Friday, October 30, 2026
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Advocate Bail: वकील होना कानून हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं; महिला से छेड़छाड़, बेटे को नग्न कर पीटने जैसे आरोप पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या थी पूरी घटना?

  1. बेसमेंट में जिम को लेकर विवाद:घटना जनवरी महीने की है, जब शिकायतकर्ता रीता गर्ग के मकान के बेसमेंट में चल रहे एक जिम को लेकर विवाद हुआ था। शिकायतकर्ता के अनुसार, विकास यादव और उसके साथियों ने उन पर हमला किया और उनके साथ छेड़छाड़ की।
  2. बर्बरता और सीसीटीवी साक्ष्य:आरोपियों ने शिकायतकर्ता के पति पर भारी जिम रॉड (Gym Rod) से हमला किया, जिससे उनकी हड्डी टूट गई (Fracture)। इसके बाद, आरोपियों ने उनके बेटे को पीटा, उसके कपड़े फाड़कर उसे सड़क पर नग्न (Disrobed) कर दिया। पूरी वारदात सीसीटीवी (CCTV) कैमरों में कैद हो गई थी।
  3. गैर-जमानती वारंट और भगोड़ा (Proclaimed Offender) घोषित:घटना के बाद आरोपी वकील लगातार फरार रहा। गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी होने और मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा ‘भगोड़ा घोषित’ किए जाने के बाद उसने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी।

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और विधिक तर्क

1. “शारीरिक से गंभीर है मानसिक और मनोवैज्ञानिक चोट”:

हाईकोर्ट ने आरोपी के कृत्य को “चौंकाने वाला और बर्बर” (Shocking and Barbaric) करार देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के कपड़े उतारकर उसे सड़क पर नग्न छोड़ना, किसी शारीरिक चोट की तुलना में बहुत अधिक गहरा मनोवैज्ञानिक आघात (Psychological Injury) पहुंचाता है।

2. वकालत के पेशे की आड़ पर कड़ी फटकार:

  • न्यायमूर्ति कथपालिया ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता का वकील होना उसकी जमानत के पक्ष में कोई आधार है।
  • अदालत ने जांच अधिकारी (IO) के सामने पुलिस पूछताछ की गुप्त रिकॉर्डिंग करने की आरोपी की दुस्साहसिकता (Audacity) को रेखांकित करते हुए कहा कि यह आरोपी की इस गलतफहमी और अहंकार को दर्शाता है कि वकील होने के नाते उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

3. भगोड़े अपराधी का अधिकार क्षेत्र:

पीठ ने सहमति व्यक्त की कि यद्यपि कानूनी रूप से घोषित भगोड़ा (Proclaimed Offender) भी अग्रिम जमानत मांग सकता है, लेकिन ऐसा केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही हो सकता है। वर्तमान मामले में ऐसी कोई असाधारण स्थिति मौजूद नहीं है।

नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 438 (अग्रिम ज़मानत / Anticipatory Bail के न्यायिक सिद्धांत), धारा 82 व 84 BNSS / धारा 82 व 83 CrPC (घोषित अपराधी / Proclaimed Offender (PO) द्वारा अग्रिम ज़मानत की असाधारण पोषणीयता), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 74 (महिला की लज्जा भंग करना / पूर्ववर्ती IPC 354), धारा 117(2) (गंभीर चोट/फ्रैक्चर / पूर्ववर्ती IPC 325) व धारा 3(5) (साझा आशय), तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लवेश बनाम राज्य (NCT दिल्ली) व श्रीकांत उपाध्याय मामलों में स्थापित ‘घोषित अपराधियों को ज़मानत संरक्षण’ संबंधी विधिक कसौटियों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत कठोर आदेश पारित किया है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (Justice Girish Kathpalia) की एकल पीठ ने महिला से छेड़छाड़ करने, उसके पति पर भारी जिम रॉड से हमला कर फ्रैक्चर करने तथा उसके बेटे को बेरहमी से पीटकर सरेआम निर्वस्त्र कर सड़क पर छोड़ने के आरोपी वकील विकास यादव (Vikas Yadav) की अग्रिम ज़मानत याचिका को खारिज (Dismissed) कर दिया।

अदालत ने कहा कि अभ्यास करने वाला वकील (Practicing Advocate) होना कानून से ऊपर होने का कोई विशेषाधिकार नहीं देता। पीठ ने आरोपी के आचरण को “स्तब्धकारी और बर्बर” (Shocking and Barbaric) करार देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से नग्न करना उसे शारीरिक चोट पहुंचाने से भी कहीं अधिक गंभीर मनोवैज्ञानिक क्षति पहुंचाना है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी कि ऐसे मामलों में अग्रिम ज़मानत देने से समाज में यह गलत संदेश जाएगा कि वकालत का पेशा बेलगाम अराजकता फैलाने का लाइसेंस है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘वकील होना कानून तोड़ने का लाइसेंस नहीं; इससे कानून के शासन पर जनता का भरोसा टूटेगा’

न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने आरोपी के विधिक पेशे के आधार पर ज़मानत मांगने की दलील को सिरे से ठुकराते हुए अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “ऐसी परिस्थितियों में अग्रिम ज़मानत देने से पूरे समाज में यह अत्यंत गलत संदेश (Wrong Signal) जाएगा कि एक वकालत करने वाला वकील होना ऐसी खुली अराजकता (Brazen Lawlessness) में लिप्त होने का कोई लाइसेंस हो सकता है, और इससे कानून के शासन (Rule of Law) पर जनता का विश्वास पूरी तरह खंडित होगा। निस्संदेह, सभी अधिवक्ता अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) होने के नाते पूर्ण सम्मान के पात्र हैं। किंतु यह सिद्धांत उस वकील पर कतई लागू नहीं किया जा सकता जो सार्वजनिक रूप से और ऐसे दुस्साहस के साथ इस प्रकार की खुली अराजकता में संलिप्त होता है।”

2. ‘कपड़े उतारकर नग्न छोड़ना शारीरिक चोट से भी गहरा मनोवैज्ञानिक आघात’:

  • अदालत ने पीड़िता के पुत्र के साथ की गई बर्बरता पर टिप्पणी करते हुए कहा:“आरोपी द्वारा पीड़ित के कपड़े उतारकर उसे सड़क पर नग्न छोड़ने से जो गंभीर मनोवैज्ञानिक चोट (Psychological Injury) पहुंचाई गई है, वह किसी को शारीरिक चोट पहुंचाने से कहीं अधिक गंभीर और विनाशकारी है।”
  • पीठ ने सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage) के हवाले से कहा कि आरोपी ने भारी जिम रॉड (Heavy Gym Rod) से हमला किया, जिससे पीड़िता के पति को फ्रैक्चर हुआ और उसके बेटे को अमानवीय रूप से प्रताड़ित किया गया।

3. ‘घोषित अपराधी’ (Proclaimed Offender) को सामान्य परिस्थितियों में अग्रिम ज़मानत नहीं:

  • अदालत ने स्वीकार किया कि विधिक रूप से एक घोषित अपराधी भी असाधारण परिस्थितियों (Exceptional Circumstances) में अग्रिम ज़मानत मांग सकता है, किंतु वर्तमान मामले में कोई असाधारण आधार मौजूद नहीं है।
  • आरोपी गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी होने और मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा औपचारिक रूप से घोषित अपराधी करार दिए जाने के बावजूद लगातार फरार रहा और जांच में शामिल नहीं हुआ।

4. पुलिस पूछताछ की गुप्त रिकॉर्डिंग: ‘वकील की हनक और कानून के प्रति तिरस्कार’:

  • अदालत ने इस तथ्य पर गहरा आश्चर्य और रोष व्यक्त किया कि गैर-जमानती वारंट होने के बावजूद जांच अधिकारी (IO) ने आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया, और आरोपी ने अपनी पुलिस पूछताछ को खुद रिकॉर्ड करने की धृष्टता की:“यह आरोपी की उस मानसिकता को भली-भांति स्थापित करता है जिसमें वह एक वकील होने की हनक (Might of being an advocate) प्रदर्शित कर रहा था… यह आरोपी के मन में कानून के प्रति घोर अनादर को दर्शाता है, जो इस गलतफहमी में जी रहा था कि एक वकील होने के नाते उसे कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (जनवरी–अक्टूबर 2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
याचिकाकर्ता / आरोपीविकास यादव — दिल्ली में वकालत करने वाला वकील (Practicing Advocate)।
प्रतिवादी पक्षराज्य (NCT दिल्ली पुलिस) एवं शिकायतकर्ता (रीता गर्ग)।
घटना का समय एवं स्थानजनवरी 2026; शिकायतकर्ता के मकान के बेसमेंट में संचालित जिम (Gym) के विवाद को लेकर।
शिकायतकर्ता के मुख्य आरोप1. विकास यादव और उसके साथियों ने शिकायतकर्ता रीता गर्ग के साथ मारपीट और छेड़छाड़ की।
2. शिकायतकर्ता के पति पर भारी जिम रॉड से जानलेवा हमला किया गया, जिससे उनके हाथ/शरीर में गंभीर फ्रैक्चर हुआ।
3. पीड़िता के बेटे को बुरी तरह पीटा गया, उसके सारे कपड़े फाड़कर उतार दिए गए और उसे सड़क पर पूरी तरह नग्न छोड़ दिया गया।
4. यह संपूर्ण हिंसक और अमानवीय घटना सीसीटीवी कैमरे (CCTV) में स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड हुई।
प्रक्रियात्मक स्थितिजांच में शामिल न होने और समन की अवहेलना पर सक्षम मजिस्ट्रेट अदालत ने आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए और बाद में उसे औपचारिक रूप से घोषित अपराधी (Proclaimed Offender – PO) घोषित किया।
याचिकाकर्ता की दलीलें1. वह एक पेशेवर वकील है और अदालत का सम्मानित अधिकारी है।
2. लवेश नजीर के तहत घोषित अपराधी भी अग्रिम ज़मानत का हकदार हो सकता है।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयअग्रिम ज़मानत याचिका पूर्णतः खारिज (Dismissed); पुलिस को कानून सम्मत कार्रवाई की छूट।

विधिक एवं आपराधिक न्यायशास्त्र: ‘घोषित अपराधी और धारा 438 CrPC / 482 BNSS की सीमा’

  • घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) और अग्रिम ज़मानत की वर्जना:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने लवेश बनाम राज्य (NCT दिल्ली) और हाल ही में श्रीकांत उपाध्याय बनाम बिहार राज्य [2024] में यह स्पष्ट सिद्धांत स्थापित किया है कि जब किसी अभियुक्त के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82 (अब बीएनएसएस की धारा 84) के तहत उद्घोषणा जारी हो चुकी हो और वह कानून की प्रक्रिया से भाग रहा हो, तो वह अग्रिम ज़मानत की असाधारण राहत का हकदार नहीं रह जाता।
    • अग्रिम ज़मानत एक विवेकाधीन और विशिष्ट संवैधानिक संरक्षण है जो निर्दोष व्यक्तियों को दुर्भावनापूर्ण गिरफ्तारी से बचाने के लिए है, न कि ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण देने के लिए जो अदालतों के वारंट को धता बताकर फरार रहते हैं।
  • अधिवक्ता का आचरण और विधिक पेशे की शुचिता:
    • भारतीय न्यायशास्त्र में अधिवक्ताओं को ‘न्याय का सारथी’ और ‘न्यायालय का अधिकारी’ (Officer of the Court) माना गया है।
    • जब कोई वकील अपने पेशे की आड़ लेकर कानून प्रवर्तन एजेंसियों को धमकाता है, पूछताछ की अवैध रिकॉर्डिंग करता है और आम नागरिकों को सड़कों पर नग्न करके अपमानित करता है, तो कानून उसके साथ किसी सामान्य अपराधी से भी अधिक सख्ती से पेश आता है। अदालत ने रेखांकित किया कि पेशा अपराध का कवच नहीं बन सकता।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय (मूल आपराधिक क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: विकास यादव बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) व अन्य [Bail Appln. No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: अग्रिम ज़मानत याचिका पूर्णतः खारिज (Dismissed)

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (विकास यादव) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिंह (Senior Advocate Shri Singh) एवं वरिष्ठ अधिवक्ता जतन सिंह (Senior Advocate Jatan Singh), साथ में अधिवक्ता सुरभि वाया, गुरसिमरन नरूला, नितिन कुमार शर्मा एवं लक्ष्य चौहान।
  • अभियोजन (दिल्ली पुलिस) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक / स्थायी वकील अमित अहलावत (Advocate Amit Ahlawat)।
  • शिकायतकर्ता (रीता गर्ग) की ओर से: अधिवक्ता अभय कुमार, पंकज जायसवाल, शगुन रूहिल, करण चोपड़ा एवं राहुल कनौजिया।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 482 (अग्रिम ज़मानत) एवं धारा 84 (फरार व्यक्ति के लिए उद्घोषणा) / CrPC धारा 438 व 82
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 74 — महिला की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग (पूर्ववर्ती IPC 354)
      • धारा 117(2) — स्वेच्छा से घोर उपहति कारित करना / फ्रैक्चर (पूर्ववर्ती IPC 325)
      • धारा 351 व 352 — आपराधिक धमकी और शांति भंग करने हेतु जानबूझकर अपमान (पूर्ववर्ती IPC 506 व 504)
      • धारा 3(5) — सामान्य आशय (Common Intention / पूर्ववर्ती IPC 34)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीवन का अधिकार) एवं अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता—वकीलों हेतु कोई विशेष छूट नहीं)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • वकीलों द्वारा आपराधिक कृत्य और अग्रिम ज़मानत का विधिक मानक: ‘वकालत करने वाला वकील होना किसी संज्ञेय और बर्बर अपराध में अग्रिम ज़मानत पाने का असाधारण आधार नहीं बन सकता; किसी नागरिक को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र कर पीटना गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात है; जो अभियुक्त गैर-जमानती वारंट के बावजूद फरार रहकर घोषित अपराधी (PO) बन चुका हो और जांच से बचता रहा हो, उसे अग्रिम ज़मानत का वैधानिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता।’
  • वर्तमान स्थिति: दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम ज़मानत खारिज किए जाने के बाद दिल्ली पुलिस के लिए घोषित अपराधी विकास यादव को गिरफ्तार कर हिरासत में लेकर पूछताछ (Custodial Interrogation) करने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

Advocate Bail: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया (Justice Girish Kathpalia)
मामला/साइटेशनविकास यादव बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य व अन्य (Vikas Yadav v. State of NCT of Delhi and Anr)
आरोपी/याचिकाकर्ताविकास यादव (प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता / भगोड़ा घोषित) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिंह, जतन सिंह व अन्य
शिकायतकर्ता/पीड़ितरीता गर्ग (शिकायतकर्ता) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता अभय कुमार, पंकज जायसवाल व अन्य
दिल्ली पुलिस (अभियोजन)प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता अमित अहलावत
मूल आरोपजिम विवाद में महिला से छेड़छाड़, पति पर जिम रॉड से हमला (फ्रैक्चर) और बेटे को निर्वस्त्र कर सड़क पर पीटना (IPC/BNS की धाराएं)।
अदालत का फैसलाअग्रिम जमानत याचिका खारिज; आरोपी द्वारा पुलिस पूछताछ की रिकॉर्डिंग और भगोड़ा होने पर सख्त रुख।
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