एकेडमिक कंसल्टेंट’ पदनाम दिया गया था।
- हाईकोर्ट ने इसे खारिज करते हुए व्यवस्था दी कि विनियमन 13 भले ही संविदा कर्मचारियों के लिए लिखा गया हो, किंतु यह गैर-नियमित रूप से पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों पर लागू होता है। चूंकि वे असिस्टेंट प्रोफेसर के पाठ्यक्रम और कर्तव्यों का ही निर्वहन कर रहे थे, इसलिए उनका अनुभव एसोसिएट प्रोफेसर पद हेतु पूरी तरह मान्य होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं दोनों पक्षों की दलीलें |
| याचिकाकर्ताओं की पृष्ठभूमि | विभिन्न राज्य विश्वविद्यालयों और सरकारी कॉलेजों में 8 वर्ष या उससे अधिक समय से कार्यरत संविदा शिक्षक, तदर्थ व्याख्याता और एकेडमिक कंसल्टेंट्स। |
| मई 2026 की भर्ती अधिसूचना | राज्य विश्वविद्यालयों द्वारा एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के लगभग 1,500 पदों पर नियमित भर्ती हेतु आवेदन आमंत्रित किए गए। |
| विश्वविद्यालयों द्वारा अस्वीकृति | विश्वविद्यालयों ने याचिकाकर्ताओं के आवेदन यह कहकर खारिज कर दिए कि उनके पास UGC विनियम 2018 (और राज्य के G.O.Ms.No.14 व G.O.Ms.No.20) के तहत निर्धारित नियमित वेतनमान/सकल परिलब्धियों वाला अनुभव नहीं है। |
| याचिकाकर्ताओं के तर्क (अधिवक्ता कविता गोट्टीपति) | सभी नियुक्तियां विधिवत चयन समितियों द्वारा निर्धारित योग्यताओं के आधार पर हुई थीं। उन्होंने लगातार पूर्णकालिक अध्यापन किया है। वेतन का निर्धारण विश्वविद्यालयों के हाथ में था; कम वेतन की सजा देकर उनके विधिक अनुभव को शून्य नहीं किया जा सकता। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश | अस्वीकृति आदेश निष्प्रभावी; विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया कि वे विनियमन 10(f)(iii) के वेतन संबंधी प्रतिबंध को दरकिनार करते हुए सभी योग्य उम्मीदवारों के आवेदनों की पात्रता बहाल कर चयन प्रक्रिया में शामिल करें। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: UGC विनियम 2018 का ढांचा
- एसोसिएट प्रोफेसर पद हेतु मूल अर्हता (UGC Regulations, 2018):
- न्यूनतम 8 वर्ष का अध्यापन और/या शोध अनुभव (असिस्टेंट प्रोफेसर के समकक्ष)।
- पीएचडी उपाधि, निर्धारित शोध पत्र (Publications) और न्यूनतम रिसर्च स्कोर।
- विनियमन 10(f)(iii) की व्यावहारिक व्याख्या (Workable Interpretation):
- न्यायालयों ने लगातार यह माना है कि अधीनस्थ नियमों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो उद्देश्य को प्राप्त करे (Purposive Interpretation), न कि उसे निष्फल करे।
- यदि कोई निजी अप्रमाणित संस्थान किसी शिक्षक को अनुभव प्रमाण पत्र दे, तो वहाँ फर्जीवाड़े को रोकने के लिए बैंक विवरण और ITR (जैसा G.O.Ms.No.20 में है) आवश्यक हो सकता है। किंतु जब उम्मीदवार स्वयं उसी राज्य विश्वविद्यालय में पढ़ा रहा हो जिसने भर्ती निकाली है, तो अनुभव की प्रामाणिकता पर कोई संदेह नहीं रह जाता।
- संविधान का अनुच्छेद 14 और विधिक समता:
- यदि विश्वविद्यालय समान कार्य कराने के बावजूद संविदा शिक्षकों को कम वेतन देते हैं और बाद में उसी कम वेतन के आधार पर उन्हें नियमित भर्ती की दौड़ से बाहर कर देते हैं, तो यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का सीधा उल्लंघन है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: संविदा शिक्षक संकाय बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, उच्च शिक्षा विभाग व संबंधित विश्वविद्यालय [रिट याचिकाओं का बैच – आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति न्यापति विजय (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध भर्ती अधिसूचना: आंध्र प्रदेश राज्य विश्वविद्यालयों द्वारा जारी केंद्रीय संकाय भर्ती (मई 2026 – लगभग 1,500 पद)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (शिक्षकों) की ओर से: अधिवक्ता कविता गोट्टीपति (Advocate Kavitha Gottipati)
- प्रतिवादी (राज्य सरकार) की ओर से: शासकीय अधिवक्ता (Government Pleader for Services-III)
- प्रतिवादी (विश्वविद्यालयों) की ओर से: अधिवक्ता सी.एच. यू.एम. रेड्डी (स्टैंडिंग काउंसिल, वी. सिंहपुरी विश्वविद्यालय, नेल्लोर)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियम, 2018 — विनियम 10(f) (पूर्व तदर्थ/संविदा सेवा की गणना) एवं विनियम 13 (संविदात्मक नियुक्तियों पर 10% की सीमा व नियमित वेतन का अधिदेश)
- आंध्र प्रदेश उच्च शिक्षा शासनादेश — G.O.Ms.No.14 (दिनांक 13 फरवरी 2019 – UGC नियमों को अपनाना) एवं G.O.Ms.No.20 (दिनांक 28 जून 2023 – क्लॉज 4.3 चयन मार्गदर्शिका)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (अवसर की समता) एवं अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अपनी ही चूक का अनुचित लाभ न उठाने का सिद्धांत (Nemo Ex Suo Delicto Meliorem Suam Conditionem Facere Potest): ‘जब विश्वविद्यालय स्वयं शिक्षकों को सांविधिक मानकों के अनुरूप वेतन न देने के दोषी हैं, तो वे उसी कम वेतन को आधार बनाकर शिक्षकों के वास्तविक और निर्विवाद शिक्षण अनुभव को अमान्य नहीं ठहरा सकते; सेवा गणना में गुणात्मक अनुभव सर्वोपरि है।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिकाओं का बैच स्वीकार/निस्तारित; संविदा शिक्षकों के आवेदन खारिज करने वाले आदेश निष्प्रभावी; विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया कि वे विनियमन 10(f)(iii) के वेतन मानदंड पर जोर दिए बिना याचिकाकर्ताओं के आवेदनों का एसोसिएट प्रोफेसर पद हेतु नए सिरे से पुनरीक्षण करें।
UGC Regulation: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति न्यापति विजय |
| संबंधित नियम | यूजीसी विनियम, 2018 का विनियम 10(f)(iii) एवं नियम 13 |
| भर्ती संदर्भ | मई 2026 में राज्य विश्वविद्यालयों द्वारा 1,500 से अधिक शिक्षण पदों के लिए जारी विज्ञापन। |
| मुख्य विवाद | संविदा/अकादमिक कंसल्टेंट के रूप में 8 साल सेवा देने के बावजूद यूजीसी स्केल के अनुसार वेतन न मिलने के आधार पर आवेदन खारिज करना। |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. शिक्षण अनुभव साबित होने पर कम वेतन के आधार पर उम्मीदवारी रद्द करना मनमाना है। 2. विश्वविद्यालय स्वयं यूजीसी नियम 13 के अनुसार पूरा वेतन न देने की अपनी गलती का फायदा उम्मीदवारों के खिलाफ नहीं उठा सकते। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिकाएं स्वीकृत; विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया कि वे वेतन की शर्त हटाकर आवेदनों की पुनः जांच करें। |

