मामले की पृष्ठभूमि और वंशावली: क्या था पूरा विवाद?
- पैतृक संपत्ति का इतिहास:दिवंगत नारायण विनायक जोशी के पास दो पैतृक भूखंड (गट नं. 27 और 28) थे। उनके बेटे शंकर जोशी का 1991 में निधन हो गया, जिनके पीछे उनकी पत्नी शकुंतला, बेटा शेखर (भाई) और बेटी अनीता (बहन) रह गए। 1991 में म्यूटेशन रिकॉर्ड में तीनों (मां, बेटा, बेटी) के नाम दर्ज हुए।
- 1991 का शपथ पत्र और 1993 का बंटवारा:अनीता ने 1991 में एक एफिडेविट देकर म्यूटेशन रिकॉर्ड से अपना नाम हटवा लिया (अनीता का आरोप था कि उसे फल व्यवसाय के सरकारी कागजात का झांसा देकर हस्ताक्षर कराए गए थे)। 1993 में पारिवारिक बंटवारे के तहत गट नं. 28 चचेरे भाई सुहास को दे दिया गया, जबकि गट नं. 27 (घर सहित) शंकर के वारिसों (शकुंतला, शेखर और अनीता) के पास रहा।
- 2013 का त्याग पत्र (Relinquishment Deed) और विवाद:25 मार्च 2013 को मां शकुंतला ने अपना 1/3 हिस्सा अपने बेटे शेखर के नाम पंजीकृत ‘त्याग पत्र’ के जरिए हस्तांतरित कर दिया। इसके आधार पर शेखर ने गट नं. 27 पर पूर्ण स्वामित्व का दावा करते हुए अनीता को बेदखल करने की कोशिश की, जिसके बाद अनीता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. “मौखिक त्याग संभव है, लेकिन इसे साबित करना अनिवार्य है”:
न्यायमूर्ति संदीप वी. मारणे ने स्पष्ट किया कि संयुक्त हिंदू परिवार या पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से का त्याग (Relinquishment) बिना किसी लिखित या पंजीकृत दस्तावेज के मौखिक रूप से भी किया जा सकता है। हालांकि: “केवल कानूनन मौखिक त्याग को स्वीकार करना एक बात है, और यह साबित करना कि वास्तव में मौखिक त्याग हुआ था, एक अलग अवधारणा है। इसे साबित करने की पूरी जिम्मेदारी दावा करने वाले (भाई) पर होती है।”
- कोर्ट ने पाया कि शेखर अपने लिखित बयान में वह तारीख, समय या स्थान बताने में पूरी तरह विफल रहा जहां अनीता ने कथित तौर पर अपना हिस्सा छोड़ा था।
2. म्यूटेशन रिकॉर्ड से नाम हटना हक की समाप्ति नहीं:
- हाईकोर्ट ने माना कि 1991 का एफिडेविट केवल राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटाने के लिए था। उसमें संपत्ति के अधिकार त्यागने का कोई उल्लेख नहीं था। केवल रेवेन्यू रिकॉर्ड्स से नाम हटाने की सहमति देने से अधिकार समाप्त नहीं होते।
3. दूसरे हिस्सेदार का हक स्वीकारना अपना हक छोड़ना नहीं:
- शेखर का तर्क था कि चूंकि अनीता ने गट नं. 28 चचेरे भाई सुहास को दिए जाने पर विरोध नहीं किया, इसलिए उसने अपना हिस्सा छोड़ दिया था। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि किसी अन्य सह-दावेदार (Coparcener) का हिस्सा स्वीकार करना और अपने स्वयं के हिस्से का त्याग करना दो पूरी तरह से अलग बातें हैं।
4. मां के हिस्से (Relinquishment Deed) की वैधता:
- ट्रायल कोर्ट ने शुरू में अनीता को आधा (1/2) हिस्सा दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि मां शकुंतला द्वारा 2013 में बेटे शेखर के पक्ष में किया गया ‘रिंलिंकविशमेंट डीड’ पूरी तरह वैध था। इसलिए मां का 1/3 हिस्सा शेखर को मिला।
अदालत का अंतिम आदेश और संपत्ति का विभाजन
- हाईकोर्ट ने माना कि शेखर अपनी बहन द्वारा मौखिक अधिकार त्याग (Oral Relinquishment) के दावे को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
- अंतिम शेयर विभाजन:
- अनीता (बहन): 1/3 हिस्सा (पैतृक संपत्ति का अपना मूल अधिकार)।
- शेखर (भाई): 2/3 हिस्सा (1/3 अपना मूल हिस्सा + 1/3 मां शकुंतला से वैध डीड द्वारा प्राप्त हिस्सा)।
मुंबई: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) के तहत संयुक्त हिंदू परिवार (HUF) की पैतृक संपत्ति में सहदायिक अधिकार (Coparcenary Rights), राजस्व अभिलेखों (Mutation/Revenue Records) में प्रविष्टि या नाम हटाने का विधिक प्रभाव, मौखिक हक त्याग (Oral Relinquishment of Share) की वैधता बनाम उसे सिद्ध करने का भार (Burden of Proof), पंजीकृत त्याग विलेख (Registered Relinquishment Deed), तथा परिवार विभाजन में किसी अन्य सहदायिक के हिस्से को मान्यता देने बनाम स्वयं के अधिकार परित्याग के विधिक अंतर पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने संपत्ति कानून का एक नजीरपरक फैसला सुनाया है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संदीप वी. मारणे (Justice Sandeep V. Marne) की एकल पीठ ने प्रथम अपीलीय अदालत के निर्णय की पुष्टि करते हुए व्यवस्था दी कि पैतृक संपत्ति (गट नंबर 27) में बहन अनीता अपने 1/3 हिस्से (One-Third Share) की कानूनी हकदार है, जबकि भाई शेखर को माता द्वारा निष्पादित पंजीकृत त्याग विलेख के आधार पर 2/3 हिस्सा (Two-Third Share) मिलेगा।
उच्च न्यायालय ने भाई की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें उसने दावा किया था कि बहन ने 1991 के हलफनामे और मौखिक सहमति के आधार पर अपना हिस्सा छोड़ दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड से केवल नाम हटाने की सहमति देना संपत्ति पर मालिकाना हक (Title) छोड़ने के समान नहीं माना जा सकता।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. संयुक्त परिवार की संपत्ति में ‘मौखिक त्याग’ मान्य, किंतु साबित करने का कड़ा दायित्व
न्यायमूर्ति संदीप वी. मारणे ने सहदायिक संपत्ति में मौखिक त्याग के कानून का विश्लेषण करते हुए व्यवस्था दी: “संयुक्त परिवार की संपत्ति में अन्य सहदायिकी के पक्ष में अपने हित का त्याग करने के लिए हमेशा किसी लिखित या पंजीकृत विलेख का होना अनिवार्य नहीं है। ऐसा परित्याग अपनी स्पष्ट मंशा व्यक्त करके मौखिक रूप से भी किया जा सकता है। हालाँकि, यह व्यवस्था केवल संयुक्त परिवार की संपत्तियों में अपने हिस्से के त्याग तक ही सीमित रहेगी; निर्वसीयती उत्तराधिकार (Intestate Succession) के माध्यम से प्राप्त स्व-अर्जित संपत्ति पर यह लागू नहीं होगी। मौखिक त्याग के विधिक प्रभाव को मान्यता देना एक बात है, किंतु वास्तव में ऐसा मौखिक त्याग घटित हुआ था (Factum of Oral Relinquishment), इसे साबित करने का दायित्व पूरी तरह उस व्यक्ति पर है जो ऐसा दावा कर रहा है।”
अदालत ने पाया कि शेखर ने अपने लिखित बयान (Written Statement) में उस कथित मौखिक त्याग की तारीख, समय या स्थान का कोई विशिष्ट विवरण नहीं दिया, और न ही अपने कथन के समर्थन में किसी स्वतंत्र गवाह की गवाही कराई।
2. राजस्व अभिलेख (Mutation) से नाम हटाने का हलफनामा ‘हक त्याग’ नहीं:
- अदालत ने 1991 के उस हलफनामे की जांच की जिसके आधार पर अनीता का नाम गट नंबर 27 और 28 से हटाया गया था।
- पीठ ने पाया कि हलफनामे में केवल राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटाने की सहमति दी गई थी; उसमें संपत्ति का हिस्सा छोड़ने या किसी मौखिक त्याग का कोई उल्लेख नहीं था।
- अदालत ने दोहराया कि राजस्व प्रविष्टियां केवल वित्तीय/कर वसूली उद्देश्यों के लिए होती हैं, वे किसी व्यक्ति के संपत्ति स्वत्व (Title) का सृजन या विनाश नहीं करतीं।
3. अन्य सहदायिक का हिस्सा स्वीकार करना ‘स्वयं के हिस्से का परित्याग’ नहीं:
- भाई ने तर्क दिया था कि चूंकि अनीता ने गट नंबर 28 को चचेरे भाई सुहास के हिस्से में जाने पर कोई आपत्ति नहीं की और 1991 से 2015 तक चुप रही, इसलिए उसने गट नंबर 27 का हिस्सा भी छोड़ दिया था।
- हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा:“संयुक्त परिवार की संपत्ति में किसी चचेरे भाई (अन्य सहदायिक) के हिस्से को स्वीकार करना, वादी (अनीता) द्वारा उस संपत्ति में से अपने स्वयं के हिस्से का परित्याग करने से बिल्कुल भिन्न अवधारणा है। किसी अन्य सहदायिक के हिस्से को मान्यता देने को अपने हिस्से का त्याग नहीं माना जा सकता।”
4. माता का पंजीकृत त्याग विलेख (2013) वैध: 1/3 बनाम 2/3 का विभाजन:
- ट्रायल कोर्ट ने अनीता और शेखर को 1/2 – 1/2 हिस्सा दिया था। किंतु अपीलीय अदालत ने पाया कि माता शकुंतला द्वारा 25 मार्च 2013 को बेटे शेखर के पक्ष में निष्पादित किया गया पंजीकृत त्याग विलेख (Registered Relinquishment Deed) वैध और बाध्यकारी था।
- शेखर ने इस विलेख को साबित करने के लिए पड़ोसी जमीन (गट नंबर 29/1) के मालिक और अनीता के दूर के चचेरे भाई को गवाह के रूप में पेश किया, जिसने पुष्टि की कि माता मृत्यु से पूर्व पूर्णतः स्वस्थ मानसिक स्थिति में थीं।
- परिणामस्वरूप, शंकर जोशी की शाखा के 3 हिस्सों (माता, बेटा, बेटी) में से माता का 1/3 हिस्सा शेखर के 1/3 हिस्से में जुड़ गया, जिससे शेखर को 2/3 और अनीता को 1/3 हिस्सा मिला।
मामले की पारिवारिक वंशावली एवं तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
| चरण / संपत्ति विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मूल संपत्ति | नारायण विनायक जोशी के स्वामित्व वाली दो पैतृक भूमियां: गट नंबर 27 (जिसमें पारिवारिक मकान बना था) और गट नंबर 28। |
| प्रारंभिक नामांतरण (30.03.1991) | शंकर जोशी के निधन के बाद दोनों संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड में शकुंतला (पत्नी), शेखर (पुत्र) और अनीता (पुत्री) के नाम दर्ज हुए। |
| 1991 का विवादित हलफनामा | अनीता ने एक हलफनामे पर हस्ताक्षर किए जिसके आधार पर उसका नाम दोनों गटों से हटा दिया गया। अनीता का तर्क था कि फलों के व्यापारिक सौदे के नाम पर गुमराह कर उसके हस्ताक्षर लिए गए थे। |
| 1993 का पारिवारिक विभाजन | 25 जून 1993 को पंजीकृत विभाजन विलेख के जरिए चचेरे भाई सुहास जोशी को गट नंबर 28 दे दिया गया। गट नंबर 27 (मकान सहित) शंकर जोशी के वारिसों (शकुंतला, शेखर, अनीता) के पास रहा, जहाँ अनीता निवास करती रही। |
| 2013 का विवाद | 25 मार्च 2013 को माता शकुंतला ने अपने हिस्से का पंजीकृत त्याग विलेख बेटे शेखर के पक्ष में निष्पादित किया। इसके आधार पर शेखर ने पूरी संपत्ति पर अनन्य स्वामित्व का दावा कर बहन को बेदखल करने की कोशिश की। |
| अदालती निर्णय (20.08.2026) | बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपील खारिज की; बहन अनीता के 1/3 हिस्से और भाई शेखर के 2/3 हिस्से के अपीलीय बंटवारे को अंतिम रूप से बहाल रखा। |
प्रक्रियात्मक कालक्रम: 1991 से 2026 तक का न्यायिक सफर
विधिक एवं संपत्ति न्यायशास्त्र: सहदायिकी में मौखिक त्याग के आवश्यक तत्व
- ‘मौखिक त्याग’ का विधिक मानक:
- हिंदू विधि के तहत किसी सहदायिक द्वारा संयुक्त परिवार की संपत्ति में अपने अविभाजित हित का त्याग करने के लिए पंजीकरण अधिनियम की धारा 17 के तहत अनिवार्य पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती, यदि वह त्याग स्पष्ट मंशा के साथ अन्य सभी सहदायिकी के हित में किया गया हो।
- किंतु, ऐसा दावा करने वाले व्यक्ति पर यह साबित करने की भारी जिम्मेदारी होती है कि त्याग स्वेच्छा से, बिना किसी कपट के और पूर्ण संज्ञान के साथ किया गया था।
- म्यूटेशन रिकॉर्ड्स और विधिक अधिकार:
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (सवाई राम बनाम फूलचंद एवं जितेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य) के अनुसार, राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना स्वामित्व का सबूत नहीं है और न ही नाम कटना स्वत्व की समाप्ति है। जब तक कोई व्यक्ति पंजीकृत रिलीज डीड या स्पष्ट विधिक विलेख के माध्यम से अपने अधिकारों का परित्याग न करे, तब तक उसका पैतृक सहदायिक अधिकार अक्षुण्ण रहता है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: द्वितीय अपील – शेखर जोशी बनाम अनीता [बॉम्बे उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति संदीप वी. मारणे (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026
- संबद्ध विषय: पैतृक संपत्ति का विभाजन, सहदायिकी अधिकार, मौखिक त्याग (Oral Relinquishment), म्यूटेशन रिकॉर्ड से नाम विलोपन, एवं पंजीकृत त्याग विलेख
विधिक प्रतिनिधित्व:
- वादी/प्रत्यर्थी (अनीता) की ओर से: अधिवक्ता रोहित जोशी (Advocate Rohit Joshi)
- अपीलकर्ता (शेखर) की ओर से: निजी अधिवक्ता
- प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 — धारा 6 (सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों के समानांतर अधिकार) एवं धारा 8 (निर्वसीयती उत्तराधिकार के सामान्य नियम)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 — धारा 101-103 (सबूत का भार)
- पंजीकरण अधिनियम, 1908 — धारा 17 (अनिवार्य पंजीकृत दस्तावेज) एवं धारा 49
- महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता, 1966 — नामांतरण एवं अधिकार अभिलेख (Record of Rights)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पैतृक संपत्ति में मौखिक त्याग और म्यूटेशन का प्रभाव: ‘संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में मौखिक हक त्याग कानूनन संभव है, किंतु इसका दावा करने वाले पक्षकार को इसके तथ्य, समय और स्थान को ठोस साक्ष्यों से साबित करना होगा; राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटाने के लिए दिया गया हलफनामा या किसी अन्य सहदायिक का हिस्सा स्वीकार करना अपने स्वयं के हिस्से के त्याग का साक्ष्य नहीं माना जा सकता।’
- अंतिम परिणाम: द्वितीय अपील का निस्तारण; प्रथम अपीलीय अदालत का आदेश पूर्णतः बरकरार; पैतृक भूमि गट नंबर 27 (आवासीय मकान सहित) में अनीता को 1/3 हिस्सा और शेखर को 2/3 हिस्सा प्रदान करने का डिक्री आदेश अंतिम रूप से प्रभावी।
Share of Property: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संदीप वी. मारणे |
| पक्षकार | अनीता (बहन / वादी) बनाम शेखर (भाई / प्रतिवादी) |
| विवादित संपत्ति | गट नं. 27 (Gat No. 27) – पैतृक भूमि और मकान |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटाना या मौखिक सहमति पैतृक संपत्ति से अधिकार त्याग (Oral Relinquishment) माना जाएगा? |
| अदालत का फैसला | अनीता के पक्ष में निर्णय; गट नं. 27 में अनीता को 1/3rd हिस्सा तथा मां का हिस्सा पाने वाले भाई शेखर को 2/3rd हिस्सा मिला। |

