Lord Krishna Dress: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामलों में अति-संवेदनशीलता पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक बेहद ऐतिहासिक और दार्शनिक फैसला सुनाया है।
रंजनी गौर बनाम पंजाब राज्य व अन्य मामले में सुनवाई
हाईकोर्ट जस्टिस सुभाष मेहला की एकल पीठ ने रंजनी गौर बनाम पंजाब राज्य व अन्य मामले में अपने आदेश में महिला के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR), चार्जशीट और सभी आगामी आपराधिक कार्यवाहियों को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा, आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) को किसी की व्यक्तिगत अत्यधिक संवेदनशीलता या ठेस पहुंचने की मनगढ़ंत धारणाओं पर आधारित नहीं किया जा सकता।
प्रजाति (Species) का स्थान भक्त की भावना की शुद्धता के बाद आता है: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा, जन्माष्टमी पर इस महिला का दिल कृष्ण पर केंद्रित था। अपने पालतू कुत्ते, जिसे वह अपने बच्चे की तरह मानती और प्यार करती है, को सजाकर याचिकाकर्ता वास्तव में ‘भक्ति योग’ का पालन कर रही थी। कृष्ण के लिए वस्त्र की पवित्रता या पहनने वाले की प्रजाति (Species) का स्थान भक्त की भावना की शुद्धता के बाद आता है।
मामला क्या है?: जन्माष्टमी पर कुत्ते को बनाया कान्हा, लगा केस
यह विवाद एक महिला द्वारा अपने पालतू जानवर के प्रति स्नेह को सोशल मीडिया पर साझा करने से शुरू हुआ था।
शिकायत और एफआईआर: याचिकाकर्ता महिला ने जन्माष्टमी के त्योहार पर अपने पालतू कुत्ते को भगवान कृष्ण की तरह पीले वस्त्र, मुकुट और आभूषण पहनाए थे। उन्होंने इस तस्वीर को अपने व्हाट्सएप (WhatsApp) स्टेटस पर लगाया था। एक शिवसेना युवा नेता ने इसे हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं का अपमान बताते हुए महिला के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी।
महिला का पक्ष: जांच के दौरान महिला ने स्टेटस लगाने की बात स्वीकार की, लेकिन कहा कि उनका इरादा किसी को ठेस पहुंचाने का नहीं था। शादी के 6 साल बाद भी निसंतान होने के कारण वे अपने पालतू कुत्ते को ही अपना बच्चा मानती हैं और उन्होंने केवल एक बच्चे की तरह त्योहार मनाने के लिए उसे तैयार किया था।
हाई कोर्ट का रुख: अति-संवेदनशीलता पर भारी पड़नी चाहिए संवैधानिक सहिष्णुता
हाई कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और हिंदू दर्शन का गहराई से विश्लेषण करते हुए इस मामले को आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। कोर्ट की मुख्य विधिक व दार्शनिक टिप्पणियां इस प्रकार हैं।
आपराधिक इरादे (Mens Rea) का अभाव
जस्टिस सुभाष मेहला ने स्पष्ट किया कि बीएनएस की धारा 298 केवल तब लागू होती है जब किसी पूजा स्थल या पवित्र मानी जाने वाली वस्तु को नुकसान पहुंचाया जाए या अपवित्र किया जाए। कुत्ते को पहनाए गए कपड़े या मुकुट कानूनन ‘पवित्र वस्तु’ की श्रेणी में नहीं आते। किसी भी अपराध के लिए दुर्भावना (Malice) या आपराधिक मंशा का होना जरूरी है, जो यहाँ पूरी तरह गायब था।
हिंदू पौराणिक कथाएं और ‘एन्थ्रोपोमोर्फिज़्म’ (मानवरूपांतरण)
अदालत ने हिंदू आइकनोग्राफी और पौराणिक कथाओं का संदर्भ देते हुए ‘एन्थ्रोपोमोर्फिज़्म’ (जानवरों या प्राकृतिक तत्वों में मानवीय गुणों/भावनाओं को देखना) के सिद्धांत को समझाया। कोर्ट ने कहा, भारतीय पौराणिक कथाओं में यह अवधारणा गहराई से रची-बसी है, जैसा कि भगवान हनुमान, भगवान गणेश, भगवान गरुड़ और भगवान नंदी की अत्यधिक लोकप्रियता से स्पष्ट होता है, जिनका शारीरिक स्वरूप सीधे जीव जगत (Animal Kingdom) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने यह सब केवल प्रेमवश किया है, न कि धार्मिक मान्यताओं के अपमान के लिए।
‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स’ (सामुदायिक मानक) बनाम व्यक्तिगत खीझ
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स’ टेस्ट का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि कुछ व्यक्तियों के ‘आहत’ होने के दावों के आधार पर मुकदमे नहीं चलाए जा सकते। यदि अभियोजन का पैमाना लोगों की बदलती और संकीर्ण संवेदनशीलताओं पर छोड़ दिया जाएगा, तो कानून का वस्तुनिष्ठ मानक (Objective Standard) ही खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यह विवाद केवल एक संकीर्ण दृष्टिकोण (Myopic Viewpoint) के कारण पैदा हुआ जो ‘कुत्ते’ को ‘भगवान’ की एक अपवित्र रचना के रूप में देखता है।
अदालत का अंतिम आदेश
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने माना कि महिला का यह कदम पूरी तरह से ‘गुड फेथ’ (सद्भावना) और बिना किसी द्वेष के किया गया था। इस प्रकार, अपराध की मूल विधिक सामग्री (Ingredients) न होने के कारण अदालत ने महिला के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
केस मैट्रिक्स: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सुभाष मेहला (एकल पीठ) |
| केस संदर्भ | रंजनी गौर बनाम पंजाब राज्य व अन्य (Ranjanni Gaur v State of Punjab) |
| प्रासंगिक कानून / धारा | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 (धार्मिक भावनाएं आहत करना) |
| मूल विधिक टकराव | क्या पालतू जानवर को भगवान की पोशाक पहनाना ‘जानबूझकर किया गया धार्मिक अपमान’ है? |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट मितुल सिंह राणा |
| राज्य के प्रतिनिधि | एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) सुभाष गोदारा |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका मंजूर; एफआईआर और चार्जशीट रद्द, कृत्य को ‘भक्ति’ और ‘स्नेह’ का रूप माना। |

