मामले की पृष्ठभूमि: क्या है पूरा विवाद?
- डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिका:याचिकाकर्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि देश में इलाज के अत्यधिक खर्च और अस्पतालों द्वारा दवाओं व उपकरणों पर वसूले जाने वाले अनुचित मार्जिन के कारण हर साल लाखों परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।
- ग्लोबल हब बनाम घरेलू शोषण का विरोधाभास:केंद्र सरकार के हलफनामे ने भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की इस विडंबना को उजागर किया कि भारत दुनिया भर में सस्ती दवाओं का निर्माण करने वाला सबसे बड़ा केंद्र (Global Hub) है, फिर भी देश के भीतर अस्पताल में भर्ती होने पर मरीजों को बेहद महंगी दरों पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
हलफनामे के मुख्य बिंदु और कानूनी/प्रशासनिक तर्क
1. “सूचना का अभाव और मोलभाव में असमानता (Information & Bargaining Asymmetry)”:
मंत्रालय ने हलफनामे में स्वीकार किया कि अस्पताल परिसर के भीतर मरीज अत्यंत संवेदनशील और लाचार स्थिति में होता है: “मरीजों को जेनेरिक/सस्ते विकल्पों और वास्तविक बाजार मूल्यों की जानकारी नहीं होती है। इस कारण वे अस्पतालों के शोषक बिलिंग तंत्र (Predatory Billing Practices) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।”
2. अस्पतालों द्वारा अधिक मार्जिन वाली दवाओं को प्राथमिकता:
- सरकार ने पाया कि खुले बाजार में दवा उद्योग में बहुत प्रतिस्पर्धा है, लेकिन अस्पताल केवल उन्हीं दवाओं और ब्रांडों को खरीदते/लिखते हैं जिन पर उन्हें सबसे अधिक ट्रेड मार्जिन (Trade Margin) मिलता है।
- कुछ कैंसर-रोधी दवाओं पर यह मार्जिन 170% से 700% तक पाया गया है, जबकि मेडिकल कंज्यूमेबल्स (जैसे दस्ताने, सिरिंज, पट्टियां आदि) पर यह मार्जिन 100% से 1,000% तक पहुँच जाता है।
3. जेब से खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) करने वाले मरीजों पर मार:
- सरकार ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियों या सरकारी योजनाओं के तहत आने वाले मरीजों के लिए अस्पताल दरें घटा देते हैं, लेकिन अपनी जेब से भुगतान करने वाले आम मध्यमवर्गीय और गरीब मरीजों से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) की पूरी दर वसूली जाती है।
नियामक हस्तक्षेप (Regulatory Action) की ओर कदम
- विद्यमान नियंत्रण: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के माध्यम से अब तक 935 निर्धारित फॉर्मूलेशन का मूल्य तय किया गया है और 3,881 नई दवाओं के खुदरा मूल्य कैप किए गए हैं।
- भविष्य की योजना: केंद्र सरकार ने न्यायालय को आश्वस्त किया है कि वह अस्पतालों और मरीजों के बीच मूल्य निर्धारण के इस असंतुलन को समाप्त करने के लिए सभी हितधारकों (Stakeholders) के साथ विचार-विमर्श कर रही है और अस्पतालों में दवाओं/कंज्यूमेबल्स की कीमतों पर प्रभावी सीमा (Price Cap) तय करने के लिए एक सख्त कानूनी ढांचा तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है।
नई दिल्ली: आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955), औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO, 2013), राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की विनियामक शक्तियां, भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन का मौलिक अधिकार), तथा निजी व कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा इन-पेशेंट (IPD) बिलिंग में ‘सूचना और सौदेबाजी की विषमता’ (Information and Bargaining Asymmetry) का अनुचित लाभ उठाकर दवाओं व मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर 1,000% तक का मुनाफा वसूलने की प्रवृत्ति पर केंद्र सरकार ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अभूतपूर्व हलफनामा प्रस्तुत किया है।
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (औषधि विभाग) द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर आधिकारिक हलफनामे में केंद्र सरकार ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया है कि देश के निजी अस्पताल दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स (सिरिंज, कैथेटर, दस्ताने, कैनुला, कॉटन आदि) के लिए मरीजों से वास्तविक विनिर्माण लागत (Manufacturing Cost) और थोक खरीद मूल्य की तुलना में कई गुना अधिक दरें वसूल रहे हैं, जो सीधे तौर पर कदाचार (Malpractice) और शोषणकारी मूल्य निर्धारण की श्रेणी में आता है।
सरकार ने अदालत को अवगत कराया कि वह अस्पतालों के इस संस्थागत एकाधिकार और अनुचित लाभ को समाप्त करने के लिए मूल्य सीमा (Price Caps) और व्यापक विनियामक हस्तक्षेप (Regulatory Interventions) पर सक्रिय रूप से काम कर रही है।
केंद्र सरकार के हलफनामे के मुख्य अंश एवं विधिक स्वीकारोक्ति
1. ‘सस्ती दवाओं का वैश्विक केंद्र भारत, लेकिन अस्पतालों में मरीज बंधक’
मंत्रालय ने अपने हलफनामे में भारतीय स्वास्थ्य परिदृश्य की विडंबना को उजागर करते हुए कहा:
- भारत वैश्विक स्तर पर जेनेरिक और किफायती दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है, तथा खुले खुदरा बाजार में प्रतिस्पर्धा के कारण दवाएं बहुत कम दरों पर उपलब्ध हैं।
- तथापि, जैसे ही कोई मरीज अस्पताल के भीतर भर्ती होता है, खुले बाजार की यह प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा तंत्र पूरी तरह टूट जाता है। अस्पताल अपनी इन-हाउस फार्मेसी के जरिए मरीजों को अपनी तयशुदा दरों पर ही दवाएं और सर्जिकल उपकरण खरीदने के लिए बाध्य करते हैं।
2. दवाओं पर 170% से 700% और कंज्यूमेबल्स पर 1,000% तक का ‘ट्रेड मार्जिन’:
- सरकार ने स्वीकार किया कि अस्पताल थोक स्तर पर दवा कंपनियों से भारी छूट पर दवाएं खरीदते हैं, किंतु खरीद के समय कम कीमत वाली दवाओं के स्थान पर अधिकतम ट्रेड मार्जिन (Trade Margin) देने वाली कंपनियों के उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं।
- कुछ जीवन-रक्षक और कैंसर-रोधी दवाओं (Anti-cancer drugs) के मामलों में यह मार्कअप 170% से 700% तक होता है।
- मेडिकल कंज्यूमेबल्स (डिस्पोजेबल वस्तुएं, सर्जिकल किट आदि) में स्थिति और भी भयावह है, जहां खरीद लागत से 100% से लेकर 1,000% तक अधिक मूल्य (MRP के नाम पर) मरीजों के बिल में जोड़ा जा रहा है।
3. ‘सूचना और सौदेबाजी की विषमता’ (Bargaining Asymmetry) का शिकार आम जनता:
- हलफनामे में रेखांकित किया गया कि अस्पताल और मरीज के रिश्ते में मरीज अत्यंत लाचार और कमजोर स्थिति (Vulnerable Position) में होता है।
- मरीज या उसके परिजनों को किसी दवा के सस्ते जेनेरिक विकल्पों (Substitutes) या बाजार के वास्तविक मूल्य का तकनीकी ज्ञान नहीं होता।
- जहां बीमाधारक या सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत) के तहत आने वाले मरीजों के लिए दरें पहले से अनुबंधित होती हैं, वहीं अपनी जेब से भुगतान करने वाले आम मध्यमवर्गीय व गरीब मरीज (Out-of-Pocket Expenditure) सीधे तौर पर इस ‘शिकारी मूल्य निर्धारण’ (Predatory Billing) की मार झेलते हैं।
4. सरकार द्वारा अब तक के कदम और भविष्य की विनियामक योजना:
- सरकार ने अदालत को बताया कि उसने अब तक 935 शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन (Scheduled Formulations) पर मूल्य सीमा (Ceiling Prices) तय की है तथा 3,881 नई दवाओं के लिए अधिकतम खुदरा मूल्य निर्धारित किए हैं।
- वर्तमान में सरकार सभी हितधारकों (हितबद्ध पक्षों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, दवा निर्माताओं) के साथ परामर्श कर रही है ताकि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले सभी मेडिकल उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों पर ट्रेड मार्जिन को सीमित करने हेतु एक व्यापक कानूनी ढांचा विकसित किया जा सके।
तथ्यात्मक संरचना एवं लाभ मार्जिन का विश्लेषण
| श्रेणी / मद | थोक/विनिर्माण लागत बनाम अस्पताल बिलिंग | सरकारी स्वीकारोक्ति एवं प्रभाव |
|---|---|---|
| कैंसर व जीवनरक्षक दवाएं | अस्पताल खरीद मूल्य से 170% से 700% अधिक वसूलते हैं। | अस्पतालों द्वारा कम कीमत वाली दवाओं के स्थान पर अधिक मार्जिन देने वाले ब्रांडों को चुना जाता है। |
| मेडिकल कंज्यूमेबल्स (सिरिंज, कैथेटर, दस्ताने आदि) | वास्तविक खरीद लागत से 100% से 1,000% तक अधिक मूल्य पर बिलिंग। | साधारण सर्जिकल डिस्पोजेबल्स के नाम पर कुल बिल का 20% से 40% तक अनावश्यक रूप से बढ़ा दिया जाता है। |
| निजी जेब से भुगतान (Out-of-Pocket) | बीमा कवर से बाहर के मरीजों से पूरी MRP वसूली जाती है। | देश में प्रत्येक वर्ष लाखों परिवार गंभीर बीमारी के इलाज के भारी खर्च के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। |
| मौजूदा विनियामक नियंत्रण | NPPA द्वारा 935 शेड्यूल्ड फॉर्मूलेशन और 3,881 दवाओं का मूल्य निर्धारण। | अब गैर-शेड्यूल्ड दवाओं और कंज्यूमेबल्स के ट्रेड मार्जिन पर सीमा (Cap) लगाने की तैयारी। |
प्रक्रियात्मक कालक्रम एवं जनहित याचिका (PIL) का सफर
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
|---|---|
| याचिकाकर्ता | डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ — जनहित याचिकाकर्ता (चिकित्सक व जन-अधिकार कार्यकर्ता)। |
| याचिका का आधार | भारत में उच्च स्वास्थ्य व्यय के कारण प्रतिवर्ष करोड़ों नागरिक अत्यधिक ऋण और गरीबी के दुष्चक्र में फंसते हैं। याचिका में मांग की गई कि जीवन रक्षक दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और अस्पताल की उपभोग्य सामग्रियों की कीमतें विनिर्माण लागत के आधार पर तर्कसंगत रूप से तय की जाएं। |
| संबद्ध मंत्रालय | रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (औषधि विभाग), भारत सरकार। |
| अदालत के समक्ष स्वीकारोक्ति | सरकार ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को सही माना और औपचारिक रूप से दर्ज किया कि अस्पतालों द्वारा मरीजों से वसूले जाने वाले अत्यधिक मार्जिन वास्तव में एक ‘कदाचार’ (Malpractice) हैं। |
| भावी विनियामक कदम | सरकार दवाओं और कंज्यूमेबल्स के ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने के लिए मसौदा नीति तैयार कर रही है, जिसकी अंतिम रूपरेखा शीघ्र ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी जाएगी। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: स्वास्थ्य का अधिकार और राज्य का कल्याणकारी दायित्व
- सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक नजीरें — स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health):
- सर्वोच्च न्यायालय ने परमानंद कटारा बनाम भारत संघ [(1989) 4 SCC 286] और पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य [(1996) 4 SCC 37] में स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का वास्तविक अर्थ गरिमापूर्ण जीवन है, जिसमें समय पर और किफायती स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करना शामिल है।
- आपात स्थिति या अस्पताल में भर्ती होने पर मरीज के पास अन्य विकल्प चुनने की स्वतंत्रता नहीं होती; ऐसे में अस्पताल द्वारा अनैतिक मुनाफाखोरी अनुच्छेद 21 की मूल भावना पर सीधा आघात है।
- औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 का पैरा 19:
- सरकार के पास DPCO, 2013 के पैरा 19 के तहत असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखते हुए किसी भी गैर-शेड्यूल्ड दवा या मेडिकल डिवाइस की कीमत को विनियमित करने की आपातकालीन वैधानिक शक्तियां (Emergency Powers) मौजूद हैं।
- पूर्व में सरकार ने इसी प्रावधान का उपयोग कर ‘कार्डियक स्टेंट’ (Cardiac Stents) और ‘घुटने के प्रत्यारोपण’ (Knee Implants) के मूल्यों पर 70% से 85% तक की ऐतिहासिक कटौती लागू की थी। वर्तमान हलफनामा यह संकेत देता है कि सरकार इसी प्रकार की ट्रेड मार्जिन कैपिंग अब सामान्य कंज्यूमेबल्स और कैंसर दवाओं पर भी लागू करने की दिशा में बढ़ रही है।
- उपभोक्ता शोषण और अनुचित व्यापार व्यवहार:
- जब कोई अस्पताल खुले बाजार में ₹10 में मिलने वाली सीरिंज के लिए अपने इन-हाउस मेडिकल स्टोर के जरिए मरीज से ₹100 वसूलता है, तो यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत भी ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ (Unfair Trade Practice) और ‘अतिशयोक्तिपूर्ण मूल्य निर्धारण’ का स्पष्ट मामला बनता है।
विधिक विवरण
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित याचिका क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सुप्रीम कोर्ट]
- शपथपत्र दाखिलकर्ता: रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (औषधि विभाग), भारत सरकार
- शपथपत्र दाखिल करने की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध विषय: अस्पतालों द्वारा दवाओं और कंज्यूमेबल्स पर अत्यधिक मुनाफाखोरी, ट्रेड मार्जिन कैपिंग, DPCO 2013 एवं अनुच्छेद 21
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 — धारा 3 (मूल्य नियंत्रण व वितरण विनियमन के आदेश)
- औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO) — पैरा 19 (असाधारण परिस्थितियों में कीमतों के निर्धारण हेतु केंद्र की शक्ति)
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 — धारा 2(47) (अनुचित व्यापार व्यवहार)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 38 व 47 (लोक स्वास्थ्य में सुधार और असमानताओं को कम करने का राज्य का कर्तव्य) एवं अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सस्ती चिकित्सा का अधिकार और मूल्य शोषण पर विधिक रोक: ‘अस्पतालों में भर्ती मरीजों की असहाय स्थिति का फायदा उठाकर दवाओं और उपभोग्य सामग्रियों पर 170% से 1000% तक का अनुचित ट्रेड मार्जिन वसूलना कदाचार है; राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह सूचना और सौदेबाजी की इस विषमता को समाप्त करने के लिए विनियामक मूल्य सीमाएं लागू करे ताकि स्वास्थ्य व्यय नागरिकों को आर्थिक विपन्नता की ओर न धकेले।’
- वर्तमान स्थिति: केंद्र सरकार ने आधिकारिक हलफनामे में कदाचार स्वीकार किया; सभी हितधारकों से विचार-विमर्श के बाद अस्पतालों के ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने और मूल्य कैपिंग हेतु विनियामक नीति तैयार करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है।
Hospital Overcharging: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| संबंधित मंत्रालय | रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, भारत सरकार |
| मूल याचिकाकर्ता | डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ (Dr. Sanjay Kulshrestha) |
| मुख्य मुद्दा | अस्पतालों द्वारा MRP का दुरुपयोग, दवाओं पर 170% से 700% और कंज्यूमेबल्स पर 1,000% तक का अत्यधिक प्रॉफिट मार्जिन वसूलना। |
| सरकार का रुख | अस्पतालों द्वारा अत्यधिक दाम वसूलना ‘मैलप्रैक्टिस’ है; सरकार प्राइस कैपिंग और नए नियम लागू करने पर विचार कर रही है। |
| मौजूदा मूल्य नियंत्रण | वर्तमान में 935 अनुसूचित फॉर्मूलेशन और 3,881 नई दवाओं के खुदरा मूल्य नियंत्रित हैं। |

