Friday, August 21, 2026
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Advocate Bail: वकील है तो क्या रोड रेज जैसी घटना करेंगे…कानून की नजर में सभी समान

Advocate Bail: दिल्ली हाई कोर्ट ने रोड रेज के मामले में एक वकील को जमानत देने से इनकार कर दिया।

दिनदहाड़े सार्वजनिक स्थान पर हुई हिंसा

न्यायमूर्ति गिरीश काथपालिया ने कहा कि कानून की नजर में सभी समान हैं, और इस प्रकार की पूर्व गिरफ्तारी से सुरक्षा (एंटिसिपेटरी बेल) देना वकालत जैसे उच्च पेशे की गरिमा को ठेस पहुंचाएगा। अदालत ने कहा है कि दिनदहाड़े सार्वजनिक स्थान पर हुई हिंसा में राहत देना समाज को गलत संदेश देगा कि आरोपी केवल अपने पेशे के कारण बच निकला।

कानून के हाथ में नहीं लेने की दी हिदायत

इस मामले में कोर्ट ने कहा कि स्थिति और गंभीर इसलिए हो गई क्योंकि हमलावर वकील और राजनीतिक संगठन का अध्यक्ष था — ऐसे जिम्मेदार लोगों से उम्मीद होती है कि वे कानून को अपने हाथ में नहीं लेंगे। जांच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि हमले में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी और आगे की जांच के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। इन तथ्यों को देखते हुए, अदालत ने कहा कि यह पूर्व गिरफ्तारी से राहत देने योग्य मामला नहीं है और अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

पीड़ित को चोटें आईं, जबकि आरोपी ने इसे “साधारण रोड रेज” का मामला बताया

कोर्ट ने इससे असहमति जताते हुए कहा कि यह केवल रोड रेज का मामला नहीं है, और CCTV फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों आरोपी — समाज के प्रभावशाली व्यक्ति — ने दिनदहाड़े सार्वजनिक स्थान पर गंभीर हिंसा की। आरोपी वकील और उसका भाई, जिसके राजनीतिक संपर्क हैं, पर आरोप है कि उन्होंने फरवरी में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर पर हमला किया, जब वह दोपहिया वाहन से देवली रोड जा रहा था। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि पीड़ित के सिर में गंभीर चोट आई थी, जो जानलेवा साबित हो सकती थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की

“रोड रेज केवल रोड रेज नहीं होता। इसका दायरा व्यापक होता है — इसमें न केवल शारीरिक चोट और मानसिक आघात, बल्कि कई बार मृत्यु तक की नौबत आ जाती है।”

कोर्ट ने 15 मई को कहा

“सार्वजनिक स्थान पर दिनदहाड़े हुई इस प्रकार की हिंसा के मामले में यदि पूर्व गिरफ्तारी से राहत दी जाती है, तो समाज में यह गलत संदेश जाएगा कि हमलावर ने कानून को हाथ में लिया और केवल इसलिए छूट गया क्योंकि वह एक वकील है। कानून की नजर में सभी बराबर हैं और किसी को भी ‘अधिक बराबरी’ का दर्जा नहीं दिया जा सकता। इस तरह की राहत आरोपी/आवेदक को दी गई तो यह वकालत जैसे महान पेशे को भी बदनाम करेगी।

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