मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस का फर्जीवाड़ा
- क्या था मूल मामला?याचिकाकर्ता जुनैद को उत्तर प्रदेश पुलिस ने जालसाजी के एक मामले में गिरफ्तार किया था। उसकी ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) दाखिल कर आरोप लगाया गया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय उसे संविधान और कानून के तहत आवश्यक गिरफ्तारी के लिखित आधार (Grounds of Arrest) नहीं बताए और मेमो में फर्जीवाड़ा किया।
- हाईकोर्ट द्वारा पकड़ा गया अंतर:जब हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड की जांच की, तो एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। रिमांड के समय निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के सामने पुलिस ने जो ओरिजिनल अरेस्ट मेमो पेश किया था, वह हाईकोर्ट में जमा किए गए अरेस्ट मेमो से अलग था।
- याचिका दाखिल होने के बाद मेमो में हेरफेर:अदालत ने पाया कि मूल अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के आधार खाली थे। लेकिन जब हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल हुई, तो पुलिस ने अपनी गलती छिपाने के लिए अरेस्ट मेमो के दूसरे पृष्ठ की मद संख्या 12 और 13 (Item Nos. 12 & 13) में बाद में फर्जी प्रविष्टियां दर्ज कर दीं और उसे अपने जवाबी हलफनामे (Counter Affidavit) के साथ हाईकोर्ट में पेश कर दिया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी टिप्पणी
1. “हाइकोर्ट के समक्ष पेश किया गया जाली दस्तावेज”:
पीठ ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा: “यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मूल गिरफ्तारी मेमो में जांच अधिकारी (I.O.) द्वारा ये प्रविष्टियां कभी दर्ज नहीं की गई थीं। अरेस्ट मेमो को सही साबित करने के लिए—शायद इस अदालत के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर होने के बाद—मेमो के दूसरे पृष्ठ की मद संख्या 12 और 13 में जाली प्रविष्टियां की गईं। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि इस अदालत के समक्ष हलफनामे के साथ जाली दस्तावेज रखा गया था।”
2. संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन (Grounds of Arrest):
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (Prabhir Purkayastha) और पंकज बंसल मामलों में तय सिद्धांतों के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार बताना अनिवार्य है। ऐसा न करना अनुच्छेद 22(1) का सीधा उल्लंघन है, जिससे पूरी हिरासत गैर-कानूनी हो जाती है।
प्रयागराज: भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) (गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना पाने का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण), दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 50 सहपठित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 47 (गिरफ्तारी के कारणों और जमानत के अधिकार से अवगत कराना), CrPC की धारा 340 / BNSS की धारा 379 (अदालती कार्यवाहियों में झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने व जालसाजी के विरुद्ध झूठी गवाही / Perjury की औपचारिक जांच), तथा बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) क्षेत्राधिकार के तहत गैर-कानूनी हिरासत से तत्काल रिहाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए एक असाधारण आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने जालसाजी (Forgery) के एक मामले में गिरफ्तार आरोपी जुनैद की अवैध हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि पुलिस ने हाईकोर्ट में अपनी कार्रवाई को सही साबित करने के लिए स्वयं एक जाली व मनगढ़ंत अरेस्ट मेमो (Fabricated Arrest Memo) तैयार कर जवाबी हलफनामे के साथ पेश कर दिया।
अदालत ने पाया कि रिमांड के समय मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए गए मूल अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के कोई वैध आधार दर्ज नहीं थे। बाद में जब हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर हुई, तो पुलिस अधिकारियों ने अरेस्ट मेमो के दूसरे पृष्ठ पर आइटम नंबर 12 और 13 में हेरफेर कर फर्जी प्रविष्टियां जोड़ दीं। उच्च न्यायालय ने आरोपी को तुरंत हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया और इस आपराधिक जालसाजी के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत जांच के लिए रजिस्ट्रार जनरल को अधिकृत कर दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां
1. ‘पुलिस ने हाईकोर्ट को गुमराह करने के लिए अरेस्ट मेमो में की बाद में जालसाजी’
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दोनों दस्तावेजों की तुलना करने के बाद कड़े शब्दों में दर्ज किया: “यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मूल अरेस्ट मेमो में जांच अधिकारी (I.O.) द्वारा ये प्रविष्टियां कभी दर्ज ही नहीं की गई थीं। अरेस्ट मेमो को त्रुटिहीन (Perfect) दिखाने के उद्देश्य से—संभवतः इस न्यायालय के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर होने के बाद—अरेस्ट मेमो के दूसरे पृष्ठ के आइटम नंबर 12 और 13 में फर्जी प्रविष्टियां गढ़ी गईं। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जवाबी हलफनामे के साथ इस उच्च न्यायालय के समक्ष एक जाली और मनगढ़ंत दस्तावेज (Fabricated Document) प्रस्तुत किया गया था।”
2. रिमांड कोर्ट के समक्ष रिकॉर्ड बनाम हाईकोर्ट में पेश हलफनामे में खुला अंतर:
- अदालत ने जब ट्रायल कोर्ट (रिमांड मजिस्ट्रेट) के मूल न्यायिक रिकॉर्ड की जांच की, तो पाया कि रिमांड मांगते समय पुलिस ने जो अरेस्ट मेमो दाखिल किया था, उसमें अभियुक्त को गिरफ्तारी के विधिक आधार सूचित करने का कोई विवरण मौजूद नहीं था।
- किंतु जब आरोपी के परिजनों ने गिरफ्तारी की प्रक्रियात्मक वैधता को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की, तो पुलिस ने जवाबी हलफनामे (Counter Affidavit) में एक नया पन्ना जोड़कर दावा किया कि अभियुक्त को सभी आधार मौके पर ही बता दिए गए थे।
- पीठ ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के साथ खुला खिलवाड़ माना।
3. अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन: अवैध गिरफ्तारी के आधार पर तत्काल रिहाई:
- अदालत ने माना कि जब मूल अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के आधार दर्ज ही नहीं थे और अभियुक्त को कोई लिखित कारण नहीं सौंपे गए, तो पूरी गिरफ्तारी प्रक्रिया असंवैधानिक और शून्य हो गई।
- किसी भी व्यक्ति को ऐसी दोषपूर्ण प्रक्रिया के आधार पर जेल में रखना अनुच्छेद 21 के तहत गैर-कानूनी निरोध (Illegal Detention) है। इसलिए खंडपीठ ने आरोपी जुनैद को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
4. झूठी गवाही (Perjury Probe) की जांच के आदेश:
- अदालत ने इसे केवल एक प्रक्रियात्मक चूक मानने से इनकार करते हुए पुलिस अधिकारियों द्वारा अदालत में झूठा हलफनामा और जाली दस्तावेज दाखिल करने का संज्ञेय अपराध माना।
- खंडपीठ ने रजिस्ट्रार जनरल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वे इस पूरे प्रकरण की प्राथमिक जांच करें कि यह जालसाजी किस स्तर पर और किन पुलिस अधिकारियों (जांच अधिकारी व हलफनामा दाखिल करने वाले अधिकारी) द्वारा की गई, ताकि सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 340 CrPC / 379 BNSS के तहत औपचारिक आपराधिक परिवाद (Criminal Complaint for Perjury & Forgery) दर्ज कराया जा सके।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती निष्कर्ष |
| मूल अपराध एवं गिरफ्तारी | आरोपी जुनैद के विरुद्ध उत्तर प्रदेश के एक थाने में जालसाजी (Forgery/Cheating) के संबंध में आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और रिमांड हेतु संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया। |
| बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) | आरोपी की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर कर आरोप लगाया गया कि पुलिस ने पंकज बंसल और प्रबीर पुरकायस्थ मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अनिवार्य दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन किया है। आरोपी को गिरफ्तारी के समय कोई लिखित आधार नहीं दिए गए थे, जिससे पूरी रिमांड अवैध हो जाती है। |
| पुलिस की जालसाजी का पर्दाफाश | पुलिस ने याचिका का विरोध करने के लिए जवाबी हलफनामा दाखिल किया और अरेस्ट मेमो संलग्न कर दिखाया कि सब कुछ विधिवत था। किंतु जब खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट से रिमांड के समय का मूल मेमो मंगाकर मिलान किया, तो पाया कि हाईकोर्ट में जमा प्रति के पृष्ठ 2 (मद 12 व 13) में बाद में नई प्रविष्टियां गढ़ी गई थीं। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | जुनैद की हिरासत को अवैध ठहराते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश। साथ ही हलफनामा देने वाले पुलिस अधिकारियों पर झूठी गवाही की जांच शुरू। |
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 22(1) और ‘लिखित आधार’ की अनिवार्यता:
- सर्वोच्च न्यायालय ने पंकज बंसल बनाम भारत संघ (2023) और बाद में प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) (2024) में यह स्पष्ट कर दिया है कि अनुच्छेद 22(1) के तहत ‘गिरफ्तारी के आधार’ (Grounds of Arrest) अभियुक्त को लिखित रूप में और बिना किसी देरी के सौंपे जाने चाहिए, ताकि वह तुरंत जमानत के लिए प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सके।
- यदि अरेस्ट मेमो में आधार खाली हैं या अस्पष्ट हैं, तो यह सीधे तौर पर गिरफ्तारी को असंवैधानिक बना देता है।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) और रिमांड आदेश:
- सामान्यतः रिमांड आदेश के बाद हेबियस कॉर्पस याचिका पर विचार नहीं किया जाता, किंतु सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गौतम नवलखा (2021) और प्रबीर पुरकायस्थ में माना है कि यदि मूल गिरफ्तारी ही संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन करके की गई हो, तो रिमांड आदेश भी दूषित हो जाता है और उच्च न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी कर रिहाई का आदेश दे सकता है।
- धारा 340 CrPC / धारा 379 BNSS (अदालत के विरुद्ध अपराध):
- भारतीय दंड संहिता की धारा 193 (न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य गढ़ना) और धारा 465/471 (जालसाजी और जाली दस्तावेज का असली के रूप में उपयोग) के तहत पुलिस अधिकारियों को कोई प्रतिरक्षा (Immunity) प्राप्त नहीं है।
- जब कोई पुलिस अधिकारी अदालत को धोखा देने के लिए केस डायरी या अरेस्ट मेमो में पूर्वव्यापी बदलाव करता है, तो यह न्याय के मंदिर की शुचिता पर सीधा हमला है। ऐसे मामलों में अदालतें स्वयं संज्ञान लेकर आपराधिक परिवाद दर्ज कराती हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: जुनैद व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 4 अन्य [बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: अरेस्ट मेमो में पुलिस द्वारा की गई जालसाजी, अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन एवं धारा 340 CrPC के तहत जांच
विधिक पक्षकार:
- याचिकाकर्ता: जुनैद (हिरासत में निरुद्ध अभियुक्त) एवं अन्य
- प्रतिवादी: उत्तर प्रदेश राज्य (गृह विभाग), संबंधित पुलिस अधीक्षक, जांच अधिकारी (I.O.) व अन्य संबंधित पुलिसकर्मी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता), अनुच्छेद 22(1) (गिरफ्तारी के आधार सूचित करने की बाध्यता) एवं अनुच्छेद 226 (बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 50 (गिरफ्तारी के कारणों की सूचना), धारा 167 (रिमांड प्रक्रिया) एवं धारा 340 (न्याय प्रशासन को प्रभावित करने वाले अपराधों हेतु प्रक्रिया) / BNSS 2023 की धारा 47, 187 व 379
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 193 (झूठा साक्ष्य गढ़ना), धारा 466 (अदालती रिकॉर्ड की जालसाजी) एवं धारा 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- जांच एजेंसियों द्वारा जालसाजी पर शून्य सहनशीलता: ‘कानून के रक्षक स्वयं कानून तोड़ने वाले नहीं बन सकते; यदि पुलिस अभियुक्त की गिरफ्तारी को वैध दिखाने के लिए अरेस्ट मेमो में फर्जी प्रविष्टियां जोड़ती है और हाईकोर्ट में झूठा हलफनामा दाखिल करती है, तो अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति की तत्काल रिहाई होगी और दोषी अधिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही (Perjury) का आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा।’
- अंतिम परिणाम: बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार; आरोपी जुनैद को तत्काल रिहा करने का निर्देश; इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को अरेस्ट मेमो में की गई जालसाजी और झूठे हलफनामे की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का बाध्यकारी आदेश।
मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव |
| याचिकाकर्ता | जुनैद एवं अन्य |
| प्रतिवादी | उत्तर प्रदेश राज्य एवं पुलिस प्रशासन |
| प्रकृति | बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) |
| मुख्य विवाद | जालसाजी के मामले में गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के पर्याप्त आधार (Grounds of Arrest) न देना और हाईकोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में जाली अरेस्ट मेमो लगाना। |
| अदालत के प्रमुख आदेश | 1. आरोपी की गिरफ्तारी को गैर-कानूनी मानते हुए रिहा करने का आदेश। 2. रजिस्ट्रार जनरल को पुलिस के खिलाफ पेरजुरी (Perjury) जांच और आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज करने का निर्देश। |

