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पक्षों के मुख्य विधिक तर्क और आंकड़े
1. मूल याचिकाकर्ता का पक्ष (अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन):
- पूर्ण बैन की मांग: उन्होंने तर्क दिया कि 2015 से लंबित इस मामले में बेरियम पर प्रतिबंध, क्यूआर कोड और ऑनलाइन बिक्री रोक जैसे सभी आदेशों का बार-बार उल्लंघन हुआ है। दिल्ली के नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए केवल एक बार पूर्ण प्रतिबंध लगाकर रिपोर्ट मांगी जानी चाहिए।
- PM2.5 का घातक प्रभाव: उन्होंने बताया कि पटाखों से निकलने वाले सूक्ष्म PM2.5 कण इतने हल्के होते हैं कि हवा में छोड़े जाने पर उन्हें ज़मीन पर गिरने में एक महीने का समय लगता है। त्योहार के दौरान 2-3 दिनों की आतिशबाजी का यह प्रदूषण वातावरण में 3 महीने तक बना रहता है और दिल्ली के कुल वार्षिक प्रदूषण में 2% का योगदान देता है।
2. न्यायालय मित्र का पक्ष (वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर):
- प्रबोधन केंद्रों (AQI Stations) का अभाव: दिवाली 2025 के दौरान दिल्ली के 39 में से केवल 9 स्टेशनों ने ही लगातार आंकड़े दिए थे, जिससे वास्तविक प्रदूषण स्पाइक्स छिप गए।
- नकली ग्रीन क्रैकर्स: सीएक्यूएम (CAQM) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि बाज़ार में पारंपरिक पटाखों को ही ‘ग्रीन लेबल’ और फर्जी या न चलने वाले क्यूआर कोड (QR Codes) के तहत बेचा जा रहा है। ‘ग्रीन क्रैकर्स’ भी पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं।
3. पटाखा निर्माताओं का पक्ष (वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक):
- सख्त विनियमन का समर्थन: उन्होंने पूर्ण प्रतिबंध का विरोध करते हुए कहा कि पूर्ण रोक से केवल अवैध और चीनी पटाखों की तस्करी को बढ़ावा मिलता है।
- भौगोलिक तर्क: दिल्ली पूरे एनसीआर क्षेत्र (55,000 वर्ग किमी) का 3% से भी कम हिस्सा है, इसलिए पूरे एनसीआर में एक समान प्रतिबंध तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने CSIR-NEERI द्वारा विकसित कम उत्सर्जन वाले पटाखों के सख्त विनियमन की वकालत की। (कोर्ट ने दिवाली में केवल 10 दिन शेष रहने के कारण लाइसेंस बहाली की उनकी अर्जी को खारिज कर दिया)।
हाईकोर्ट/सुप्रीम COURT के मुख्य निष्कर्ष और भावी कार्ययोजना
1. “व्यापारियों और थोक विक्रेताओं पर कसें शिकंजा”:
अदालत ने स्वीकार किया कि इतने बड़े क्षेत्र में हर नागरिक की निगरानी कठिन है। इसलिए प्रशासन को आम जनता को परेशान करने के बजाय अवैध सप्लाई चेन, गोदामों और थोक व्यापारियों के लाइसेंस रद्द करने व अभियोजन (Prosecution) की कार्रवाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
2. “अनुच्छेद 25 बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य”:
न्यायामूर्ति सुंदरेश ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) सीधे तौर पर भाग-III के अन्य अधिकारों, विशेषकर सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के अधीन है। अदालत बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, रोगियों और बेजुबान पशु-पक्षियों के व्यापक हितों की अनदेखी नहीं कर सकती।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (प्रदूषण-मुक्त स्वच्छ वातावरण व जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार—जो लोक व्यवस्था, नैतिकता और ‘लोक स्वास्थ्य’ के संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन है), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) की धारा 5 व 15, दिल्ली-एनसीआर एवं समीपवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 (CAQM Act, 2021), तथा ऐतिहासिक अर्जुन गोपाल बनाम भारत संघ [(2018) 1 SCC 412] और एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1985–2026) के विधिक सिद्धांतों के तहत पटाखों के विनियामक क्रियान्वयन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा असंतोष व्यक्त किया है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) और न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले (Justice Prasanna B. Varale) की खंडपीठ ने गुरुवार (29 अक्टूबर 2026) को दिल्ली-एनसीआर में गंभीर होते वायु प्रदूषण और पटाखों पर प्रतिबंध के प्रवर्तन से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले [In Re: Curbing Air Pollution in the National Capital Region] की सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली प्रशासन द्वारा पिछले वर्ष (अक्टूबर 2025) में ग्रीन पटाखों की अस्थाई छूट दिए जाने के बाद जमीनी स्तर पर की गई प्रवर्तन कार्रवाइयों (Enforcement Data) का कोई व्यापक ब्योरा पेश न किए जाने पर तीखा आक्षेप किया। पीठ ने कहा कि यदि अदालती निर्देशों का क्रियान्वयन जमीन पर नहीं होता है, तो ऐसे आदेश “मात्र एक मजाक” (A Mere Mockery) बनकर रह जाते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि त्योहारों की जन-भावनाओं को देखते हुए वह इस चरण में ‘पूर्ण प्रतिबंध’ (Complete Blanket Ban) लगाने की इच्छुक नहीं है, किंतु प्रशासन की निष्क्रियता उसे कड़ा रुख अपनाने पर विवश कर सकती है। पीठ ने दो दिनों के भीतर औपचारिक अंतरिम आदेश पारित करने का संकेत दिया।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘प्रवर्तन डेटा कहाँ है? बिना अमल के आदेश केवल एक उपहास हैं’: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश
पीठ ने सरकारी तंत्र द्वारा कोर्ट में केवल आश्वासनों की औपचारिकता निभाने पर गहरी नाराजगी जताते हुए सीधे सवाल किए: *”क्या आपने प्रवर्तन दल (Enforcement Teams) बनाए? क्या आपने कोई जांच की? क्या आपने लाइसेंस धारकों के परिसरों की तलाशी ली? आपको वहां क्या मिला? आपने कितनी प्राथमिकी (FIRs) दर्ज कीं? आपने कितने अन्य मामले दर्ज किए? क्या आपने प्रतिबंधित सामग्री जब्त की? वास्तव में आपने किया क्या?
अन्यथा, जब तक आप जमीनी स्तर पर वास्तव में इसे प्रभावी नहीं करते, तब तक ऐसे आदेश पारित करने और निर्देश जारी करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। तब यह केवल एक उपहास/मजाक (A Mere Mockery) बनकर रह जाता है। प्रवर्तन डेटा अदालत में पेश नहीं किया गया है, जो आपको अनिवार्य रूप से दाखिल करना चाहिए था। जब तक लागू करने वाला तंत्र सक्रिय नहीं होगा, किसी भी आदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।”
2. ‘जनता की भावनाएं समझते हैं, पर हमें बहुत कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर न करें’:
- अदालत ने नागरिकों के त्योहार मनाने के उत्साह और स्वास्थ्य के बीच संतुलन का उल्लेख किया:*”हम जनता की भावनाओं को भी समझते हैं। जो कोई किसी अवसर का उत्सव मनाना चाहता है, यह उनके मनोबल को बढ़ाता है और सकारात्मकता लाता है। इसलिए, हम इस चरण में पूर्ण प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इसका उल्टा ‘स्पाइरलिंग प्रभाव’ (कालाबजारी व अवैध तस्करी) हो सकता है।किंतु इसके साथ ही, कृपया हमें इस मामले में बहुत कड़ा रुख (Very Hard Stand) अपनाने के लिए विवश न करें। आपको अपने अधिकारियों को मैदान में उतारना होगा ताकि वे देख सकें कि जमीन पर क्या चल रहा है। यदि आप चालान काटते हैं, कुछ लोगों पर सख्त कार्रवाई करते हैं, कुछ लाइसेंस रद्द करते हैं और मुकदमों की पैरवी करते हैं, तो चीजें स्वतः नियंत्रित होने लगेंगी।”
3. ‘कार्रवाई आम उपभोक्ता पर नहीं, बल्कि थोक विक्रेताओं और व्यापारियों पर केंद्रित हो’:
- पीठ ने माना कि दिल्ली-एनसीआर जैसे 55,000 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में हर घर की निगरानी करना व्यावहारिक रूप से असंभव है:
- प्रशासन को अपनी पूरी ताकत अवैध पटाखों के उत्पादकों, थोक विक्रेताओं और व्यापारियों (Sellers and Traders) पर लगानी चाहिए।
- यदि मुख्य सप्लायरों पर नकेल कसी जाएगी और उनके लाइसेंस रद्द होंगे, तो अवैध पटाखों की उपलब्धता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
4. ‘संविधान का अनुच्छेद 25 लोक स्वास्थ्य के अधीन है’:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धार्मिक आस्था का सम्मान है, किंतु यह निरपेक्ष नहीं हो सकता:“त्योहारों से जुड़ी सकारात्मकता अपनी जगह है, किंतु संविधान का अनुच्छेद 25 लोक स्वास्थ्य (Public Health) और भाग III के अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है। हमें बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों, गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों और यहाँ तक कि बेजुबान पशु-पक्षियों की भी चिंता करनी होगी।”
5. विराट कोहली जैसे रोल मॉडल्स और बच्चों के जरिए जागरूकता:
- न्यायमूर्ति वराले ने रेडियो और प्रिंट मीडिया पर प्रचार का उल्लेख किया, जबकि न्यायमूर्ति सुंदरेश ने समाज के रोल मॉडल्स को जोड़ने का सुझाव दिया:“आप विराट कोहली जैसे विख्यात क्रिकेटरों या प्रतिष्ठित जन-नायकों से एक संदेश रिकॉर्ड करने का अनुरोध क्यों नहीं करते कि ‘आइए इस दिवाली को आनंदमय बनाएं और रोशनी के मूल पर्व का आनंद लें’? मूल रूप से दिवाली दीपों का पर्व थी, बारूद तो 14वीं-15वीं सदी में आया। जब आग दिए में जलती है तो हम उसकी पूजा करते हैं, किंतु जब यह आतिशबाजी बनकर हवा को विषाक्त करती है तो यह निंदनीय है।शिक्षा विभाग को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह स्कूलों में बच्चों को जागरूक करे। आज की युवा पीढ़ी पटाखों के प्रति संशयवादी है; यदि बच्चे शिक्षित होंगे तो वे स्वयं अपने माता-पिता को पटाखे जलाने से रोकेंगे।”
सुनवाई में प्रस्तुत प्रमुख विधिक व तथ्यात्मक बिंदु
| पक्षकार / प्राधिकारी | मुख्य विधिक एवं तथ्यात्मक प्रस्तुतियां |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) — वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर | • 15 अक्टूबर 2025 के आदेश के तहत निर्धारित गश्ती दल, क्यूआर कोड जांच, औचक नमूने और सीपीसीबी द्वारा जल व रेत के नमूनों के परीक्षण की कोई समग्र रिपोर्ट नहीं सौंपी गई। • दिवाली 2025 की रात दिल्ली के 39 परिवेशीय वायु गुणवत्ता स्टेशनों में से केवल 9 स्टेशनों ने निरंतर डेटा दिया; प्रदूषण के पीक आवर्स का डेटा गायब था। • सीएक्यूएम (CAQM) की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार बाजार में बिकने वाले पटाखों की कोई फील्ड टेस्टिंग नहीं हो रही है; ग्रीन पटाखों के नाम पर पारंपरिक पटाखे बेचे जा रहे हैं और उनके QR कोड फर्जी या गैर-कार्यात्मक हैं। |
| याचिकाकर्ता की ओर से — वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन | • 2015 से सुप्रीम कोर्ट के बेरियम प्रतिबंध, ऑनलाइन बिक्री रोक और परिवहन निषेध के आदेशों की लगातार धज्जियां उड़ाई जा रही हैं (सीबीआई रिपोर्ट में भी अवैध बेरियम का खुलासा हुआ था)। • PM2.5 का वैज्ञानिक प्रभाव: अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण यदि एक PM2.5 कण ऊपर से गिरे तो उसे जमीन पर आने में एक महीना लगता है; दिवाली के दो-तीन दिनों के पटाखों का जहर हवा में तीन महीने तक बना रहता है, जो दिल्ली के वार्षिक प्रदूषण में अकेले 2% का योगदान देता है। • मांग: दिल्लीवासियों के फेफड़ों की रक्षा के लिए कम से कम एक बार पूर्ण प्रतिबंध को सख्ती से लागू कर रिपोर्ट मांगी जाए। |
| पटाखा निर्माता संघ — वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक | • पूर्ण प्रतिबंध जमीनी स्तर पर विफल रहता है और इसके कारण अवैध, बिना लाइसेंस वाले और चीनी पटाखों की बाढ़ आ जाती है; अतः पूर्ण प्रतिबंध के बजाय ‘सख्त विनियामक ढांचा’ आवश्यक है। • संपूर्ण 55,000 वर्ग किमी के एनसीआर में दिल्ली का क्षेत्रफल 3% से भी कम है, अतः पूरे क्षेत्र पर एक समान कठोर प्रतिबंध लगाना अनुचित है। • नीरी (CSIR-NEERI) के प्रमाणित ग्रीन पटाखों को सख्त निगरानी में अनुमति दी जाए। • लाइसेंस बहाली की प्रार्थना: निर्माताओं के रद्द लाइसेंस बहाल करने की मांग को पीठ ने यह कहकर खारिज कर दिया कि दिवाली में मात्र 10 दिन शेष हैं, अब बहुत देर हो चुकी है। |
| अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) — ऐश्वर्या भाटी | • स्वीकार किया कि पटाखों के जलने से एक्यूआई (AQI) में तीव्र वृद्धि के प्रमाण मिले हैं। • यह भी स्वीकार किया कि पिछले साल की विस्तृत प्रवर्तन रिपोर्ट और कानूनी कार्रवाइयों का डेटा अदालत में पेश नहीं किया जा सका है। |
मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं न्यायिक कालक्रम (1985–2026)
- ‘एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ’ का पुनर्गठन (मार्च 2026):
- सर्वोच्च न्यायालय ने 1985 से लंबित ऐतिहासिक जनहित याचिका को औपचारिक रूप से समाप्त करते हुए इसके विभिन्न अंगों (पराली दहन, ठोस अपशिष्ट और आतिशबाजी) को अलग-अलग विषयगत स्वतः संज्ञान याचिकाओं में विभाजित किया था, ताकि निगरानी अधिक प्रभावी हो सके।
- नगर निगम ठोस कचरा और पराली दहन पर पूर्व आदेश:
- पीठ ने पूर्व में दर्ज किया था कि दिल्ली का 3,000 टन ठोस कचरा प्रतिदिन बिना उपचार के पड़ा रहता है; जिसके लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के नियम 4 का कड़ाई से पालन करने और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धारा 15 के तहत दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
- पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ आपराधिक और पर्यावरण क्षतिपूर्ति के निर्देश जस्टिस अभय ओक और जस्टिस बी.आर. गवई की पीठों द्वारा दिए जा चुके हैं।
- बेरियम आधारित पटाखों पर विधिक स्थिति:
- बेरियम नाइट्रेट युक्त पटाखों के अत्यधिक जहरीले धुएं के कारण अदालत ने इसके उपयोग को स्थगित रखा है; केंद्र सरकार द्वारा आंतरिक विमर्श हेतु समय मांगे जाने के कारण बेरियम का मुद्दा 3 सप्ताह के लिए टाल दिया गया है।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘न्यायिक आदेशों की प्रभावकारिता और सतत न्यूनीकरण’
- ‘आदेशों का मजाक’ (Erosion of Judicial Authority):
- भारत के संवैधानिक ढांचे में न्यायालय केवल नीति या दिशा-निर्देश तय कर सकते हैं, किंतु उन्हें जमीन पर उतारने का दायित्व कार्यपालिका (पुलिस, नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) का होता है।
- जब अदालत को यह पता चलता है कि उसके आदेशों के बावजूद न तो अवैध पटाखा विक्रेताओं के चालान कटे, न ही अवैध गोदाम सील हुए और न ही दिवाली की रात वायु निगरानी तंत्र सक्रिय रहा, तो यह संवैधानिक व्यवस्था के चरमराने का संकेत है। न्यायमूर्ति सुंदरेश की यह टिप्पणी कार्यपालिका की आपराधिक शिथिलता पर सीधी जवाबदेही तय करती है।
- क्रमिक कमी का व्यावहारिक मॉडल (Sustained Reduction):
- अदालत ने यह व्यावहारिक यथार्थ स्वीकार किया कि सदियों पुरानी प्रथाओं और जन-मानस की आदतों को एक ही दिन में कानून के डंडे से नहीं बदला जा सकता।
- इसलिए, अदालत ने एक ‘सतत प्रक्रिया’ अपनाने का आह्वान किया—जिसमें पहले वर्ष कम से कम 25% प्रदूषण घटाने का लक्ष्य रखा जाए, उसके बाद के वर्षों में इसे 30% और 40% तक ले जाया जाए। इसके लिए जरूरी है कि प्रदूषण नियंत्रण को केवल दिवाली के समय का ‘वार्षिक कर्मकांड’ न बनाकर वर्ष भर चलने वाला प्रशासनिक अभियान बनाया जाए।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक जनहित क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: इन री: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण की रोकथाम – ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, पराली दहन और पटाखे [Suo Motu Writ Petition (Civil) No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले
- सुनवाई की तिथि: 29 अक्टूबर 2026
- भावी कार्यवाही: 2-3 दिनों के भीतर औपचारिक अंतरिम आदेश पारित किया जाएगा।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर (Senior Advocate Uttara Babbar)।
- मूल याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Senior Advocate Gopal Sankaranarayanan)।
- केंद्र सरकार एवं दिल्ली प्रशासन की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी (Additional Solicitor General Aishwarya Bhati)।
- पटाखा निर्माता एवं व्यापार संघ की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक (Senior Advocate J. Sai Deepak)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता—स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता—लोक स्वास्थ्य के प्रतिबंधों के अधीन)
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) — धारा 5 (निर्देश जारी करने की शक्ति) एवं धारा 15 (उल्लंघन पर दंड)
- दिल्ली-एनसीआर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 (CAQM Act, 2021) — प्रदूषण रोकथाम शक्तियां
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 — नियम 4 (कचरा पृथक्करण एवं निस्तारण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- पर्यावरण संरक्षण और अदालती आदेशों के प्रवर्तन का विधिक मानक: ‘संवैधानिक अदालतों द्वारा पारित निर्देश केवल बौद्धिक या अकादमिक कवायद नहीं हैं; यदि जमीनी स्तर पर प्रवर्तन तंत्र उन्हें लागू करने में विफल रहता है तो कानून का शासन एक उपहास बनकर रह जाता है; उत्सव मनाने की स्वतंत्रता लोक स्वास्थ्य और अनुच्छेद 21 के अधीन है; पटाखों के प्रदूषण से निपटने के लिए प्रशासन को अंत-उपयोगकर्ताओं के बजाय अवैध निर्माताओं, थोक व्यापारियों और आपूर्ति श्रृंखला पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करनी होगी; साथ ही, व्यापक सामाजिक बदलाव के लिए सम्मानित सार्वजनिक हस्तियों और स्कूली शिक्षा के माध्यम से बच्चों को पर्यावरण का प्रहरी बनाना अपरिहार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: सर्वोच्च न्यायालय दो दिनों के भीतर औपचारिक अंतरिम आदेश जारी करेगा, जिसमें अधिकारियों को पूर्व आदेशों के तहत की गई छापेमारी, जब्ती, रद्द लाइसेंसों और दर्ज मुकदमों का विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का अनिवार्य निर्देश दिया जाएगा; दिल्ली में निर्माताओं के रद्द लाइसेंस बहाल करने की अर्जी खारिज हो चुकी है और बेरियम पटाखों पर विचार को 3 सप्ताह के लिए टाल दिया गया है।
Diwali In Delhi:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले |
| मामला/विषय | दिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण, पटाखों पर प्रतिबंध का प्रवर्तन व स्वास्थ्य प्रभाव (In Re: Curbing Air Pollution in NCR) |
| न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) | वरिष्ठ अधिवक्ता उत्तरा बब्बर (Uttara Babbar) |
| मूल याचिकाकर्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन (Gopal Sankarnarayanan) |
| निर्माता व व्यापारी पक्ष | वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक (J. Sai Deepak) |
| अदालत का फैसला/निर्देश | 1. प्रवर्तन हलफनामा अनिवार्य: केंद्र व दिल्ली प्रशासन को पिछले वर्ष के बैन/ढीली व्यवस्था पर की गई कार्रवाई, सीज़ की गई सामग्री और एफआईआर का विस्तृत विवरण देने के आदेश। 2. विक्रेताओं पर शिकंजा: आम उपभोक्ताओं के बजाय अवैध पटाखों के थोक विक्रेताओं और व्यापारियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश। 3. पूर्ण प्रतिबंध से इंकार: उत्सव की जन-भावनाओं को देखते हुए तत्काल पूर्ण प्रतिबंध नहीं, लेकिन क्रमिक सुधार (कम से कम 25% कटौती) का लक्ष्य। |

